“बच्चों को सिखाने में छिपी तानाशाही को पहचानें : ओशो”
ओशो- बच्चे को सिखाना एक प्रोसेस है जिसमें हम दोनों इनवाल्व हो जाते हैं। लेकिन पुरानी दुनिया में ऐसा न था। शिक्षक सिखाने वाला था, बाप सिखाने वाला था, बेटा सीखने वाला था; वर्ग विभाजन सीधा था, साफ था। कोई बताने वाला था, कोई मानने वाला था। लेकिन जो भी लोग शिक्षक की दुनिया से थोड़े-बहुत संबंधित रहे हैं, वे जानते हैं कि बच्चे को सिखाने में दो पीढ़ियों के बीच एनकाउंटर होता है। एक सत्तर साल का वृद्ध एक सात साल के बच्चे को कुछ सिखा रहा है। दो पीढ़ियां सत्तर साल के फासले पर हाथ मिलाती हैं। बड़ी खाई है दोनों के बीच। आर-पार दोनों हाथ फैलाते हैं, सत्तर साल का बूढ़ा सात साल के बच्चे तक हाथ पहुंचाता है। दोनों को सीखने का मौका है, क्योंकि सात साल का नया तत्व सत्तर साल के बूढ़े तत्व को बहुत कुछ सिखाएगा। सत्तर साल का अनुभव, ज्ञान सात साल के नये बच्चे को बहुत कुछ सिखाएगा।
इसलिए शिक्षा के लिए तीसरी बात में मैं कहना चाहता हूं कि कोई सिखाने वाला और कोई सीखने वाला, यह भ्रम अब जाना चाहिए। सीखने की एक प्रक्रिया है। इसलिए अच्छी दुनिया में जब अच्छे स्कूल कभी होंगे, अभी तो कल्पना हो सकती है–वहां पता लगाना मुश्किल होगा कि कौन शिक्षक है और कौन सीख रहा है। वह क्लास सीखने वालों का एक समूह होगा जिसमें पुरानी पीढ़ी भी मौजूद होगी, जिसमें नई पीढ़ी भी मौजूद होगी। नई पीढ़ी भी बहुत कुछ सिखाएगी, क्योंकि नई पीढ़ी बिलकुल नये तत्व लेकर आई है। पुरानी पीढ़ी बहुत कुछ सिखाएगी क्योंकि पुरानी पीढ़ी बहुत कुछ पुराना ज्ञान लेकर आई है।
तो शिक्षण जो है वह, वह एक एकतरफा, वन वे ट्रैफिक नहीं है। मजा तो इसी में है कि मां को, कि वह सिखाए और कोई सीखे; बाप को कि वह सिखाए और कोई सीखे। क्योंकि जब हम किसी को सिखाते हैं तब हिंसा का बड़ा सुख मिलता है। जब भी हम किसी को कुछ सिखाते हैं तो उसकी गर्दन हमारे हाथ में हो जाती है। हम ज्ञानी हो जाते हैं वह अज्ञानी हो जाता है। हम जानने वाले हो जाते हैं, वह न जानने वाला होता है। इसलिए हिंसक वृत्ति कितना रूप ले सकती है इसका हिसाब लगाना मुश्किल है। सबसे सौम्य रूप उसका शिक्षा देने का होता है। किसी को शिक्षा देना, किसी को कुछ सिखाना, और जब हम किसी को कुछ सिखा रहे हैं, तब हमें बड़ा मजा आ रहा है, अहंकार की बड़ी तृप्ति हो रही है कि मैं जानता हूं और तुम नहीं जानते। और कितनी बेहूदी और एब्सर्ड है यह बात कि मां अपने बेटे के सामने इस तरह खड़ी है कि मैं जानती हूं और तुम नहीं जानते। और जब भी कोई यह कहता है, हम जानते हैं और तुम नहीं जानते, हमसे सीखो। तभी वह दूसरे की सीखने की क्षमता को भारी आघात पहुंचा देता है, क्योंकि अहंकार इस दुनिया में शिक्षक नहीं हो सकता।
शिक्षण किसी की तरफ से किसी को सिखाया जाना नहीं है–किसी की तरफ से किसी के लिए आमंत्रण है, निवेदन है, आग्रहहीन। अभी मैं एक छोटी सी किताब पढ़ रहा हूं। यह किताब मुझे बड़ी प्रीतिकर लगी है और एक स्त्री ने लिखी है। वह एक छोटे बच्चे के साथ रहना शुरू करती है। उसकी उम्र सत्तर साल की है। उस छोटे बच्चे की उम्र कोई तीन साल है। वह इस प्रयोग को करती है, जो मैं कह रहा हूं। वह यह नहीं कि वह शिक्षक है और वह शिक्षित है, उसको सिखाया जाना और मुझे सिखाना है, न, हम दोनों साथ रह कर सीखेंगे। तो उसने जो अनुभव लिखा है वह बहुत हैरानी का है।
वह बच्चे को सिखाती ही नहीं, बच्चे से सीखती भी है। अब बच्चा है, समुद्र के किनारे दौड़ रहा है, सीपियों को उठा रहा है। रेत को उठा कर सिर से छू कर उसका स्पर्श कर रहा है, तो वह बूढ़ी औरत भी रेत को उठा कर सिर से उठा कर स्पर्श करती है कि बच्चे को क्या पता चल रहा है, वह मैं भी तो जानूं। बच्चा जब रेत को उठा कर सिर पर डाल रहा है तो बूढ़े आदमी को सिर्फ इतना ही पता चलता है कि बाल खराब कर रहे हो और फिर सफाई करनी पड़ेगी। उससे ज्यादा कुछ पता नहीं चलता क्योंकि वह सिखाने वाला है। लेकिन बच्चा जब रेत को सिर पर डाले चला जा रहा है तो बच्चे को भी कुछ अनुभव हो रहा है जो कि सीखने योग्य हो सकता है।
तो वह बूढ़ी औरत अपने सिर पर भी उस बच्चे के साथ रेत डाल रही है और तब उसने लिखा कि जब बच्चे के साथ समुद्र तट पर खेलते, रेत में दौड़ते, बच्चे के साथ चिल्लाते, तितलियों को पकड़ते, पानी में भागते-गिरते; तब उसने कहा, मैं कई बार भूल जाती हूं कि मेरी उम्र सत्तर वर्ष है। मेरा सारा बचपन वापस लौट आता है। और उस बच्चे के साथ साल भर रह कर उन दोनों के बीच एक सिम्पैथी बनती है जो शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बननी चाहिए। क्योंकि अब वह बच्चा बच्चा है, और बूढ़ी बूढ़ी है, ऐसा नहीं, अब ये दोनों मित्र हैं। अब वह बच्चा आकर उसका हाथ पकड़ कर उससे कहता है कि बाहर एक मेढक आया हुआ है, आवाज बड़ी अदभुत है, चलो। वह उसे घसीट रहा है सत्तर साल की स्त्री को, वह उसके पीछे भागी जा रही है। वह बच्चा एक झाड़ी में छिप कर मेढक की आवाज सुन रहा है और वह बूढ़ी भी उसके पास कान रख कर आवाज सुन रही है।
इतने विनम्र हों माता और पिता और शिक्षक कि बच्चे को सिर्फ सिखाने का मजा न लें, मजा बहुत है सिखाने का। हिंसा है इसलिए मजा है। सिखाने में मजा यह है कि दूसरे को हम अपने हिसाब में ढाल रहे हैं। मैं जब मैं कहता हूं कि आपकी गर्दन थोड़ी ऊंची है, हम थोड़ा छील कर छोटा करेंगे। आपका पैर जरा लंबा है, इसे हम जरा छोटा करके शेप में ला देंगे, तब हम हिंसा का मजा ले रहे हैं। जब बच्चे को कहते हैं कि नहीं, इतने जोर से नहीं चिल्ला सकते हो, तब भी हम हिंसा का मजा ले रहे हैं। जब हम उसको कहते हैं कि ऐसा नहीं कर सकते हो, तब भी हम हिंसा का मजा ले रहे हैं। असल में हम डाॅमिनेशन का मजा ले रहे हैं। शिक्षक जो है वह बहुत गहरे में छिपा हुआ डिक्टेटर है, तानाशाह है। और बच्चे पर जितनी तानाशाही कायम हो सकती है उतनी और किसी पर नहीं हो सकती है। क्रमशः…….



