“नगर विकास की दौड़ इतनी तेज कि महापुरुषों की प्रतिमाओं को ही भूल गई नगरपालिका, करोड़ों का महामाया गार्डेन बना बदहाली का प्रतीक”

 “नगर विकास की दौड़ इतनी तेज कि महापुरुषों की प्रतिमाओं को ही भूल गई नगरपालिका, करोड़ों का महामाया गार्डेन बना बदहाली का प्रतीक”

कुम्हारी | विशेष रिपोर्ट

कुम्हारी नगर पालिका इन दिनों विकास के बड़े-बड़े दावे करने में व्यस्त है। कहीं सड़क निर्माण के पोस्टर लग रहे हैं, कहीं योजनाओं के बैनर चमक रहे हैं, तो कहीं विकास यात्रा की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैर रही हैं। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच वार्ड क्रमांक-3 स्थित करोड़ों की लागत से बना महामाया गार्डेन आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।पूर्व नगर पालिका कार्यकाल में लगभग 2 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए इस गार्डेन का मार्च 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़े उत्साह के साथ उद्घाटन किया था। उस समय इसे कुम्हारी शहर की पहचान और आधुनिक विकास का प्रतीक बताया गया था। लेकिन चार साल भी पूरे नहीं हुए और गार्डेन की हालत देखकर ऐसा लगता है मानो उद्घाटन के बाद इसे प्रशासन ने भगवान भरोसे छोड़ दिया हो।

बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटें, सूखते पौधे, टूटती प्रतिमाएं और वीरान पड़ा गार्डेन अब विकास मॉडल पर सवाल खड़े कर रहा है।

गार्डेन में लगी स्ट्रीट लाइटें महीनों से बंद पड़ी हैं। शाम होते ही पूरा परिसर अंधेरे में डूब जाता है। बच्चों के खेलने की जगह अब असुरक्षा और अव्यवस्था का केंद्र बनती जा रही है। लाखों रुपये खर्च कर लगाए गए पौधे पानी और देखरेख के अभाव में सूखने लगे हैं। वहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी समेत अन्य महापुरुषों की प्रतिमाएं भी जर्जर होती दिखाई दे रही हैं।विडंबना देखिए कि जिस राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वच्छता, जनहित और जिम्मेदारी का संदेश दिया, उन्हीं की प्रतिमा के आसपास आज उपेक्षा की धूल जमी हुई है। नगरपालिका विकास की नई इबारत लिखने में इतनी व्यस्त हो गई कि उसे अपने ही शहर की पहचान और महापुरुषों के सम्मान की सुध लेना जरूरी नहीं लगा।

“क्या विकास सिर्फ उद्घाटन मंच और फोटो तक सीमित है? करोड़ों खर्च कर बनाए गए गार्डेन की देखरेख की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?”स्थानीय लोगों का कहना है कि गार्डेन की हालत लगातार खराब होती जा रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी केवल कागजी विकास में मशगूल हैं। नगरवासियों का आरोप है कि करोड़ों की योजनाओं का प्रचार तो खूब होता है, लेकिन रखरखाव के नाम पर प्रशासन पूरी तरह मौन साध लेता है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या नगर विकास का मतलब सिर्फ नए निर्माणों का उद्घाटन करना है? क्या जनता के टैक्स से बने सार्वजनिक स्थलों की देखरेख प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं? अगर करोड़ों की लागत से बना महामाया गार्डेन ही अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो शहर के बाकी विकास कार्यों का भविष्य क्या होगा?

फिलहाल महामाया गार्डेन की टूटी व्यवस्था और उपेक्षित प्रतिमाएं नगर पालिका के विकास मॉडल पर बड़ा सवाल बनकर खड़ी हैं।