“न कहकर नहीं, हाँ के माध्यम से बच्चों को गढ़ना” “स्वतंत्रता नहीं, बच्चों को सम्मान चाहिए”
ओशो– पश्चिम में जो हुआ है वह सुखद नहीं हुआ। वह रिएक्शनरी है, रिवोल्यूशनरी नहीं है। वह प्रतिक्रिया है। जो होना था उससे उलटे जाने का खयाल है। अगर आदमी दो पैर के बल खड़े होकर अच्छी दुनिया नहीं बना पाया तो हम कहते हैं, हम शीर्षासन करके अच्छी दुनिया बना लेंगे। लेकिन आदमी वही रहेगा। शीर्षासन करने से फर्क नहीं पड़ता। सिर्फ इनवर्टेड खड़ा हो जाएगा। सारी दुनिया की पांच-छह हजार वर्ष की शिक्षा की जो व्यवस्था थी, उससे उलटी खड़ी हो गई वह। उसने भी नुकसान पहुंचाया है, यह भी नुकसान पहुंचा रही है। एक ऐसी शिक्षण व्यवस्था चाहिए जो पुरानी पीढ़ी को पूरी की पूरी तरह सहयोग ले लेती हो और फिर भी नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी से आगे जाने में बाधा न बनती हो। अब या हम कहते हैं कि हम बच्चों को स्वतंत्रता दे रहे हैं लेकिन हम देने वाले बीच में खड़े हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता दी।
यह स्वतंत्रता नहीं है, सम्मान की बात मैं कह रहा हूं, स्वतंत्रता की नहीं। बच्चे कोई कैदी नहीं हैं कि जेल की दीवाल तोड़ दी और जंजीरें तोड़ दीं और कहा कि हाथ जोड़ा, अब जाओ। उनको स्वतंत्रता देने से कुछ होने वाला नहीं है। क्योंकि कोई कारागृह ऐसा नहीं है कि हमने उनको छोड़ दिया और मामला समाप्त हो गया। कि अब तुम्हें जहां जाना हो, तुम जा सकते हो। हमारी तरफ से स्वतंत्र हो। यह सम्मान न हुआ, यह आदर न हुआ। यह आने वाले, उगने वाले सूरज के प्रति सदभाव न हुआ। यह सिर्फ क्रोध हुआ कि ठीक है तुम हमारी व्यवस्था को तुम कारागृह कहते हो? तो ठीक है, हम कारागृह के बाहर छोड़े देते हैं। तो एक मां और बाप अपने बेटे को छोड़ दें कि जब तुम्हें चलना हो तो दोनों पैर से चलना, अन्यथा जैसा तुम्हें करना हो। वह कभी दो पैर से खड़ा नहीं होगा। और इसकी बहुत चिंता न करें कि जो मैं कह रहा हूं, वह नया है या पुराना है। क्योंकि सत्य के नये और पुराने होने का कोई सवाल नहीं है। वह सत्य है या नहीं, ठीक है या नहीं, इसकी फिकर करें।
बच्चों को हम जितना डोंट, ‘नहीं’ कहने से बच सकें, उतना अच्छा है। ऐसा पिछले सौ साल के सभी मनस्शास्त्री कहेंगे, लेकिन मैं पूरी तरह राजी नहीं हूं। सारे मनःशास्त्री यह कहेंगे और बहुत दूर तक मैं भी कहूंगा कि बच्चे को जब तक बने हां कहा जा सके, तो न नहीं कहना। और अगर न भी कहना हो, तो उसे अगर हां के रूप में कहा जा सके तो बहुत अच्छा है। जैसे बच्चा एक फूल तोड़ रहा है। तो उसे रोकने की बजाय यह कहना कि फूल मत तोड़ो, उसके हाथ में फव्वारा थमा देना बेहतर है। उससे कहना कि पानी डालो। फूल तोड़ना रुक जाएगा, वह पानी डालने में लग जाएगा। और न कहने से हम बच सकेंगे, क्योंकि न जो है वह उसे बार-बार अत्यंत पीड़ा में डाल जाता है। जहां भी बढ़ता है, वहीं न खड़ा हो जाता है। वह उसकी सीमा बनने लगती है। वह परतंत्र अनुभव करने लगता है, गुलाम मालूम होने लगता है कि कुछ भी करने की स्वतंत्रता नहीं है। न भी कहना हो तो उसको हां के ही रूप में कहने की कोशिश करनी चाहिए। क्रमशः….



