फूल तो नृत्य हैं अस्तित्व के। फूल तो आकांक्षा हैं पृथ्वी की आकाश के तारों को छू लेने के लिए। लेकिन जो बीज ही रह जाए, वह अभागा है–हुआ भी और न भी हुआ; व्यर्थ ही हुआ। होने और न होने में क्या भेद? अगर बीज ही रह जाना है, तो न भी होते तो भी चल जाता। अंतर तो तब पड़ेगा जब वसंत आएगा। अंतर तो तब पड़ेगा जब फूल हवाओं में और सूरज की किरणों में नाचेंगे। अंतर तो तब पड़ेगा जब मधुमक्खियां और तितलियां उनके पास गीत गाएंगी। उस रास से अंतर पड़ेगा। फूल की बांसुरी पर जब पक्षी अपनी धुन बिठाने लगेंगे, तब बीज को पता चलेगा कि मैं वस्तुतः क्या था। वह नहीं था जो दिखाई पड़ता था; वह था जो कभी दिखाई नहीं पड़ता था। दृश्य नहीं था, अदृश्य था।