खतरे के दरवाजे बंद हुए तो जीवन भी समाप्त हो जाएगा, क्यों जोखिम, अनिश्चितता और चुनाव के बिना जीवन मृत समान है _ ओशो

ओशो- हर संत का अतीत शैतानी के रास्ते से गुजरता है, लेकिन बच्चे का कोई अतीत नहीं है। बच्चे की पूरी संभावना है अभी कि वह शैतान होगा। और हम चाहेंगे कि वह उस जगह आ जाए जहां चुनाव का क्षण आए। क्योंकि जिस क्षण चुनाव का क्षण है, डिसीजन का, उसी क्षण मनुष्य पैदा होता है। डिसीजन के मूमेंट्स हैं। निर्णय के क्षण में मनुष्यता पहली दफा क्रिस्टलाइज होती है। और जितना बड़ा चुनाव, उतनी बड़ी मनुष्यता का जन्म होता है।

इसलिए मैं उनके पक्ष में नहीं हूं जो आदमी को पीछे लौटाना चाहते हैं–चाहे रूस हो, चाहे टाल्सटाय और चाहे रस्किन और चाहे थोरो और चाहे इमर्सन और चाहे गांधी, ये सारे लोग जो मनुष्य को पीछे लौटाना चाहते हैं और सोचते हैं, पुराने दिन वापस लौट आएं, वे मनुष्य की जिंदगी में बड़े से बड़े खतरे की बात कर रहे हैं। नहीं, कोई पुराना दिन वापस नहीं चाहिए, पुराने दिन की भांति नया आदमी चाहिए।

पुराने दिन वापस लौटाने की कोशिश रिग्रेशन है, वह आदमी को पीछे ढकेलना है। डर तो लगता है, गांव के आदमी को देखते हैं तो लगता है कि कैसा भोला-भाला है! लेकिन लाओ गांव के आदमी को शहर में और पाओगे कि वह चालाक हो गया। लाओ गांव के आदमी को शहर में और पाओगे वह शहर के आदमी से ज्यादा चालाक हो गया है। क्योंकि नया मुसलमान ज्यादा मस्जिद जाता है। चालाकी उसके लिए पहला मौका है। उसकी चेतना तेजी से चालाकी का काम करेगी। इसलिए जब ग्रामीण चालाक होता है तो शहरी चालाक से ज्यादा होगा। शहर के आदमी के लिए चालाकी थिर हो गई है, चारों तरफ का परिचित वातावरण हो गई है।

गांव का आदमी चालाक नहीं है, क्योंकि परिस्थितियां और चेतना चुनाव की नहीं हैं। नहीं, आदमी को पीछे नहीं लौटाना है, आगे ले जाना है। बीसवीं सदी ने जो मौका दिया है, वह मौका बहुत डिसीसिव है, वह मौका बहुत निर्णायक है, और हमें चुनाव का मौका पहली दफा मिला है। इसलिए दूसरी बात आपसे कहना चाहता हूं क्योंकि बीसवीं सदी के मनुष्य का जो विशेष लक्षण है वह चुनाव है, च्वाइस। अब हम जो भी होंगे च्वाइस से होंगे। अब हम वही नहीं हो सकते प्रकृति–प्रकृति ने हमें उस जगह ला दिया है जहां अब हमारा चुनाव काम करेगा।

मेरे हिसाब से बीसवीं सदी पहली दफे ठीक मनुष्य को जन्म दे रही है। निश्चित ही खतरे हैं। चुनाव के साथ खतरे शुरू हो जाते हैं। लेकिन, जितना बड़ा खतरा है, जीवन की पुलक उतनी बढ़ जाती है। जितना कम खतरा है, जीवन की पुलक उतनी क्षीण हो जाती है। अगर खतरा बिलकुल नहीं है तो जीते और मरे आदमी में कोई फर्क नहीं रह जाता है। कब्र सबसे सुरक्षित जगह है, वहां कोई खतरा नहीं आता। न वहां बीमारी आती, और न कब्र में मौत आ सकती है। अब मरने का भी कोई उपाय नहीं है कब्र के भीतर। वहां सब सुरक्षित है।

मैंने सुना है कि एक सम्राट ने महल बनाया था और ऐसा महल कि जिसमें सब तरह से सुरक्षा थी। उसमें खिड़की दरवाजे नहीं रखे थे, सिर्फ एक दरवाजा रखा था क्योंकि कहीं कोई चोर, कहीं कोई बीमारी, कहीं कोई दुश्मन कहीं से घुस न जाएं। एक दरवाजा था और एक दरवाजे पर हजार सिपाहियों का पहरा था। पड़ोस का राजा उसके महल की खबर सुन कर देखने आया। देख कर उसने कहाः सच में, इतनी सुरक्षित जगह मैंने नहीं देखी। कोई खतरा नहीं है, मैं भी ऐसा महल बनाऊंगा। जब पड़ोस का राजा बाहर द्वार पर विदा ले रहा था और अपने रथ पर सवार हो रहा था तो उसने पुनः-पुनः धन्यवाद दिए और प्रशंसा की और उसने कहा कि ऐसा सुरक्षित महल निश्चित ही होना चाहिए, जहां कोई खतरा न हो।

रास्ते के किनारे बैठा एक भिखारी जोर से हंसने लगा। उस मकान के मालिक राजा ने पूछा कि क्यों हंसते हो? क्या बात हो गई? उस भिखारी ने कहा कि मैं इसलिए हंसता हूं कि आपके मकान को मैंने बनते भी देखा, बन गया भी देखा, दूसरों को प्रशंसा करते भी देखता हूं, लेकिन मुझे एक भूल मालूम पड़ती है। उस राजा ने कहाः कौन सी भूल? उस भिखारी ने कहाः इसमें एक दरवाजा है, यह भी खतरा है। इसको भी बंद करवा लें और भीतर हो जाएं। आप खतरे के बिलकुल बाहर हो जाएंगे। एक दरवाजा भी कुछ खतरा तो है ही। बहुत दरवाजे बहुत खतरा था, एक दरवाजा कुछ खतरा है। लेकिन खतरे के बाहर नहीं हो गए हैं। और दुश्मन चाहे न घुस सके, मौत तो एक दरवाजे से घुस जाएगी। उस राजा ने कहाः पागल, अगर मैं यह दरवाजा भी बंद करके भीतर हो जाऊं तब तो मौत को घुसने की जरूरत ही न रह जाएगी, मैं मर ही जाऊंगा। उस भिखारी ने कहाः करीब-करीब आप मर ही चुके हैं क्योंकि जिंदगी में जितने खतरे के दरवाजे होते हैं उतनी ही जिंदगी होती है। जितने खतरे के दरवाजे कम हो जाते हैं जिंदगी कम हो जाती है। अगर खतरे के सब दरवाजे बंद हो जाएं तो जिंदगी खतम हो जाती है।

बीसवीं सदी ने पहली दफे खतरा लिया है। आज तक आदमी ने खतरे नहीं लिए थे। वह खतरे के बाहर सुरक्षा में जी रहा था। उसने सब तरह की सुरक्षाएं कर रखी थीं; सब तरह की सुरक्षाएं–मानसिक, आध्यात्मिक, सब तरह की सुरक्षाएं। जिंदगी बहुत साफ नक्शे की भांति थी जिसमें खतरे नहीं थे। रास्ते टिके हुए और ठीक से बने हुए थे, रेडीमेड थे।

बीसवीं सदी में पहली दफा आदमी ने अनिश्चित होने का खतरा लिया। आज स्वर्ग निश्चित नहीं है। आज पुण्य करना खतरे से खाली नहीं है। पहले पुण्य करना बिलकुल ही खतरे के बाहर था। आज से पहले पुण्य करना बिलकुल सुनिश्चित बात थी। पुण्य के बाद उसका परिणाम निश्चित था कि स्वर्ग मिलना है, उसमें कोई शक संदेह नहीं था। पाप के बाद नरक मिलना है यह साफ था, यह तय था। जिंदगी बहुत साफ-सुथरी थी। शतरंज की खेल की तरह खाने बंटे हुए थे और रास्ते बंधे-बंधाए थे। जिंदगी में हर चीज का उत्तर था। बीसवीं सदी ने सब उत्तर छोड़ दिए। अब जिंदगी में बंधा हुआ उत्तर कोई भी नहीं है। रेडीमेड आंसर जैसी कोई चीज ही नहीं। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3