“धन और ध्यान: ओशो का संदेश धनतेरस पर”
ओशो- धनतेरस केवल सोने-चांदी खरीदने का पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। ओशो कहते हैं — “धन सुंदर है, यदि उसमें ध्यान जुड़ा हो।” धनतेरस पर यह समझना आवश्यक है कि समृद्धि केवल जेब में नहीं, मन में भी होनी चाहिए।
धन बढ़े — लेकिन ध्यान के साथ
ओशो का कहना था कि —
“मैं धन के विरोध में नहीं हूं। मैं कहता हूं, धन में जियो लेकिन ध्यान का विस्मरण मत करो।”
धन ऊर्जा है, शक्ति है, साधन है — यदि इसका उपयोग जागरूकता से किया जाए तो यह कल्याणकारी बनता है। लेकिन यदि मनुष्य धन को ही जीवन का लक्ष्य बना ले, तो वही धन विनाश का कारण भी बन जाता है।
ओशो कहते हैं — “ध्यान भीतर रहे, धन बाहर। फिर तुम कमल जैसे रहोगे — पानी में रहकर भी उससे अछूते।”
धन साधन है, साध्य नहीं
धन का उद्देश्य जीवन को सुगम बनाना है, न कि जीवन को ही निगल जाना।
जब मनुष्य केवल धन कमाने में डूब जाता है, तब वह प्रेम, सत्य, ईमानदारी और सादगी जैसे बड़े धन खो देता है।
ओशो कहते हैं — “मैं चाहता हूं कि संसार इतना समृद्ध हो कि देवता भी पृथ्वी पर जन्म लेने को तरसें। लेकिन यह भी समझो — धन सब कुछ नहीं है।”
भीतर के हीरे — जो कोहिनूर से भी चमकते हैं
सच्चा धन वह है जो भीतर है — प्रेम, करुणा, ईमानदारी, सरलता और अहंकारमुक्ति।
ये वे रत्न हैं जो किसी बाजार में नहीं मिलते, लेकिन जिनके पास ये हैं, वह भीतर से राजा है।
“कोहिनूर फीका पड़ जाए ऐसे भी हीरे हैं — ये भीतर के हीरे हैं।”
— ओशो
मुल्ला नसीरुद्दीन की फर्म और धन का मज़ाक
ओशो अपने प्रवचनों में हास्य के माध्यम से गहरी बात कह जाते हैं।
एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन से किसी ने पूछा —
“सुना है तुमने नई फर्म बनाई है, कितने साझीदार हैं?”
मुल्ला बोले — “चार तो घर के लोग हैं, और एक पुराना मित्र — कुल पांच पार्टनर।”
नाम रखा गया — मेसर्स मुल्ला एंड मुल्ला एंड मुल्ला एंड मुल्ला एंड अब्दुल्ला कंपनी।
जब पूछा गया कि “यह अब्दुल्ला कौन?”
मुल्ला बोले — “दुख की बात है, पैसा तो उसी बेवकूफ का लगा है!”
ओशो कहते हैं — यही तो आज की सच्चाई है!
रिश्ते भी पैसों पर टिके हैं। मित्रता भी अब लाभ की गणना पर होती है।
धन का अर्थ शोषण नहीं, सृजन है
हम धन को केवल एक जेब से दूसरी जेब में घूमने वाला मान बैठे हैं।
ओशो कहते हैं —
“सच्चे समृद्ध देश जानते हैं कि धन शोषण नहीं, सृजन है।”
भारत की गरीबी धन की कमी से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण की कमी से है। हमने मेहनत और तकनीक की जगह पूजा-पाठ और मूढ़ मान्यताओं को अधिक महत्व दिया है।
“दरिद्र नारायण” की विडंबना
ओशो तंज कसते हुए कहते हैं —
“जब तुम गरीब को ‘दरिद्र नारायण’ कहोगे, तो उसकी दरिद्रता मिटाओगे कैसे? भगवान को कौन मिटाता है? उसकी पूजा तो करनी पड़ती है।”
गरीबी की पूजा करने से गरीबी जाती नहीं।
वास्तविक करुणा गरीब को ‘नारायण’ कहने में नहीं, बल्कि उसे आत्मनिर्भर बनाने में है।
मशीन, तकनीक और आधुनिकता से समृद्धि
ओशो का स्पष्ट मत था कि —
“मशीनों का जितना उपयोग होगा, मनुष्य का उतना श्रम बचेगा। और बचा हुआ श्रम ऊंचाइयों में लगाया जा सकता है।”
उन्होंने कहा कि भारत को औद्योगिक और तकनीकी रूप से मजबूत होना होगा।
“अगर हम रेलगाड़ी, टेलीग्राफ और मशीनों के विरोध में रहेंगे, तो सदैव दरिद्र रहेंगे,” ओशो ने कहा था।
धन से पहले ध्यान
धनतेरस के अवसर पर ओशो का यह संदेश हर युग में प्रासंगिक है —
धन का सृजन करो, उसका आनंद लो, लेकिन ध्यान का स्मरण बनाए रखो।
धन तभी मंगलमय है जब वह करुणा, सत्य और सजगता के साथ जुड़ा हो।
“धन बढ़े, ध्यान भी बढ़े — यही सच्ची समृद्धि है।”
— ओशो



