“प्रेम की कला: जिसे हम जानते नहीं, फिर भी जीने का दावा करते हैं”_ ओशो
ओशो- हम अपने बच्चों को चलना सिखाते हैं तो ही वे चलना सीख पाते हैं। असल में आदमी के भीतर अनंत संभावना है, आदमी बहुत लिक्विडिटी है, वह बहुत तरल है। उसे हम जो सिखाते हैं, वह वही होना शुरू हो जाता है। लेकिन प्रेम के संबंध में बड़ा दुर्भाग्य है। आदमी को ऐसा ख्याल है कि प्रेम हम जानते ही हैं। वह एकदम सरासर झूठी बात है। और इसलिए उस प्रेम के किनारे ही हमारी नाव टकरा कर नष्ट हो जाती है। न तो पुरुष प्रेम जानते हैं, और न स्त्रियां प्रेम जानती हैं। प्रेम की भी बहुत बड़ी व्यवस्था और सुविधा होनी चाहिए, जहां प्रेम सीखा जा सके। जैसे, उदाहरण के लिए, जो आदमी प्रेम सीखेगा, उस आदमी से ईष्र्या विदा हो जानी चाहिए क्योंकि ईष्र्या और प्रेम का एक साथ अस्तित्व नहीं हो सकता। लेकिन सभी स्त्रियां प्रेम करती हैं, सभी पुरुष प्रेम करते हैं, लेकिन साथ में ईष्र्या का जहर पूरी तरह खड़ा रहता है। यह ऐसा ही है जैसे कि हमने फल तो बहुत अच्छा बोया, लेकिन रोज उसमें जहर भी पानी में सींचते गए। तो वह मीठा फल जो था, वह जहरीला होकर खतरनाक हो जाता है। ईष्र्या जहां है, वहां प्रेम संभव नहीं है।
ईष्र्या और प्रेम का कोई संबंध ही नहीं है। लेकिन जैसा मैंने कहा कि स्त्री और पुरुष के मनस में एक फर्क है–पुरुषों का मन एक्टिव है, सक्रिय है, इसलिए पुरुषों का मूल दुर्गुण अहंकार है। और स्त्रियों का मन पैसिव है, निष्क्रिय है, इसलिए स्त्रियों का मूल दुर्गुण ईष्र्या है।
ईष्र्या निष्क्रिय हुआ अहंकार है और अहंकार सक्रिय हो गई ईष्र्या है।
पुरुष अहंकार से मरे जाते हैं और स्त्रियां ईष्र्या से मरी जाती हैं। उनका सारा चैबीस घंटे का जीवन, जन्म से लेकर मरने तक ईष्र्या के केंद्र की परिधि पर घूमता है, इसलिए जब एक स्त्री दूसरी स्त्री से मिलती है तो जो बात उसे सबसे पहले दिखाई पड़ती है, गहने क्या हैं, कपड़े क्या हैं, घड़ी कैसी है, घड़ी का पट्टा कैसा है, चप्पल कैसी है–सबसे पहले एकदम दिखाई पड़ जाता है! व्यक्ति नहीं दिखाई पड़ता, यह सब दिखाई पड़ जाता है। ये उसकी ईष्र्या के बिंदु हैं। आश्चर्यजनक है, लेकिन सत्य है। दो स्त्रियों को साथ रखना बहुत कठिन मामला है। उनको घंटे भर भी साथ रखना बहुत कठिन मामला है। हां, एक ही रास्ता हो सकता है कि वे तीसरी स्त्री की ईष्र्या में निंदा कर रही हों, तो घंटे भर बैठ सकती हैं।
ईष्र्या जिनका जीवन आधार बन गया हो उनसे प्रेम की संभावना कम हो जाएगी। लेकिन ईष्र्या ही उसका सारा व्यक्तित्व हो गया है। अगर घर भी सजाया जा रहा है तो घर सजाने का रस नहीं है कारण, पड़ोस के घर से हो गई ईष्र्या है। अगर कार की गद्दियां बदली जा रही हैं तो कार की गद्दियां बदली जाएं, स्वच्छ हों, ताजी हों, नई हों, अच्छी हों, यह कारण नहीं है, कलात्मक हों, यह कारण नहीं है, पड़ोस के घर की गाड़ी की गद्दियां बदल गई हैं! सारा व्यक्तित्व जैसे ईष्र्या से चल रहा है। इसलिए स्त्रियों के फैशन का कोई भरोसा नहीं कि तीन महीने चलेगी, छह महीने चलेगी, कितनी देर चलेगी। उसका कुल कारण इतना है कि एक स्त्री भी सारी स्त्रियों को ईष्र्या से भर सकती है और फैशन फौरन बदल जाएगा।
पश्चिम में तो कपड़ों के दुकानदार सुंदर स्त्रियों को पाल कर रखे हुए हैं। जिनके कपड़े वे छह महीने में बदल देते हैं। उनके कपड़े बदले कि बाकी सभी स्त्रियों के पुराने कपड़े बेकार हो जाते हैं। फिल्म अभिनेत्रियां सारी दुनिया के कपड़े वाले और फैशन के सामान वाले खरीद कर रखे हुए हैं।
अभी मैं एक घटना पढ़ रहा था, अमरीका की एक बड़ी फिल्म अभिनेत्री ग्रेटा गार्बो, उससे कोई पूछने गया था कि तुम्हारे चेहरे पर जो इतना लावण्य है, इतना सौंदर्य है, इसका कारण क्या है? उसने कहा कि पंद्रह दिन बाद बता सकूंगी। उसने कहा: क्यों, अभी पता नहीं? उसने कहा: अभी मेरी दो साबुन की कंपनियों से बातचीत चलती है, जिससे ज्यादा तय हो जाए, वही साबुन मेरे सौंदर्य का कारण है। पंद्रह दिन बाद यह तय होगा! अभी बातचीत चलती है, निगोसिएशंस चल रहे हैं। कौन कंपनी ज्यादा पैसा दे सकती है, वही साबुन मेरे सौंदर्य का कारण बन जाएगा।
इसलिए साबुन की फोटो अकेली नहीं छापनी पड़ती है। अकेली साबुन की फोटो से कोई प्रभावित न होगा। साथ में एक सुंदर स्त्री छापनी पड़ती है, बस, फिर वह साबुन और स्त्रियों के मन को पकड़ लेता है। क्या आपको पता है, आज दुनिया की सारी उद्योग की व्यवस्था का पचहत्तर प्रतिशत स्त्रियों के साज सामान, पाउडर, साबुन, कपड़े इत्यादि में नष्ट हो रहा है। पहले पाउडर खरीदना पड़ता है, फिर उस पाउडर को धोने के लिए साबुन खरीदनी पड़ती है। फिर साबुन पाउडर को धो डालती है तो फिर पाउडर खरीदना पड़ता है और वह सिलसिला चलता रहता है। पचहत्तर प्रतिशत सारे मनुष्यों की शक्ति स्त्रियों की इस व्यवस्था में व्यय हो रही है और वह रोज बदल जाती है, क्योंकि अगर एक ही साबुन चलती रहे तो कितने उद्योगपति उससे लाभ उठा सकते हैं? और अगर एक ही पाउडर चलता रहे तो कितने उद्योगपति उससे लाभ उठा सकते हैं? और अगर एक ही फैशन रहे तो फिर कपड़ों की कितनी जाति पैदा की जा सकती हैं? फिर बहुत मुश्किल हो जाए। और इस सबके बुनियाद में स्त्री की ईष्र्या को समझ लिया गया है। आज धंधेबाज, विज्ञापनदाता सब स्त्री की ईष्र्या को समझ लिए हैं। यह तो मजे की बात है।
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
ओशो का दृष्टिकोण: प्रेम की शिक्षा क्यों जरूरी है
“हम अपने बच्चों को चलना सिखाते हैं तो ही वे चलना सीख पाते हैं।”
ओशो कहते हैं — इंसान के भीतर अनंत संभावना है। वह बहुत तरल (Liquid) है, उसे जैसा सिखाया जाता है, वह वैसा बन जाता है। लेकिन प्रेम के विषय में हमारी सबसे बड़ी भूल यही है कि हम यह मान बैठे हैं — “प्रेम तो हम जानते ही हैं।”
असल में यही झूठ हमारी जीवन नाव को किनारे से टकरा देता है।
प्रेम की शिक्षा का अभाव: मनुष्य की सबसे बड़ी भूल
न तो पुरुष प्रेम जानते हैं, न स्त्रियां।
प्रेम के लिए भी एक व्यवस्थित शिक्षा और साधना की आवश्यकता है। जैसे कोई चलना या बोलना सीखता है, वैसे ही प्रेम को भी सीखा जाना चाहिए।
ओशो कहते हैं — जो व्यक्ति सच में प्रेम सीखेगा, उसके भीतर से ईर्ष्या अपने आप समाप्त हो जाएगी। क्योंकि प्रेम और ईर्ष्या का एक साथ अस्तित्व संभव नहीं है।
ईर्ष्या: प्रेम के फलों में मिला ज़हर
हम सभी प्रेम तो करते हैं, लेकिन उसके साथ ईर्ष्या का ज़हर भी सींचते रहते हैं।
परिणामस्वरूप — जो प्रेम मीठा फल बन सकता था, वह विषैला और खतरनाक हो जाता है।
“जहां ईर्ष्या है, वहां प्रेम संभव नहीं है।” — ओशो
पुरुष और स्त्री के मन का अंतर
ओशो के अनुसार, पुरुष और स्त्री के मन में मूलभूत अंतर है —
- पुरुष का मन सक्रिय (Active) होता है, इसलिए उसका मूल दुर्गुण अहंकार है।
- स्त्री का मन निष्क्रिय (Passive) होता है, इसलिए उसका मूल दुर्गुण ईर्ष्या है।
ओशो कहते हैं —
“ईर्ष्या निष्क्रिय हुआ अहंकार है, और अहंकार सक्रिय हुई ईर्ष्या।”
पुरुष अहंकार से नष्ट होते हैं, और स्त्रियां ईर्ष्या से।
उनका जीवन, व्यवहार और संबंध इसी केंद्र के इर्द-गिर्द घूमता है।
स्त्रियों की ईर्ष्या और फैशन की दुनिया
ओशो बड़े रोचक ढंग से बताते हैं — जब दो स्त्रियां मिलती हैं तो सबसे पहले वे व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके कपड़े, गहने, चप्पल, घड़ी का पट्टा देखती हैं।
यही उनकी ईर्ष्या के बिंदु हैं।
“दो स्त्रियों को साथ रखना कठिन है — जब तक वे किसी तीसरी की निंदा न कर रही हों।”
ईर्ष्या से प्रेरित यह प्रवृत्ति फैशन जगत की नींव बन गई है।
एक स्त्री का नया परिधान बाकी स्त्रियों में ईर्ष्या जगाता है — और फैशन तुरंत बदल जाता है।
यही कारण है कि फैशन का कोई स्थायित्व नहीं होता।
विज्ञापन और उद्योग: ईर्ष्या की अर्थव्यवस्था
ओशो कहते हैं — आज पूरी दुनिया के उद्योगपतियों ने स्त्री मन को समझ लिया है।
विज्ञापनदाता जानते हैं कि स्त्री की ईर्ष्या ही उनका सबसे बड़ा बाजार है।
“दुनिया की 75% उद्योग व्यवस्था स्त्रियों के साज-सामान — पाउडर, साबुन, कपड़े आदि पर टिकी है।”
यह चक्र अनवरत चलता रहता है —
पहले पाउडर, फिर उसे धोने के लिए साबुन, फिर नया पाउडर —
और इस सबके पीछे सिर्फ एक भावना — ईर्ष्या और तुलना।
स्त्री की पसंद ही तय करती है बाजार
ओशो बताते हैं — अमेरिका के एक सर्वे के अनुसार:
- स्त्रियां अपनी चीजें 100% अपनी पसंद से खरीदती हैं।
- पुरुष भी जो चीजें खरीदते हैं, उनमें से 70% में स्त्रियों की पसंद शामिल होती है।
किस रंग की कार खरीदनी है, कौन-से कपड़े पहनने हैं —
ज्यादातर निर्णय पत्नी या स्त्री की पसंद से तय होते हैं।
इसीलिए पश्चिम के विज्ञापनदाता अब पुरुषों की चिंता छोड़ चुके हैं।
उनका पूरा ध्यान स्त्रियों पर है — क्योंकि वही असली बाजार की निर्णायक शक्ति हैं।
ओशो का निष्कर्ष: प्रेम सीखे बिना जीवन अधूरा
ओशो का अंतिम संदेश स्पष्ट है —
प्रेम एक कला है, एक साधना है।
इसे बिना सीखे केवल भावनात्मक दावा करना, खुद को छलना है।
“प्रेम को सीखो — क्योंकि जहां ईर्ष्या, तुलना और अहंकार हैं, वहां प्रेम का फूल कभी नहीं खिल सकता।”
ओशो का यह संदेश आधुनिक समाज के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था।
आज जब प्रेम भी बाज़ार और अहंकार के जाल में फंस चुका है —
ओशो हमें याद दिलाते हैं कि प्रेम सीखना ही जीवन को जीना सीखना है।



