“शिक्षा का संकट: नए मनुष्य की खोज” आधुनिक शिक्षा क्यों बना रही है बेचैनी और विद्रोह?” _ओशो

ओशो- जितना कोई मुल्क सभ्य होता है, शिक्षित होता है उतनी मुश्किल में पड़ जाता है। वह तो डी. एच. लारेंस एक अदभुत विचारक था, उसने तो यहां तक क्रोध में सुझाव दे दिया कि सौ साल के लिए सब कालेज, सब स्कूल, सब युनिवर्सिटी बंद कर दो, अगर आदमी को बचाना है। पहले तो लोगों ने समझा कि वह मजाक कर रहा है, लेकिन उसकी मजाक धीरे-धीरे गंभीर होती जा रही है। और ऐसा लगता है कि कहीं वह ठीक ही तो नहीं कह रहा है।

आज अमरीका में कोई तीस लाख लड़के हिप्पी हैं। हिप्पी का मतलब, वह लड़के और लड़कियां जिन्होंने कह दिया है कि सब बेकार है, तुम्हारी सब व्यवस्था, तुम्हारी शिक्षा, तुम्हारे संस्कार, तुम्हारी नीति–सब बेमानी है, हम कुछ नहीं मानते। हमको तो जैसा जीना है हम जीएंगे, हमको सड़क के किनारे सोना है तो हम सोएंगे। हमको शराब पीनी है तो पीएंगे। हमको नंगा नाचना है, तो हम नंगा नाचेंगे, क्योंकि कौन कहता है कि नहीं नंगा नाचना कोई बहुत अच्छी बात है, और कौन कहता है कि शराब नहीं पी, तो कोई बहुत बड़ा काम हो जाएगा। क्योंकि जिन्होंने शराब नहीं पी है, उन्होंने क्या कर लिया है!

वे बच्चे यह सवाल अपने बाप से यह पूछ रहे हैं। वे यह पूछते हैं कि हम आज शादी करेंगे, कल तोड़ेंगे, हम शादी ही नहीं करेंगे। हमें जिस लड़की के साथ रहना ठीक लगता है, हम रहेंगे, जब तक ठीक लगता है ठीक, नहीं ठीक लगता है, नहीं। अगर पिता समझाता है कि यह बात ठीक नहीं है, तो वे कहते हैं कि हम तुम्हारे और अपनी मां के बीच जो संबंध देख रहे हैं, कलह का और दुश्मनी का, कृपा करके हम पर मत थोपो। इस मार्ग को जाने पर हम राजी नहीं हैं। शिक्षक समझा रहा है, पढ़ो-लिखो, वे शिक्षक से पूछ रहे हैं, कि आपको पढ़-लिख कर क्या मिल गया है? आपने क्या पा लिया है, पढ़-लिख कर? जो आपको मिल गया है पढ़-लिख कर, वही हमको मिल जाएगा। कृपा करो, हम ऐसे ही अच्छे हैं।

हिंदुस्तान में भी ये सवाल उठ ही आएंगे। अभी हम बहुत गरीब हैं, इसलिए थोड़ी देर लगेगी, लेकिन ये सवाल उठ ही आएंगे, यह देर-अबेर की बात है। यह क्या हो गया है? कहीं कुछ भूल हो रही है। सभी के योग्य और सभी के व्यक्तित्व के भीतर, जो छिपा है उसे प्रगट करने की संभावना की तरफ हमारी खोज कम है। हमारी खोज टाइप के लिए है। हम एक खास टाइप सोच कर बैठ गए हैं, उस टाइप में सबको ढाल देना है। उसमें कुछ के लिए ठीक पड़ जाता है और वे प्रसन्न हो जाते हैं। कुछ के लिए ठीक नहीं पड़ता है, और वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। अधिक के लिए ठीक नहीं पड़ता है और वह मुश्किल में पड़ जाते हैं। उनकी बेचैनी परेशानी बन जाती है। उनकी परेशानी, चिंता और बीमारियां बन जाती हैं।

जब एक आदमी चिंतित और परेशान होता है, तो ध्यान रखना, दस को चिंतित और परेशान कर देता है। क्योंकि चारों तरफ उसकी चिंता और परेशानियों के वर्तुल फैलने शुरू हो जाते हैं। जिन-जिन से उनका संबंध होगा सबको वह बीमार कर डालता है, सबको परेशान कर डालता है। क्या करना होगा?

आधुनिक शिक्षक के सामने सवाल यह है कि वह व्यक्ति के भीतर सिर्फ बेचैनी और अशांति और तनाव की दुनिया खड़ी न करे, व्यक्ति के भीतर एक शांति और एक आनंद और एक प्रकाश का फूल खिलाने में भी सहयोगी हो जाए। लेकिन यह तभी हो सकता है, यह तभी हो सकता है गुलाब का फूल अगर पूरी तरह खिल जाए तो गुलाब के पौधे को पास से देखना। उसके रोएं-रोएं में आनंद छा जाता है। जब भी कोई पौधा अपना पूरा फूल खिला लेता है, तो आनंद से भर जाता है।

और आदमी का पूरा फूल नहीं खिल पाता है। आदमी में भी जब पूरा कोई फूल खिलता है–जैसे कोई कृष्ण, या कोई बुद्ध या कोई क्राइस्ट जब पूरी तरह खिल जाता है, तो उसके सारे प्राण का रोआं-रोआं आनंद से पुलकित हो जाता है। लेकिन हम नहीं खिल पाते। मेरी दृष्टि में चाहे कितनी ही कठिनाइयां हों, हमें शिक्षा के ऐसे प्रयोग और ऐसी प्रक्रियाएं खोजनी पड़ेंगी, जिनमें एक-एक व्यक्ति के भीतर का फूल खिल सके। शिक्षण संस्थाएं फैक्ट्रियां नहीं होनी चाहिए, शिक्षण संस्थाएं सिर्फ प्रत्येक व्यक्ति की उसकी आत्म-खोज में सहयोग के स्थल होने चाहिए। तो वह अपने आत्म-खोज की, सेल्फ आइडेंटिटी की खोज में निकल जाए। और अपने को पा ले कि वह कौन है, क्या हो सकता है।

सारा ढांचा सोच कर फिर से बदलना पड़ेगा। और इसके पहले कि हम पश्चिम के पूरे ढांचे को ओढ़ लें, जो कि हम कर रहे हैं और हमारे नेता बहुत जिद्द में हैं, वे कहते हैं, हम बहुत जल्दी करके रहेंगे, हम पूरे ढांचे को ओढ़कर रहेंगे। उन नेताओं को मुझे करीब-करीब ऐसा मालूम पड़ता है कि कुछ दिखाई नहीं पड़ता, अंधे हैं। क्योंकि जिस ढांचे को पश्चिम में सफलता मिल गई है, उसका परिणाम उनको दिखाई नहीं पड़ता है। वह परिणाम वहां क्या हो रहा है? वे कहते हैं, हम सबको शिक्षित करके रहेंगे–बिलकुल करके रहिए। अब आप राजी हो गए तो होना पड़ेगा सबको शिक्षित। वे कहते हैं, कंप्लसरी शिक्षा देकर रहेंगे। वह भी करिए। सबको शिक्षित करिए, बड़ा अच्छा मालूम पड़ता है, लेकिन जहां अनिवार्य शिक्षा है और जहां शिक्षा ने सारे लोगों को शिक्षित कर दिया है, वहां परिणाम क्या हुआ है, वह बिना देखे ही हुए, यह सब किए जाना पागलपन होगा।

मैं सोचता हूं, हिंदुस्तान बहुत दुर्भाग्यों के कारण, एक सौभाग्य की स्थिति में है और वह यह कि पश्चिम जो प्रयोग कर रहा है उसे पूरा करके हमें देखने की जरूरत नहीं है। हम पिछड़ गए हैं, इसलिए, हमें कोई पूरा करके देखने की जरूरत नहीं है। हम कुछ नये प्रयोग कर सकते हैं। और वे नये प्रयोग पश्चिम के लिए भी मार्गदर्शक हो सकते हैं।

वह तो विस्तार की बात होगी कि कैसे व्यक्ति के फूल खिलने की, स्पांटेनियस, उसके सहजस्फूर्त होने के लिए हम क्या करें। लेकिन अगर इतनी स्वीकृति भी हमारे मन में आ जाए कि प्रत्येक व्यक्ति अलग है और दूसरे जैसा नहीं बनाया जा सकता, न बनाया जाना चाहिए, तो हम बहुत ही गहरे परिणाम ला सकते हैं। अगर एक विद्यार्थी गणित में कमजोर है, तो शिक्षा को यह जोर देने की जरूरत नहीं है कि वह गणित में मजबूत होगा तभी वह स्कूल से बाहर निकल सकता है। नहीं कोई जरूरत है। गणित कुछ ऐसी बात नहीं है कि उसके बिना जिंदगी नहीं हो सकती। और हमारे जोर देने से भी कुछ बहुत फर्क पड़ने वाला नहीं है। सिर्फ एक फर्क पड़ेगा कि वह व्यक्ति एक इनफिरिआरिटी काम्पलेक्स लेकर, एक हीनता का भाव लेकर दुनिया में जाएगा कि मैं कमजोर हूं गणित में, और यह भाव उसको जिंदगी में दूसरे तरफ भी हराने वाला भाव बन जाएगा।

इसलिए जो व्यक्ति जो हो सकता है–तो मेरी दृष्टि में ऐसा मालूम पड़ता है, जो मैं अंतिम बात कहना चाहता हूं वह यह कि सबसे पहला काम तो यह है कि प्राथमिक स्कूल, जहां हम पहली दफा बच्चों से साक्षात्कार करते हैं, जहां छोटे बच्चे पहली दफे पुरानी पीढ़ी के आमने-सामने खड़े होते हैं, जहां एनकाउंटर शुरू होता है, वहां श्रेष्ठतम शिक्षक होने चाहिए। अभी हमने वहां निकृष्टतम शिक्षक बिठा रखे हैं। जिनको हम युनिवर्सिटी में बिठाए हुए हैं, उनको सबको प्राइमरी स्कूल में होना चाहिए। क्योंकि वहां पहला मुकाबला है, पुरानी पीढ़ी का नई पीढ़ी से। वहां पुरानी पीढ़ी को अपने श्रेष्ठतम व्यक्ति खड़ा करना चाहिए, क्योंकि वह अनुभव सदा के लिए कीमती होगा।

लेकिन हमारा ऐसा खयाल है, प्राथमिक शिक्षक तो कोई होना न चाहे। युनिवर्सिटी में भी जो शिक्षक जरा दो-चार साल आगे हुआ कि वह कहता है कि अंडर ग्रेजुएट नहीं पढ़ाएंगे, तो पोस्ट ग्रेजुएट पढ़ाएंगे। अंडर ग्रेजुएट बेइज्जती है पढ़ाना। जब कि सचाई यह है कि प्राथमिक स्कूल से ज्यादा कठिन और कहीं कोई बात नहीं है, बाद में सब सरल होता चला जाता है। असली सवाल वहां है जहां बिलकुल नई पीढ़ी, कच्ची पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के सामने खड़ी होती है, वहां, वहां श्रेष्ठतम शिक्षक होने चाहिए। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

शिक्षा का संकट: ओशो के विचारों में नए मनुष्य की तलाश

आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर ओशो के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने दशकों पहले थे। ओशो ने कहा था कि जैसे-जैसे कोई देश सभ्य और शिक्षित होता जाता है, वह उतनी ही गहरी मुश्किलों में उलझने लगता है। उनके अनुसार पश्चिमी देशों ने शिक्षा में जो राह चुनी, उसके नतीजे देखने लायक हैं—और भारत को आंख मूंदकर उसे अपनाने से पहले गंभीरता से सोचना चाहिए।

पश्चिम की शिक्षा व्यवस्था पर ओशो की तीखी टिप्पणी

ओशो बताते हैं कि मशहूर विचारक डी.एच. लॉरेंस तक यह कह चुके थे कि “अगर मनुष्य को बचाना है तो 100 साल के लिए सभी स्कूल-कॉलेज बंद कर दो।”
पहले इसे मज़ाक समझा गया, पर समय बीतने के साथ यह चेतावनी सच लगने लगी।

ओशो के अनुसार अमेरिका में लाखों युवाओं का हिप्पी संस्कृति की ओर झुकाव यह संकेत है कि वे व्यवस्था, शिक्षा और संस्कार—सबको बेकार मान चुके हैं।

युवाओं का विद्रोह: “हमें आपकी व्यवस्था नहीं चाहिए”

ओशो कहते हैं कि आधुनिक युवा अब माता-पिता के ढांचे को नहीं मानते।
वे खुलकर पूछते हैं—

  • “आपकी शिक्षा ने आपको क्या दिया?”
  • “आप तनावग्रस्त हैं, कलह में डूबे हैं, तो हम आपकी राह क्यों चुनें?”

युवाओं का सवाल है कि जीवन नियमों से नहीं, स्वतंत्रता से खिलेगा।

भारत में भी उठेंगे ऐसे सवाल

ओशो चेतावनी देते हैं कि भारत में गरीबी के कारण भले ये सवाल अभी धीमे हैं, पर जल्द ही उठने ही वाले हैं।
उन्होंने कहा—
“हम सभी को एक ही ढांचे में ढालने पर जोर देते हैं, जबकि हर व्यक्ति अलग है। यह गलत है और मानसिक बीमारी को जन्म देता है।”

जो बच्चा गणित में कमजोर है, उसे ज़बरदस्ती उसी साँचे में डालने का दबाव उसकी पूरी जिंदगी में हीनभाव भर देता है।

शिक्षा फैक्ट्री नहीं – आत्म-खोज का स्थान होनी चाहिए

ओशो के अनुसार आधुनिक शिक्षा का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह व्यक्ति में शांति, आनंद और आंतरिक विकास की कोई जगह नहीं छोड़ती।
उनका संदेश स्पष्ट था—

  • शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का “फूल खिलाना” होना चाहिए।
  • विद्यालय कारखाना नहीं, आत्म-खोज के केंद्र बनें।

उदाहरण के रूप में उन्होंने कृष्ण, बुद्ध और ईसा जैसे विकसित व्यक्तित्वों का उल्लेख किया—जिनके भीतर का “फूल” पूरी तरह खिला।

प्राथमिक शिक्षा पर ओशो का बेबाक दृष्टिकोण

ओशो का कहना था कि सबसे महत्वपूर्ण स्थान प्राथमिक विद्यालय है, जहाँ पहली बार नई पीढ़ी का सामना पुरानी पीढ़ी से होता है।
लेकिन दुखद यह है कि—

  • भारत में सबसे कमजोर शिक्षक प्राथमिक स्कूलों में बैठाए जाते हैं।
  • जबकि श्रेष्ठतम शिक्षकों को यहीं होना चाहिए।

विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाना आसान है,
लेकिन “कच्चे मन” का सामना करना सबसे कठिन और महत्वपूर्ण कार्य है।

भारत के पास अनोखा अवसर

ओशो का मानना था कि भारत अभी भी प्रयोग करने की स्थिति में है।
वे कहते हैं—

“पश्चिम अपने प्रयोगों में असफल हुआ है।
हमें वही गलती दोहराने की जरूरत नहीं है।
हम नए रास्ते बन सकते हैं, जिन्हें पश्चिम भी अपनाए।”

निष्कर्ष

ओशो के विचार सिर्फ शिक्षा की आलोचना नहीं, बल्कि एक नई दिशा का प्रस्ताव हैं।
उनका संदेश है—

  • हर बच्चा अलग है
  • हर व्यक्ति अद्वितीय है
  • शिक्षा को उसके भीतर का फूल खिलाने में मदद करनी चाहिए
  • न कि उसे किसी तय टाइप में ढालने की फैक्ट्री बना देना चाहिए

ओशो का यह दृष्टिकोण वर्तमान शिक्षा सुधारों के लिए एक गहन मार्गदर्शन प्रदान करता है।