ओशो- जब भी कोई व्यक्ति किसी और जैसा बनने की चेष्टा में रत होता है तभी गहरे में चोर हो जाता है। जब भी कोई व्यक्ति किसी और को अपने ऊपर ओढ़ लेता है, तो नकली हो जाता है, असली नहीं रह जाता। आथेंटिक, प्रामाणिक निजता उसकी खो जाती है।इसका यह अर्थ नहीं है कि […]Read More
Once the 22nd Law Commission has south the opinion of people and religious organizations on the issue of Uniform Civil Code (UCC), Read More
ओशो- जीवन एक अवसर है। जीवन तथ्य नहीं, केवल एक संभावना है–जैसे बीज, बीज में छिपे हैं हजारों फूल, पर प्रकट नहीं–अप्रकट हैं, प्रच्छन्न हैं। बहुत गहरी खोज करोगे तो पा सकोगे। पा लोगे तो जीवन धन्य हो जाएगा। फूलों की सारी सुगंध फिर तुम्हारी है, और उनके सारे रंग भी, और उनकी कोमलता, और […]Read More
ओशो- देवता शब्द का अर्थ है… इस जगत में जो भी लोग हैं, जो भी आत्माएं हैं, उनके मरते ही साधारण व्यक्ति का जन्म तत्काल हो जाता है। उसके लिए गर्भ तत्काल उपलब्ध होता है। लेकिन बहुत असाधारण शुभ आत्मा के लिए तत्काल गर्भ उपलब्ध नहीं होता। उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उसके योग्य गर्भ […]Read More
ओशो- जब भी कभी कोई आदमी इतना कमजोर होता है कि उसकी आत्मा अपने शरीर में सिकुड़ जाती है, तब कोई प्रेत उसमें प्रवेश कर जाता है; न तो किसी दुष्टता के कारण, न उसको सताने के कारण, बल्कि उसके शरीर के द्वारा अपनी वासना को तृप्त करने के लिए।अगर आप कमजोर हैं, संकल्पहीन […]Read More
ओशो- रामकृष्ण को पहली दफा जब दक्षिणेश्वर के मंदिर में पुजारी की तरह रखा गया तो दो—चार—आठ दिन में ही बड़ी—बड़ी चर्चाएं कलकत्ते में फैलनी शुरू हो गईं। कमेटी के पास लोग गए, ट्रस्टियों के पास लोग गए और कहा कि इस आदमी को अलग कर दो। क्योंकि हमने बड़ी गलत बातें सुनी है। हमने […]Read More
ओशो- इस जगत में धर्म के नाम पर बहुत से लोग देखादेखी ही कर रहे हैं। तुम्हारे मां-बाप मंदिर जाते थे तो तुम भी मंदिर जाने लगे। वे तुम्हें मंदिर ले गए बचपन से, आदत बन गई। आदत से कहीं धर्म हुआ? आदत और धर्म? लोग सोचते हैं कि कुछ आदतें अच्छी होती हैं, कुछ […]Read More
ओशो- मैंने सुना, एक आदमी बड़ा क्रोधी था। मगर सोचता था, पत्नी क्रोध दिला देती है। ग्राहक क्रोध दिला देते हैं। बच्चे क्रोध दिला देते हैं, पड़ोसी क्रोध दिला देते हैं। छोड़ दिया संसार–जो सामान्य साधु की प्रक्रिया है; सच्चे साधु की नहीं–छोड़ दिया संसार, चला गया जंगल में, बैठ गया वृक्ष के नीचे, सोचा […]Read More
दो दिन की जिंदगी में न इतना मचल के चल , दुनिया है चलचलाव का रस्ता संभल के चल ओशो- सम्राट बहादुरशाह जफर के शब्द हैं: सम्राट के हैं, इसलिए सोचने जैसे भी बहुत; ऐसे तो कभी ऐसी बातें भिखारी भी कह देते हैं, लेकिन संभावना है कि भिखारी के मन में अपने को सांत्वना […]Read More
ओशो- बुद्ध कहते हैं कि मन को आलसी मत बनने दो, मन को यांत्रिक मत बनने दो। सतर्क रहो, गतिशील रहो. स्थिर मत रहो, चलते रहो। क्योंकि यदि आसक्ति और जुनून को अनुमति दी जाए तो व्यक्ति मूर्ख और तर्कहीन हो जाता है। यदि आप आसक्त हो जाते हैं तो आप मूर्ख बन जाते हैं, […]Read More



