बाजार और विवाह दोनों को स्त्री-मन ने बना दिया है मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला, स्त्रियां रंगों से नहीं, ईर्ष्या से सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं_ ओशो

ओशो- अमरीका में एक दुकान ने रिसर्च की है, तो उसने इस बात का पता लगवाने की कोशिश की है कि स्त्रियां सर्वाधिक किस रंग से प्रभावित होती हैं। तो अपने डिब्बों पर वही रंग होना चाहिए। इसकी उन्होंने फिकर की और पता लगा लिया। उन्होंने सब रंगों के बाबत जांच-पड़ताल की। तो अब जिस चीज का डिब्बा बनाना हो, मनोवैज्ञानिक सलाह देता है कि अगर इसको ज्यादा बेचना हो तो इस पर यह रंग डालना। स्त्री इस रंग से प्रभावित होती है। यह भी मनोवैज्ञानिक बताता है कि जब दुकान में चीजों को सजाओ तो अलमारी में किस ऊंचाई पर रखना, क्योंकि स्त्री की आंख किस कोण से सर्वाधिक प्रभावित होती है, इसकी भी रिसर्च चलती है और उन्होंने उसका भी अंदाज लगा लिया! अगर कोई चीज कम बेचनी हो तो इतनी ऊंचाई पर रखना है। और ज्यादा बेचनी हों तो इतनी ऊंचाई पर रखना और बिल्कुल न बेचना हो तो इतनी निचाई पर रखना है, वहां नजर ही न जाएगी। तो दुकानदार को जिस चीज में ज्यादा फायदा है, वह स्त्री की आंख के बराबर ऊंचाई पर रखेगा अलमारी में।अभी एक नई उन्होंने फिकर की। एक दुकान बहुत दिनों से उत्सुक थी, आज तो अमरीका में उद्योग बिल्कुल वैज्ञानिक होता चला जाता है, तो सारे बड़े उद्योग बड़े वैज्ञानिकों को अपने पीछे लगाए हुए हैं, कि जांच-पड़ताल वे करते रहें। एक दुकान ने इस बात की जांच-पड़ताल की कि दुकान के काउंटर पर जो लोग खड़े होते हैं अगर स्त्रियां खरीदने आतीं–अब तो सारी खरीद-फरोख्त स्त्रियां करती हैं–तो स्त्रियों से पूछना, क्या लेना है आपको? इससे दुकान को नुकसान होगा। क्योंकि अगर स्त्रियों से पूछा जाए कि क्या लेना है आपको तो उन्हें घर से तय करके आना पड़ता है कि क्या लेना है। उनको अगर दो चीजें खरीदनी हैं तो वे दो ही चीजें बता सकती हैं।

इसलिए मनोवैज्ञानिकों ने उन दुकानदारों को सलाह दी कि काउंटर पर से आदमियों को हटा दो। दरवाजे पर स्त्री को एक छोटा ठेला दे दिया जाता है, ठेलागाड़ी, और उसे दुकान में भेज दिया जाता है कि तुम्हें जो पसंद हो वह निकाल कर ठेलागाड़ी में रख लाओ। तो वह जो चीजें खरीदने आई थीं उनकी तो फिकर ही भूल जाती है। जो चीजें उसने कभी न खरीदी होतीं वह दुकान में एकांत पाकर और चुन कर अपनी गाड़ी में डाल कर बाहर आ जाती हैं। इसका हिसाब लगाया तो पता चला कि दस चीजें जो स्त्रियां इस तरह खरीदती हैं, अगर उनसे पूछा गया होता कि तुम्हें क्या चाहिए और नौकर ने लाकर चीज दी होती तो वे केवल तीन चीजें खरीदतीं। इस हालत में उन्होंने दस चीजें खरीदीं। तीस चीजों की बिक्री होती अब सौ चीजों की बिक्री होगी। सत्तर चीजें वे व्यर्थ ही खरीद कर लौट गई।

लेकिन वह व्यर्थ खरीदने का कारण क्या है? कपड़े बदलने का इतना कारण क्या है? सौंदर्य के प्रसाधनों की इतनी बिक्री का कारण क्या है?

ईष्र्या उसके बहुत गहरे में कारण है। चारों तरफ ईष्र्या पकड़े हुए है। स्त्री के मन से ईष्र्या नष्ट न हो तो स्त्री कभी भी ठीक अर्थों में प्रेमपूर्ण नहीं हो सकती। क्योंकि ईष्र्या का जहर उसके सारे जीवन को खा जाता है। ईष्र्या भय दे देती है, ईष्र्या डरा देती है। तो स्त्री की समझ के बाहर ही हो जाता है, अगर उसका पति किसी दूसरी स्त्री को गौर से भी देख ले तो जहर की लहर फैल जाती है। इसलिए अगर कोई पति सड़क पर बिल्कुल सम्हला हुआ चल रहा हो और इधर-उधर न देखता हो तो समझ लेना कि उसकी पत्नी आस-पास है। और अगर कोई पुरुष सड़क पर बिल्कुल मौज से चल रहा हो और कोई स्त्री साथ में हो, सब तरफ देख रहा हो, प्रसन्न हो तो समझ लेना कि साथ में पत्नी नहीं है, किसी और की पत्नी हो सकती है।

ईष्र्या ने भय भी पैदा कर दिया है। पुरुष स्त्री से डरा हुआ है, घबड़ाया हुआ है, एक मुक्त और सहज संबंध नहीं रह गया। सब स्ट्रेंज हो गया है, सब तन गया है। तो घर शांत कैसे हो सकता है। शांति के फूल तो बहुत सहजता में खिलते हैं। जहां ईष्र्या नहीं है, जहां समझ है। जहां ईष्र्या नहीं है, जहां प्रेम है। जहां ईष्र्या नहीं है, जहां भय नहीं है, जहां अभय है और जहां एक दूसरे को समझने की चेष्टा है। एक-दूसरे की कमजोरी को भी, एक-दूसरे के दुख और पीड़ा को भी, एक-दूसरे से सहानुभूति रखने की भी क्षमता है।

और ध्यान रहे, पुरानी शिक्षा ने इस तरह की बातें सिखाई हैं कि हम एक दूसरे को कभी समझ ही नहीं पाते। पुरानी शिक्षा ने ऐसे आदर्श दिए हैं कि उनकी वजह से हम बिल्कुल विक्षिप्त हुए चले जाते हैं। यह बहुत आश्चर्यजनक नहीं है कि अगर रास्ते पर निकले हैं और कोई सुंदर पुरुष किसी स्त्री को दिखाई पड़े तो उसे अच्छा न लगे। कुछ आश्चर्यजनक नहीं है। सुंदर जो है वह अच्छा लग सकता है। जरूरी नहीं कि वह पति हो, और जरूरी नहीं है कि अच्छा लगने से कोई पाप हो गया। और अगर एक सुंदर स्त्री दिखाई पड़े तो किसी पुरुष को अच्छी लग सकती है, वह दो क्षण देख सकता है। इसमें न कुछ पाप है। लेकिन इसको भी पाप बना दिया है, अपराध बना दिया है। वह हमारी ईष्र्या ने जो जाल बुना है सिद्धांतों का, उसने बहुत उपद्रव खड़ा कर दिया है। उसकी वजह से कोई भी सहज नहीं हो पातो। और जब हम सहज नहीं हो पाते हैं तो उसका परिणाम होता है, एक दूसरे पर क्रोध से भर जाते हैं। पति और पत्नियां एक-दूसरे पर क्रोध से भरे हुए हैं, बजाय एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञता के। बजाय इसके कि पत्नी ने समझा हो कि पति ने उसके जीवन को धन्य किया; पत्नियां समझ रही हैं कि पति ने जीवन को नष्ट किया। बजाय इसके कि पति समझे कि पत्नी ने उसके जीवन को सौरभ दिया, सुगंध दी; पति समझ रहा है, कहां से इस स्त्री के उपद्रव में पड़ गए, यह सब नष्ट हो गया। क्रमशः……

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

ओशो प्रवचन: “जहां ईर्ष्या है, वहां प्रेम नहीं हो सकता”

बाजार ने मापा स्त्री के मन का रंग

ओशो कहते हैं —
अमरीका में एक दुकान ने रिसर्च की। वह जानना चाहती थी कि स्त्रियां किस रंग से सबसे अधिक प्रभावित होती हैं।
उनका उद्देश्य था — जिस रंग से स्त्री अधिक आकर्षित हो, उसी रंग के पैक में सामान बेचा जाए।
उन्होंने मनोवैज्ञानिकों से सलाह ली और पता लगाया कि कौन-सा रंग स्त्री की रुचि को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

सिर्फ रंग ही नहीं, उन्होंने यह भी जांचा कि दुकान में वस्तुएं किस ऊंचाई पर रखी जाएं, ताकि स्त्री की नजर पहले उन्हीं पर पड़े।
अगर किसी वस्तु को अधिक बेचना है तो उसे स्त्री की आंखों के बराबर ऊंचाई पर रखा जाए,
और जो चीज़ें न बिकनी हों, उन्हें नीचे रख दिया जाए — जहां उसकी नजर न पहुंचे।

 खरीदारी का नया मनोविज्ञान

ओशो आगे कहते हैं —
अब अमेरिकी दुकानों ने यह भी समझ लिया कि अगर काउंटर पर खड़ा व्यक्ति स्त्री से पूछे — “आपको क्या चाहिए?” तो नुकसान होता है।
क्योंकि जब कोई स्त्री जवाब देती है, तो वह वही बताती है जो वह पहले से खरीदने आई है।

इससे बिक्री सीमित हो जाती है।
इसलिए मनोवैज्ञानिकों ने दुकानदारों को सलाह दी —
“स्त्री से मत पूछो, उसे स्वतंत्र घूमने दो।”
अब दुकानों में स्त्रियों को एक छोटा ठेला (ट्रॉली) दिया जाता है, ताकि वे खुद अपनी पसंद से चीजें चुनें।

परिणाम यह हुआ कि
जहां पहले स्त्रियां 3 चीजें खरीदती थीं,
अब 10 चीजें खरीदने लगीं —
यानी 70 प्रतिशत वस्तुएं वे व्यर्थ ही खरीद लेती हैं, सिर्फ आकर्षण और उत्तेजना में।

 ओशो का प्रश्न: इतनी खरीदारी का असली कारण क्या है?

ओशो कहते हैं —
“कपड़े बार-बार बदलने का कारण क्या है?
सौंदर्य प्रसाधनों की इतनी बिक्री क्यों बढ़ रही है?”
इसका असली कारण ईर्ष्या (Jealousy) है।

ईर्ष्या स्त्री के मन में बहुत गहराई तक बैठी है।
वह अपने सौंदर्य को, अपने रूप को, दूसरों से बेहतर साबित करने की होड़ में रहती है।
बाजार इसी भावना को भुनाता है —
और इसी कारण उपभोक्तावाद (Consumerism) फल-फूल रहा है।

 ईर्ष्या: प्रेम की सबसे बड़ी शत्रु

ओशो कहते हैं —
“स्त्री के मन से यदि ईर्ष्या नष्ट न हो,
तो वह कभी भी सच्चे अर्थों में प्रेमपूर्ण नहीं हो सकती।”
क्योंकि ईर्ष्या का ज़हर धीरे-धीरे प्रेम को निगल जाता है।

ईर्ष्या से भय पैदा होता है —
भय कि कहीं कोई और सुंदर न दिख जाए,
भय कि पति की नजर कहीं और न चली जाए।
यह भय प्रेम को कठोर बना देता है।

 ओशो का व्यंग्य: सड़क पर सम्हल कर चलने वाला पति

ओशो हंसते हुए कहते हैं —
“अगर कोई पति सड़क पर बिल्कुल सम्हल कर चल रहा है,
इधर-उधर नहीं देखता,
तो समझ लेना कि उसकी पत्नी पास में है।

और अगर कोई पुरुष प्रसन्न होकर,
मौज में, चारों तरफ देखता हुआ चल रहा है,
तो जान लो — साथ में पत्नी नहीं है… किसी और की पत्नी हो सकती है।”

ओशो के इस हास्य के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है —
ईर्ष्या ने प्रेम को भय में बदल दिया है।

भय और क्रोध ने घरों की शांति छीनी

ओशो कहते हैं —
ईर्ष्या और भय ने पति-पत्नी के बीच सहजता खत्म कर दी है।
अब रिश्ता प्रेम का नहीं, तनाव का सौदा बन गया है।
जहां भय है, वहां शांति कैसे होगी?

शांति के फूल तो केवल सहजता में खिलते हैं —
जहां ईर्ष्या नहीं है,
जहां प्रेम है,
जहां समझ है,
जहां सहानुभूति है।

 पुरानी शिक्षा ने प्रेम को पाप बना दिया

ओशो कहते हैं —
“पुरानी शिक्षा ने हमें विक्षिप्त बना दिया है।
उसने हमें ऐसे आदर्श दिए हैं जो जीवन के विरुद्ध हैं।”

अगर किसी स्त्री को कोई सुंदर पुरुष अच्छा लगे,
या किसी पुरुष को कोई सुंदर स्त्री पसंद आ जाए —
तो इसमें कोई अपराध नहीं है।
सुंदरता का आकर्षण स्वाभाविक है।

लेकिन समाज ने इसे पाप बना दिया है।
इस झूठे नैतिक डर ने मनुष्य को असहज और अपराधबोध से भरा हुआ बना दिया है।

 ओशो का निष्कर्ष: प्रेम तभी संभव है जब ईर्ष्या मिटे

ओशो कहते हैं —
“पति-पत्नी एक-दूसरे पर कृतज्ञता से नहीं, क्रोध से भरे हैं।
पत्नी सोचती है — पति ने जीवन नष्ट कर दिया।
पति सोचता है — यह स्त्री तो उपद्रव बन गई।”

लेकिन प्रेम वहीं संभव है जहां भय न हो,
जहां ईर्ष्या न हो,
जहां एक-दूसरे की कमजोरियों को समझने की क्षमता हो।

ओशो का संदेश —

“जहां ईर्ष्या है, वहां प्रेम नहीं है।
जहां भय है, वहां सहजता नहीं है।
और जहां सहजता नहीं है, वहां शांति नहीं है।”