भिलाई-चरोदा में विकास की राजनीति या राजनीति का विकास? कांग्रेस के गढ़ में भाजपा के दरबार तक क्यों पहुंची विकास की फाइल!

 भिलाई-चरोदा में विकास की राजनीति या राजनीति का विकास? कांग्रेस के गढ़ में भाजपा के दरबार तक क्यों पहुंची विकास की फाइल!

भिलाई-चरोदा। भिलाई-चरोदा नगर निगम की राजनीति इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा सियासी समीकरणों और सत्ता के गलियारों में चल रही खींचतान को लेकर सुर्खियों में है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नगर निगम में महापौर और सभापति दोनों कांग्रेस के हैं, तो फिर विकास कार्यों की राह आसान कराने के लिए कांग्रेस के एक सम्मानित, लोकप्रिय और वरिष्ठ नेता को भाजपा विधायक और भाजपा मंडल अध्यक्षों से चर्चा करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

सूत्रों की मानें तो नगर विकास से जुड़ी कुछ योजनाओं को लेकर कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता ने भाजपा के स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व से चर्चा की है। यह बात सामने आते ही भिलाई-चरोदा की सियासत में चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जनादेश कांग्रेस को मिला है, तो विकास की मंजूरी के लिए राजनीतिक चाबी भाजपा के पास कैसे पहुंच गई?

महापौर-सभापति कांग्रेस के, फिर भाजपा के दरबार में विकास की गुहार?

नगर निगम की सत्ता कांग्रेस के हाथ में है। महापौर कांग्रेस का, सभापति कांग्रेस का और निगम में निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी मौजूद हैं। इसके बावजूद यदि किसी विकास योजना को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता को भाजपा विधायक और मंडल अध्यक्षों से समन्वय करना पड़े, तो यह केवल राजनीतिक शिष्टाचार का विषय नहीं, बल्कि नगर निगम की कार्यप्रणाली और राजनीतिक प्रभाव को लेकर बड़ा सवाल बन जाता है।

सियासी गलियारों में अब व्यंग्य भी शुरू हो गया है—

“कुर्सी कांग्रेस की, निगम कांग्रेस का… लेकिन विकास की चाबी भाजपा के पास?”

एक तरफ चर्चा, दूसरी तरफ टेंडर पर दबाव की बात!

मामला और भी दिलचस्प तब हो जाता है, जब सूत्रों के हवाले से यह चर्चा सामने आती है कि जिन विकास कार्यों को लेकर भाजपा के जनप्रतिनिधियों से चर्चा की गई, उन्हीं कार्यों के टेंडर को लेकर भाजपा के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की ओर से दबाव बनाए जाने की बात कही जा रही है।

यदि यह चर्चा सही है तो सवाल और गंभीर हो जाता है—आखिर विकास कार्यों की दिशा और दशा तय कौन कर रहा है? नगर निगम की निर्वाचित सत्ता या राजनीतिक दबाव का समीकरण?

यानी एक तरफ विकास कार्यों के लिए बातचीत, दूसरी तरफ उसी काम की निविदा को लेकर कथित दबाव। इसे राजनीति कहें, रणनीति कहें या फिर सत्ता के बाहर से सत्ता चलाने का नया मॉडल—फैसला जनता करे।

कांग्रेस के लिए सवाल, भाजपा के लिए सियासी मौका

भिलाई-चरोदा की जनता के बीच इस घटनाक्रम को लेकर चर्चाएं इसलिए भी तेज हैं, क्योंकि कांग्रेस के एक वरिष्ठ और लोकप्रिय नेता का भाजपा के नेताओं से विकास कार्यों को लेकर संपर्क करना राजनीतिक रूप से अलग संदेश दे रहा है।

विपक्ष को स्वाभाविक रूप से कांग्रेस पर निशाना साधने का मौका मिल गया है। वहीं कांग्रेस के भीतर भी यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि निगम की सत्ता अपने स्तर पर विकास कार्यों को आगे बढ़ाने में सक्षम है, तो फिर भाजपा के राजनीतिक नेतृत्व के सामने जाने की नौबत क्यों आई?

विकास की फाइल अटकी है या सियासत की पटकथा तैयार है?

भिलाई-चरोदा में अब असली सवाल विकास कार्यों का नहीं, बल्कि विकास पर प्रभाव किसका है, इसका बनता जा रहा है।

जनता के लिए सड़क, नाली, पानी, प्रकाश और अन्य विकास कार्य जरूरी हैं। जनता को इससे कोई खास मतलब नहीं कि फाइल कांग्रेस के कमरे से चली या भाजपा के दरवाजे से। लेकिन जब विकास कार्यों के पीछे राजनीतिक खींचतान की तस्वीर दिखाई देने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

शहर में अब एक और व्यंग्य तैर रहा है—

“महापौर कांग्रेस का, सभापति कांग्रेस का और निगम की सत्ता कांग्रेस की… फिर विकास के लिए भाजपा से ‘एनओसी’ की जरूरत क्यों?”

बेशक, यह केवल राजनीतिक व्यंग्य है, लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल काफी गंभीर है।

अब टेंडर खुलेगा या राजनीति का ताला लगेगा?

फिलहाल पूरे मामले में संबंधित पक्षों की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इसलिए सूत्रों से सामने आ रही चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि किया जाना बाकी है। लेकिन इतना जरूर है कि इस घटनाक्रम ने भिलाई-चरोदा की राजनीतिक बहस को नया विषय दे दिया है।

अब नजर इस बात पर है कि जिन विकास कार्यों को लेकर इतनी राजनीतिक कवायद की चर्चा है, उनके टेंडर समय पर खुलते हैं या फिर राजनीतिक रस्साकशी विकास की फाइल पर ही ताला लगा देती है।

क्योंकि सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि विकास कौन कराएगा?

सवाल यह भी है कि—

“भिलाई-चरोदा में विकास की सरकार कांग्रेस की है या विकास की चाबी किसी और के हाथ में?”