“सेंक्शन अमाउंट का खेल: निगम में फाइलें नहीं, ‘फॉर्मूला’ तय करता है विकास!”
भिलाई-चरौदा | विशेष रिपोर्ट
भिलाई-चरौदा नगर निगम इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा “सेंक्शन अमाउंट” के रहस्यमयी खेल को लेकर सुर्खियों में है।
यहां सड़कों, नालियों और मूलभूत सुविधाओं की चर्चा कम, जबकि फाइलों के आगे बढ़ने के “अनकहे नियम” ज्यादा चर्चा में हैं।
सूत्रों की मानें तो निगम में कोई भी काम सिर्फ प्रस्ताव और प्रक्रिया से नहीं चलता, बल्कि एक “अदृश्य फॉर्मूला” तय करता है कि फाइल कितनी तेजी से दौड़ेगी और किस ठेकेदार को काम मिलेगा।
सेंक्शन अमाउंट: सिस्टम का असली इंजन?
जनप्रतिनिधियों के अनुसार विकास कार्यों की मंजूरी का सफर अब सीधा नहीं रहा। निगम में राशि आने से पहले ही यह तय हो जाता है कि काम किसे मिलेगा और कब मिलेगा।
अंदरखाने चल रही चर्चाओं में यह साफ है कि—
- फाइल की स्पीड “सेंक्शन अमाउंट” पर निर्भर
- ठेकेदार पहले से आश्वस्त
- जनता अब भी इंतजार में
जनप्रतिनिधि बनाम जमीनी हकीकत
मंचों पर विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाले जनप्रतिनिधियों की निगरानी में यह पूरा खेल चल रहा है—ऐसी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सवाल यह उठता है:
क्या विकास प्राथमिकता है या “सिस्टम सेटिंग”?
ठेकेदारों का ‘संतुलन’
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प पहलू ठेकेदारों का नजरिया है।
वे इस व्यवस्था को समस्या नहीं, बल्कि “प्रक्रिया का हिस्सा” मानते हैं।
एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—
“यहां टेंडर से ज्यादा टेंशन होता है… जब तक सब संतुलन में न आ जाए।”
बड़े नामों की एंट्री?
सूत्रों के मुताबिक इस खेल में सिर्फ छोटे स्तर के लोग ही नहीं, बल्कि बड़े और प्रभावशाली नाम भी जुड़े होने की चर्चा है।
हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
निष्कर्ष (व्यंग्य में सच्चाई)
भिलाई-चरौदा निगम में विकास की गाड़ी जरूर चल रही है,
लेकिन अब सवाल यह है कि—
क्या यह गाड़ी जनता के भरोसे चल रही है, या “सेंक्शन अमाउंट” के ईंधन पर?
अगले अंक में…
इस “सेंक्शन अमाउंट मॉडल” के अंदर छिपे दस्तावेज़, परत-दर-परत खुलासे और कुछ चौंकाने वाले नाम सामने लाए जाएंगे।



