माता–पिता ही बच्चे को सबसे अधिक चोट पहुँचाते हैं—फिर बचा खुचा शिक्षक पूरा कर देते हैं” _ओशो

ओशो- अगर हिटलर को चार बच्चे होते तो हिटलर अच्छा आदमी हो सकता था। अच्छा आदमी इसलिए हो सकता था कि जो मजा उसे बच्चों को डाॅमिनेट करने में मिल जाता, उस मजे को खोजने उसे इतने बड़े युद्ध को करने की जरूरत न होती। वह उसको नहीं मिल पाया।

यह तीसरी बात बहुत खयाल में लेने जैसी है कि शिक्षण की प्रक्रिया दोनों तरफ से यात्रा है। नहीं, बूढ़ा खड़ा रहेगा अपनी जगह सख्त पत्थर की तरह और बच्चे को सीखने आना पड़ेगा अकेला, तो ऐसी शिक्षा किपिल्ड करेगी। नहीं, बूढ़ा भी जाए, बच्चे से मिले हाफ-वे। कहीं जाकर बीच जगह पर मिले, जहां वह बूढ़ा नहीं रह जाऐगा, जहां बच्चा बच्चा नहीं रह जाएगा, जहां दो साथी, दो सहयोगी, दो मित्र सीखने की दुनिया की यात्रा पर निकलें।

मैंने कहा–यह तीसरा तत्व सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, और इसलिए मेरी यह अपनी समझ है कि मां मुश्किल से ही मां होने का मजा ले पाती है। सिर्फ प्रसव की पीड़ा झेलती है। क्योंकि मां होने का जो असली मजा है वह एक ऐसे बच्चे को पा जाना है जिसके साथ हम फिर से बच्चा हो सकें। बाप होने का जो सुख है, वह एक ऐसे बच्चे को पा जाना है, जिसके साथ बाप फिर दौड़ सके, कुश्ती लड़ सके, नाच सके, वह संभव नहीं है। बाप सख्त खड़ा है, वह गंभीर है, गुरु गंभीर। और बच्चा अगर नाच रहा है, तो उसकी आंखें कह रही हैं कि पाप हो रहा है, नरक चले जाओगे, बंद करो। वह गुरु गंभीरता बच्चों के बीच और दूसरी पुरानी पीढ़ी के बीच कोई तादात्म्य, कोई पैसेज, कोई ब्रिज, कोई सेतु नहीं बनने देती। वे अलग खड़े रह जाते हैं, जहां तक मेरी समझ है।

अभी एक युवक ने मुझसे आकर कहा कि मैंने अपनी जिंदगी में शायद अपने पिता से दो सौ शब्द बोले हों। हमारा कोई मिलन ही नहीं होता। मिलन से डरते भी हैं। पिता भी डरता है, बेटा भी डरता है। इसलिए पिता और बेटा एक ही कमरे में छोड़ दिए जाएं, तो उस कमरे में जितना टेंशन होता है, उतना दो दुश्मन भी उस कमरे में छोड़ जाएं, तो नहीं हो सकता। बाप भी परेशान हो जाता है कि हटो यहां से क्योंकि बेटे के सामने वह एक शक्ल कायम रखना चाहता है जो उसकी असली शक्ल नहीं है। बेटे को पता नहीं कि वह भी क्लब में बैठ कर हंसी-मजाक करता है। बेटे को पता ही नहीं कि उसका बाप भी हंस सकता है। लड़की को पता नहीं कि उसकी मां भी कभी किसी को प्रेम कर सकती है, कि उसकी मां भी किसी को प्रेम करती है, कि उसकी मां भी किसी के प्रेम में, किसी की गोदी में बिलकुल ही छोटी और बच्ची हो जाती है, कि उसका बाप भी किसी के प्रेम में किसी के पास जाकर बिलकुल बचपन की बातें बोलने लगता है, तुतलाने वाली बातें बोलने लगता है जो कि उसे पता नहीं।

बाप और मां की एक झूठी इमेज बच्चे के सामने पड़ती है और यह इमेज बहुत क्रिपलिंग है और बहुत पंगु करने वाली है और यही हमारी सारी शिक्षा है। इससे हम बच्चे को विकृत कर देते हैं और नष्ट कर देते हैं। मां-बाप जितना बच्चों को मारते हैं उतना और कोई भी नहीं मारता। उनके बाद मारने वालों में नंबर दो जो है, वह शिक्षक है। हम सब मिल कर उसको मार डालते हैं। फिर बच्चा नहीं रह जाता, सिर्फ बच्चे की जगह हमारी आकांक्षित एक प्रतिमा रह जाती है। अगर बच्चा थोड़ा बलशाली हुआ तो वह रिएक्ट करता है, बगावती हो जाता है। अगर गोबरगणेश हुआ तो राजी होकर सेटल हो जाता है। लेकिन जिंदगी खत्म हो जाती है दोनों हालातों में। अगर बच्चा राजी होकर सेटल हो जाता है और स्थापित जगत का हिस्सा बन जाता है तो वह एक मशीन हो जाता है। अगर बगावती हो जाता है तो चीजों को व्यर्थ ही तोड़ने-फोड़ने लगता है और बनाने की क्षमता खो देता है।

पुराने बच्चों ने पहला विकल्प चुना था, गोबरगणेश होने का, वे राजी हो जाते थे। पांच हजार साल में वह विकल्प बहुत उबाने वाला साबित हुआ। नए बच्चे दूसरा विकल्प चुन रहे हैं कि वे तोड़-फोड़ करके राजी हैं। लेकिन दोनों विकल्प असुंदर हैं और दोनों का जिम्मा गहरे में शिक्षण की प्रक्रिया में हैं। प्रक्रिया वही है।

ये तीन बातें ध्यान में अगर हों तो विस्तार में कैसे करना है, वह तो दूसरी बात है। अगर यह ध्यान में हो, तो होना शुरू हो जा सकता है। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3