“कन्फ्यूजन से कैरेक्टरलेस तक: अधूरी ‘हाँ’ और डगमगाती ‘ना’ का खतरा”, “शिक्षा पद्धति नहीं, स्पष्ट ‘हाँ–ना’ और सम्मान से बनता है बच्चे का चरित्र” _ ओशो

मैडम मांटेसरी की शिक्षा से बच्चों में क्या फर्क पड़ा? वह ठीक है या नहीं?

ओशो- साधारण है, ठीक और गलत बहुत नहीं है मामला। मांटेसरी ने एक हिम्मत की और एक प्रयोग किया है, उस लिहाज से तारीफ की बात है, लेकिन कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि विशेष फर्क जो है वह शिक्षा की पद्धति में कम, मां-बाप के होने के ढंग में और शिक्षक के होने के ढंग में ज्यादा है। वह बहुत सवाल नहीं है। सवाल गहरा है और ज्यादा डीप रूटेड है, वह हममें है। अब जब एक बच्चा आपसे आकर कहता है कि मैं फूल तोड़ लूं? तब आप दो क्षण भी नहीं सोचतीं कि फूल तोड़ने दिया जाए या नहीं। नहीं कहने में इतना मजा आता है कि नहीं। आप यह नहीं सोचते हैं कि फूल तोड़ा जा सकता है तो तोड़ लेने दो। यह सोचने की जरूरत नहीं है। बच्चा कहता है, मुझे बाहर खेलने जाना है, आप कहते हैं, नहीं।

हमारा ‘नहीं’ तो एकदम सामने खड़ा रहता है। वह भी हमारे फ्रस्ट्रेशन का हिस्सा है। हां कहने की हमें भी तो हिम्मत नहीं जुट पाती। मैं तो रोज अनेक घरों में ठहरता हूं। मैं बहुत हैरान होता हूं कि जिन मामलों में कोई जरूरत न थी–अब बच्चा कहता है, बाहर खेलने जाना है, तो मां बिना सोचे–‘नहीं’ तैयार है, वह रेडीमेड है। और बच्चा जानता है कि रेडीमेड उत्तर है, इसने सोच कर नहीं दिया है। क्योंकि अब भी इसको प्रेस किया जा सकता है और यह कहेगी हां। क्योंकि अगर सोच कर दिया गया है तो फिर हां नहीं होना चाहिए दुबारा। क्योंकि अगर बच्चे के अहित में ही है बाहर जाना तो फिर हां कैसे हुआ वह। और अगर हां हो सका दो मिनट बाद तो दो मिनट पहले नहीं होने की क्या जरूरत थी।

यानी मेरा कहना यह है कि ‘हां’ साफ, ‘नहीं’ साफ, और दोनों में कभी कंफ्यूजन नहीं। वह बिलकुल साफ होना चाहिए। तब बच्चा एक तो अपने मां-बाप का क्लीयर इमेज बना पाता है। बड़ी से बड़ी कठिनाई है कि बच्चे के मन में मां-बाप की साफ प्रतिमा नहीं बन पाती कि मां-बाप क्या चाहते हैं। क्या इरादे हैं। वह कभी पकड़ ही नहीं पाता है कि उनका क्या प्रयोजन है। उसे तो पता नहीं कि मां-बाप भी भीतर कंफ्यूज्ड हैं। उन्हें भी पता नहीं कि वे क्या कह रहे हैं, क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं। तो बच्चे के सामने बहुत स्पष्ट प्रतिमा मां-बाप की बननी चाहिए, शिक्षक की बननी चाहिए। तो बच्चे को अपनी प्रतिमा स्पष्ट बनाने में बड़ा सहयोग मिलता है। नहीं तो वह भी वैसा ही एक कंफ्यूज्ड, भ्रमित, उलटे-सीधे खयालों से भरा ह‏ुआ आदमी बन जाता है। और तब उसे पता ही नहीं रहता कि वह कब हां कहे, कब ना कहे। तब एक इनडिसीसिवनेस पैदा होती है जो जिंदगी भर पीछा करती है।

मेरी अपनी समझ में लाखों लोगों की बीमारी इनडिसीसिवनेस है कि वह कभी निर्णय नहीं ले पाते कि हां या नहीं। और अगर लेते हैं तो वह हमेशा हाॅफ हार्टेड होता है। वह हां कहते हैं तो उसमें भीतर किसी परसेंटेज में नहीं भी होता। अगर एक लड़की एक लड़के को हां भरती है कि हां मैं तुझे प्रेम करती हूं तो यह मामला हां का नहीं होता है, यह साठ परसेंट हां, चालीस परसेंट नहीं का होता है। अच्छा, चालीस परसेंट कभी भी पचास परसेंट हो सकता है, क्योंकि मन कोई ऐसी चीज नहीं है। कभी साठ परसेंट हो सकता है। तब पछतावा शुरू हो जाता है। तब मुश्किल हो जाती है। और जिंदगी में सौ प्रतिशत हां निकल सके, सौ प्रतिशत न निकल सके, तो उस आदमी के पास कैरेक्टर होता है, व्यक्तित्व होता है। और अगर हर हां में न का भी परसेंटेज हो और न में हां का परसेंटेज हो, तो वह आदमी अडल्टरेटेड हो जाता है; वह आदमी फिर कैरेक्टरलेस हो जाता है। उसके भीतर कोई कैरेक्टर नहीं होता।

इसलिए मैं तो कहूंगा कि ना कहना, जब ना कहना जरूरी हो, और उस ना को कभी मत बदलना, चाहे उसके लिए खुद जान खोनी पड़े। बेटे को, बेटी को साफ पता चल जाना चाहिए कि मां ने जब ना कहा है तो यह ना अल्टीमेट है। इसका बड़ा उपयोग है। क्योंकि इससे मां के चरित्र का पता चलता है। और बच्चे को भी एक चरित्र बनाने में सहयोग मिलता है।

तो मेरी बड़ी तकलीफ है। मेरी बड़ी तकलीफ यह है कि मैं पुराने से बहुत अंशों में राजी नहीं हूं। उससे भी बड़ी मेरी तकलीफ यह है कि मैं नये से भी बहुत अंशों में राजी नहीं हूं। इसलिए पुराना मुझसे नाराज हो जाता है कि मैंने पुराने को गलत कहा। नया मुझसे नाराज हो जाता है कि मैंने नये को गलत कहा। और मुझसे राजी होना किसी का भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन मेरी नजर में नया और पुराना नहीं, मेरी नजर में मनुष्य है कि वह मनुष्य को क्या लाभ है।

एक छोटी सी घटना, मैं अपनी बात पूरी कर दूं!

रेनपा ने एक संस्मरण में लिखा है–वह पांच साल का बच्चा है और उसके बाप ने रात उसको बुला कर कहा है कि कल सुबह तुझे आश्रम में शिक्षा अध्ययन करने के लिए जाना है। लेकिन हमारे वंश में कभी कोई बच्चा रोता हुआ विद्यालय नहीं गया है। इसलिए ध्यान रखना–पांच साल के बच्चे से–ध्यान रखना हमारे परिवार में कोई बच्चा कभी रोता हुआ स्कूल नहीं गया है! कल सुबह पांच बजे तुम्हें विदा कर दिया जाएगा घोड़े पर और मैं या तुम्हारी मां तुम्हें दरवाजे पर छोड़ने नहीं आएंगे। क्योंकि हो सकता है, हमें देख कर तुम्हें रोना आ जाए। और यह देखना हमारे लिए बहुत कठिन होगा कि हमारा बच्चा भी रोता हुआ स्कूल जा रहा है क्योंकि रोते हुए बच्चे क्या सीख कर वापस लौटेंगे? फिर हमारे घर में ऐसा कभी हुआ नहीं!

यह बाप-दादों की पूरी की पूरी इज्जत का सवाल है! पांच साल के बच्चे से, सुबह नौकर ने उसे उठाया है। रात बारह बजे उसकी मां ने उससे विदा ले ली है कि मैं न आ सकूंगी क्योंकि हो सकता है कि मुझे देख कर तुझे रोना आ जाए। लेकिन हमारे बच्चे कभी रोते नहीं रहे।

सुबह पांच बजे नौकर ने उसे तैयार किया। उसकी आंख में आंसू भर-भर आते हैं, लेकिन वह अपने आंसू पी रहा है क्योंकि उसके पिता ने कहा है कि उनके घर से कभी कोई बच्चा रोता हुआ नहीं गया है। तो यह अशोभन न हो जाए, मैं ही एक ऐसा बच्चा न हो जाऊं जो रोता हुआ जा रहा हो, अपने आंसू पीए वह घोड़े पर बैठ गया है। नौकर ने कहा है, पीछे लौट कर मत देखना, पिता छत पर खड़े होकर देख रहे हैं। इस घर से जब भी कोई बच्चा आश्रम गया है अध्ययन के लिए तो उस मोड़ तक उसने कभी लौट कर पीछे नहीं देखा है। क्योंकि पीछे लौट कर देखने वाले आगे नहीं जा सकते। पांच साल का बच्चा घोड़े पर बैठा, उसकी आंखों में आंसू भरे जा रहे हैं। लेकिन वह पीछे लौट कर नहीं देख रहा है क्योंकि उसका बाप क्या सोचेगा? कभी किसी बच्चे ने पीछे लौट कर नहीं देखा।

यह बड़ी ज्यादती मालूम पड़ सकती है। लेकिन निश्चित, इससे डेफिनेट कैरेक्टर पैदा होगा।

और उसने बाद में लिखा है कि आज मैं अनुभव करता हूं कि उस सुबह, उस सुबह मेरे पिता ने जितना प्रेम मुझे किया, और मेरे सारे वंश की सारी परंपरा का मुझे हकदार और मालिक बनाया और मुझ पर इतना भरोसा किया कि पांच साल का बच्चा बिना रोए, बिना पीछे देखे जाएगा, उससे बड़ा सम्मान मेरे प्रति और क्या हो सकता था–आज! उस दिन तो उसने कहा कि बहुत दुख मुझे था कि बाप कठोर है, दुष्ट है। मां भी कैसी मां है! लेकिन आज मैं जानता हूं कि मुझे कितना सम्मान उन्होंने दिया था पांच साल के बच्चे को कि भरोसा था कि नहीं, उसने लौट कर नहीं देखा। वह मोड़ तक घोड़े पर बैठा रहा।

इसका भी उपयोग है–इसका भी उपयोग है! आज दुनिया में जो इतना दबाव, डाॅमिनेशन के माध्यम से नहीं, सम्मान के माध्यम से, आदर के माध्यम से, तो तो उसके परिणाम व्यापक हो सकते हैं!