भिलाई-चरोदा में महापौर की कुर्सी पर सियासी गर्मी: वर्षों की मेहनत बनाम नए दावेदार, किसके सिर सजेगा ताज?

भिलाई-चरोदा। आगामी नगर निगम चुनाव को लेकर भिलाई-चरोदा की राजनीति में अभी से हलचल तेज होने लगी है। चुनाव की तारीखों की घोषणा भले बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दलों के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा में महापौर पद के संभावित चेहरे को लेकर हो रही है।

राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद पार्टी के हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में लगातार नजर आने वाले एक नेता की दावेदारी को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा है। बताया जा रहा है कि उक्त नेता पिछले कुछ वर्षों से पार्टी की गतिविधियों में सक्रियता दिखा रहे हैं और सरकार बनने के बाद उनकी सक्रियता और अधिक नजर आने लगी है।

लेकिन राजनीति में असली सवाल यहीं से शुरू होता है—सक्रियता का हिसाब कितने साल का होगा और स्थानीय स्वीकार्यता का पैमाना क्या होगा?

स्थानीय चेहरा चाहिए, यह आवाज क्यों उठ रही?

भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के लोगों के बीच चर्चा है कि महापौर पद के लिए ऐसा उम्मीदवार सामने आना चाहिए, जो लंबे समय से निगम क्षेत्र में पार्टी के लिए काम कर रहा हो और जिसे स्थानीय जनता तथा कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी स्वीकार्यता हासिल हो।

स्थानीय कार्यकर्ताओं का मानना है कि महापौर केवल पार्टी का चेहरा नहीं होता, बल्कि पूरे नगर निगम क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है। इसलिए उम्मीदवार ऐसा होना चाहिए, जो वार्डों की समस्याओं, स्थानीय मुद्दों और जनता की जरूरतों से जमीन पर जुड़ा हुआ हो।

यही वजह है कि अब पार्टी के भीतर एक महत्वपूर्ण सवाल उठने लगा है—क्या महापौर पद की दावेदारी में स्थानीय और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की वर्षों की मेहनत को प्राथमिकता मिलेगी?

वर्षों की मेहनत बनाम कुछ वर्षों की सक्रियता

भाजपा में ऐसे कई स्थानीय वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने निगम क्षेत्र में पार्टी के लिए लंबे समय से दिन-रात मेहनत की है। संगठन के कठिन दौर में भी पार्टी के साथ खड़े रहे, चुनावों में काम किया और स्थानीय स्तर पर संगठन को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाई।

अब जब नगर निगम चुनाव सामने हैं और महापौर पद के लिए दावेदारी की चर्चा शुरू हुई है, तो स्वाभाविक रूप से इन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की उम्मीदें भी बढ़ी हैं।

यहीं पर राजनीतिक चर्चा में एक व्यंग्यात्मक सवाल भी तैर रहा है—क्या वर्षों से निगम क्षेत्र में पार्टी के लिए दिन-रात काम करने वाले स्थानीय वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को पार्टी महापौर पद का दावेदार बनाकर क्षेत्र की जनता और स्थानीय कार्यकर्ताओं का मान रखेगी, या फिर पिछले कुछ एक-दो वर्षों से सक्रिय नजर आ रहे किसी नेता की मेहनत को प्राथमिकता मिलेगी?

मेहनत का इनाम आखिर कब?

राजनीति में कार्यकर्ता वर्षों तक संगठन के लिए मेहनत करता है तो उसके मन में कहीं न कहीं यह उम्मीद रहती है कि जब अवसर आएगा, पार्टी उसकी निष्ठा और मेहनत को जरूर पहचानेगी।

लेकिन चुनावी राजनीति का गणित थोड़ा अलग होता है। यहां केवल मेहनत नहीं, बल्कि जीतने की क्षमता, जनाधार, सामाजिक समीकरण, संगठनात्मक स्वीकार्यता और पार्टी नेतृत्व का भरोसा जैसे कई पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

ऐसे में अगर किसी वरिष्ठ स्थानीय कार्यकर्ता को दरकिनार कर अपेक्षाकृत नए चेहरे को महापौर पद की दौड़ में आगे किया जाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ता सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनने के लिए हैं?

वहीं दूसरी ओर यदि पार्टी वर्षों से सक्रिय स्थानीय वरिष्ठ कार्यकर्ता को मौका देती है तो इसे संगठन में पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान के रूप में देखा जा सकता है।

फैसला पार्टी का, नजरें कार्यकर्ताओं की

फिलहाल भाजपा के भीतर महापौर पद को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कौन दावेदार होगा, किसके नाम पर सहमति बनेगी और किस चेहरे को पार्टी नेतृत्व हरी झंडी देगा, यह आने वाला समय बताएगा।

लेकिन इतना जरूर है कि इस बार भिलाई-चरोदा में महापौर पद का टिकट केवल एक व्यक्ति का राजनीतिक भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि यह संदेश भी देगा कि पार्टी अपने जमीनी और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की वर्षों की मेहनत को कितना महत्व देती है।

अब गेंद भाजपा के संगठन और नेतृत्व के पाले में है।

क्या पार्टी वर्षों से निगम क्षेत्र में दिन-रात मेहनत करने वाले स्थानीय वरिष्ठ कार्यकर्ता को महापौर पद का दावेदार बनाकर जनता और कार्यकर्ताओं का मान रखेगी? या फिर पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय किसी नए चेहरे को अवसर देकर एक अलग राजनीतिक संदेश देगी?

भिलाई-चरोदा की जनता और भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता फिलहाल इसी सवाल के जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

क्योंकि राजनीति में सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि “कौन कितना दिखाई दे रहा है?”
कभी-कभी असली सवाल यह भी होता है कि “जब कोई दिखाई नहीं देता था, तब पार्टी के लिए कौन खड़ा था?”