“दंपत्ति की अशांति ही विश्व की अशांति का मूल कारण है”, “जब स्त्री-पुरुष का भेद मिटता है, जीवन की लय टूट जाती है”
ओशो- मेरी अपनी दृष्टि ऐसी है कि स्त्री और पुरुष के व्यक्तित्व में एक बुनियादी भेद है। और है, यह शुभ है। परमात्मा की बड़ी कृपा है। वही आकर्षण है स्त्री और पुरुष के बीच। वह जो भेद है, वह भेद बहुत गहरा है। अगर वह भेद टूटता है तो या तो पुरुष स्त्रैण हो जाएगा और या स्त्री जो है वह पुरुष हो जाएगी–दोनों हालत में नुकसान होगा। स्त्री की शिक्षा तो होनी ही चाहिए पुरुष के ही बराबर, लेकिन उसके अपने आयाम में, उसकी अपनी दिशा में। उसकी अपनी ही दिशा है। उस दिशा में उसकी शिक्षा अगर होगी तो ही सार्थक है। आज हम शिक्षा भी दे रहे हैं तो वह सारी की सारी शिक्षा पुरुष के लिए ईजाद की गई है। और उसी पुरुष के लिए ईजाद की गई, स्त्री को भी उसी शिक्षा के ढांचे में ढाला जा रहा है। उसके परिणाम घातक हो रहे हैं। युनिवर्सिटी से पढ़-लिख कर जो लड़की निकलती है, उसमें स्त्रैण तत्व थोड़ा अनिवार्यरूपेण कम हो जाता है। कम हो ही जाएगा। कम हो जाना अनिवार्य है। क्योंकि शिक्षा पुरुष के लिए ईजाद की गई थी।
थोड़ा उलटा सोचें तो समझ में आ जाएगी बात। कोई नगर ऐसा हो, जहां की सारी शिक्षा स्त्रियों के लिए ईजाद की गई हो। संगीत की शिक्षा वहां दी जाती हो, नृत्य की शिक्षा दी जाती हो, काव्य की शिक्षा दी जाती हो, भोजन बनाने की, कपड़े सीने की, मकान सजाने की, बच्चों को पालने और बड़ा करने की–यह सारी शिक्षा दी जाती हो। किसी नगर में स्त्रियों के लिए शिक्षा दी जाती हो और उस नगर में पुरुष बहुत दिन तक अशिक्षित रखे गए हों। फिर पुरुषों में बगावत फैले और वे कहें कि हमें शिक्षा की जरूरत है, हम भी शिक्षा लेंगे। और स्त्रियां कहें कि ठीक है, हमारे कॅाले.जस में आकर तुम शिक्षा ले डालो। तो वे पुरुष भी नाचें, गाएं, गीत बनाएं, कविता करें, घर सजाएं, बच्चों को पालने की शिक्षा लें, तो क्या परिणाम होगा उस गांव में? उस गांव के पुरुष किसी गहरे अर्थ में स्त्रैण हो जाएंगे। उस गांव के पुरुषों में, जो पुरुष होना है वह कम हो जाएगा। वह जो पुरुष की तीव्रता है, वह जो पुरुष की प्रखरता है, वह क्षीण हो जाएगी। वह जो पुरुष के कोने हैं व्यक्तित्व में, वह गोल हो जाएंगे, वह राउंड हो जाएंगे, उनको झाड़ दिया जाएगा।
जैसा दुर्भाग्य उस गांव में पुरुषों के साथ होगा, वैसा दुर्भाग्य पूरी पृथ्वी पर आज स्त्रियों के साथ हो रहा है। उनके व्यक्तित्व का बुनियादी भेद छोड़ा जा रहा है। उस बुनियादी भेद को समझ लेना बहुत ही उचित है, क्योंकि वह बुनियादी भेद ठीक से समझ कर अगर दोनों को अपनी दिशाओं में सम-शिक्षित किया जाए, सम-विकास दिया जाए और समकक्ष लाया जाए तो ही दांपत्य शांतिपूर्ण हो सकता है। और यह पृथ्वी पूरी शांत हो जाए, अगर दंपति शांत हो जाएं। क्योंकि हमारा सारा वैमनस्य, सारा दुख, सारी पीड़ा हमारे छोटे-छोटे घरों के उपद्रवों में पैदा होती है।
जैसे एक गांव में घर-घर से धुआं निकलता है, अपने-अपने चैके से और फिर गांव के पूरे आकाश पर धुआं छा जाता है। छोटा-छोटा, एक-एक चैके से निकला हुआ धुआं धीरे-धीरे पूरे गांव के आकाश को भर देता है। सारी पृथ्वी अशांति से भर जाती है, क्योंकि जो व्यक्तियों के मिलन का मूल-बिंदु है, मूल इकाई है स्त्री और पुरुष, वह मिलन दुखद है, वहां अशांति है। वह अशांति फैलते-फैलते सारे जगत को घेर लेती है। फिर बहुत रूपों में प्रकट होती है। यह रूप इतने भिन्न हो जाते हैं कि कहना मुश्किल है।
अगर गांव के घर-घर से निकला हुआ धुआं गांव की छाती पर एक धुएं का बादल बनकर आ जाए तो कोई भी विश्वास न करेगा कि मेरे चूल्हे ने इस बादल को बनाया। कहेगा कि छोटा सा चूल्हा, हमारा चूल्हा इतना बड़ा अंधेरा बादल कैसे बना सकता है। नहीं, नहीं, यह नहीं हो सकता। लेकिन उसे पता नहीं कि करोड़-करोड़ चूल्हे इसी तरह छोटे-छोटे जल कर, इतना थोड़ा-थोड़ा धुआं फेंक कर एक बड़ा बादल बना देते हैं। और वे बादल बड़े खतरनाक हो सकते हैं। वे बादल सूरज को छिपा ले सकते हैं। उन बादल के पॅाकेट्स बन जाते हैं, एक हवाई जहाज को गिरा सकते हैं। अब यह कोई सोच भी नहीं सकता है कि एक घर के चूल्हे में से उठा हुआ धुआं किसी हवाई जहाज को गिरा सकता है। अगर वह बहुत सघन हो जाए तो उसका पाकेट बन जाता है, एक मजबूत पर्त बन जाती है। वह पर्त इतनी मजबूत है कि तेज हवाई जहाज जब उसके भीतर से गुजरता है, उस तेजी के कारण वह हवाई जहाज को डगमगा दे सकता है। लेकिन हमारी कल्पना में नहीं आ सकता कि चूल्हे से उठा हुआ धुआं और ऐसा कुछ कर सकेगा।
एक-एक घर से उठी हुई अशांति धीरे-धीरे विश्व-अशांति बन जाती है। और सारी दुनिया में चेष्टा चलती है, शांति, शांति, शांति! –वह शांति नहीं आती, क्योंकि मूल इकाई अशांत है। पुरुष और स्त्री का मिलन मूल इकाई है समाज की। फिर बाकी समाज उसका फैलाव है। अकेला पुरुष समाज नहीं है। अकेली स्त्री समाज नहीं है। अकेला पुरुष आधा है, अकेली स्त्री आधी है। जब वे दोनों एक मूल इकाई में मिलते हैं, तब समाज शुरू होता है। कम से कम समाज के लिए दो तो चाहिए। और फिर वही इकाई अगर ज्वरग्रस्त हो, बीमार हो, परेशान हो, कष्ट में हो–लेकिन हम उसके कष्ट को प्रकट भी नहीं होने देते!
मैं हजारों घरों में ठहरता हूं। लाखों लोगों से व्यक्तिगत मिलने, उनकी व्यक्तिगत तकलीफ में उतरने का मुझे मौका मिला है। मैं इतना हैरान हो गया हूं कि वे चेहरे जो बाहर हंसते हुए मालूम पड़ते हैं, वे भीतर हंसते हुए नहीं हैं। वे पति और पत्नियां क्लब में, और बाजार में, और सिनेमा-गृह में, जैसे चमक-दमक से हंसते हुए, बात करते हुए मालूम पड़ते हैं, वह उनके घर की असली शक्ल नहीं है। घर इससे बिल्कुल उलटी शक्ल है। यह बाहर जो दिखाई पड़ रहा है, यह बिल्कुल उलटा है। यह बिल्कुल धोखे का है। सच्चाइयां बहुत और हैं, बहुत गंदी और बेहद बेहूदी और बहुत कुरूप। और वहां एकदम गहरी अशांति है। और पति और पत्नी की जो अशांति है, वह उनके बच्चों में भी प्रवेश कर जाती है। वह घर के कोने-कोने, हवा-हवा में छा जाती है।
अब मैं एक युनिवर्सिटी में था, तो मैं बड़ा हैरान था। कोई सौ प्रोफेसर मेरे साथ थे। युनिवर्सिटी की क्लास तो बारह बजे शुरू होती, लेकिन प्रोफेसर थे कि स्टॅाफ रूम में साढ़े दस बजे ही हाजिर हो जाते। युनिवर्सिटी की क्लास किसी की एक बजे शुरू होती, किसी की दो बजे शुरू होती, किसी की तीन बजे खत्म हो जाती, किसी की दो बजे खतम हो जाती और मैं देखता साढ़े चार बजे तब तक कि जब तक चपरासी बंद न करता, तब तक वे वहां बैठ कर गपशप करते रहते।
मैंने उनसे कई बार पूछा कि जब यहां काम खतम हो गया, आप चले क्यों नहीं जाते? उन्होंने कहा: घर की झंझट से यहीं बेहतर। जितना समय शांति से बीत जाए वही अच्छा। यह बहुत हैरानी की बात है कि पति घर से भागा रहे शांति के लिए। शांति के लिए घर लौटना चाहिए, लेकिन घर कुरूप हो गया है। पति घर से भागा हुआ है। उसके घर से भागे होने का कारण तो घर एक शांति का, छाया का, विश्राम का एक स्थान नहीं रह गया। इसलिए घर का चैका टूटता चला जा रहा है। होटलें बढ़ती चली जाती हैं, क्योंकि घर वह ठीक से खा भी नहीं पाता। वह भागा हुआ है होटल की तरफ। इसलिए घर में कितनी देर कम से कम रुक सके, उसकी चेष्टा में रत रहता है और पत्नी घर अकेली पड़ गई है। वह बच्चों को पाल रही है, बर्तन धो रही है, खाना बना रही है, कपड़े सी रही है। इस काम में कितनी देर तक वह रस ले, यह काम उबा देता है। यह काम घबड़ा देता है। घर की दीवारों में बंद वह परेशान हो जाती है। वह वहां तैयार होती रहती है कि पति वापस लौटे तो गुस्सा किस पर निकाले, उसका सारा गुस्सा वहां तैयार होता है, भरता है, गहरा होता है, वह पति के आते ही टूट पड़ता है। और पति उसी से भागा हुआ था कि किसी तरह डरा हुआ कदम सम्हाल कर घर की सीढ़ियां चढ़ा है और वह बात, फिर टूट पड़ी और वह कल के लिए फिर भागा हुआ हो गया। और वह जितना भागेगा उतना क्रोध बढ़ेगा और जितना क्रोध बढ़ेगा, वह उतना भागता रहेगा।
घर का बुनियादी यूनिट, पहली इकाई ही विकृत और कुरूप हो गई है। इसलिए मेरी दृष्टि में किन्हीं यज्ञों से शांति नहीं हो सकती। लेकिन वह पति पत्नी के बीच जो कलह का यज्ञ चल रहा है, अगर वह शांत हो जाए। अगर वहां एक सौमनस्यपूर्ण, एक मैत्रीपूर्ण घटना घट जाए तो कुछ हो सकता है। लेकिन वह कैसे घटे? उस घटने की पहली शर्त मैं मानता हूं कि स्त्री को व्यक्तित्व मिल जाए। क्योंकि मित्रता छायाओं से नहीं हो सकती। मित्रता व्यक्तियों से होती है, ठोस, जीवंत। और पुरुषों ने स्त्रियों को पोंछ कर बिल्कुल शैडो, छाया बना दिया है। उनके पास व्यक्तित्व ही नहीं रहा। पुरुषों ने कहा, उठो तो उठो, बैठो तो बैठो। पुरुषों ने कहा, पूरब तो पूरब, पश्चिम कहा तो पश्चिम। उन्होंने उनका सारा व्यक्तित्व पोंछ डाला है।
वह व्यक्तित्व नहीं रह गया। उस व्यक्तित्व को पोंछने का परिणाम एक ही हो सकता था, और वह परिणाम फलित हो गया है। मैत्री असंभव हो गई है। दो व्यक्तियों के बीच मैत्री हो सकती है, छाया और व्यक्ति के बीच मैत्री नहीं हो सकती। इस व्यक्तित्व को लाने के लिए स्त्रियां बहुत अथक चेष्टा करती हैं, लेकिन उनकी चेष्टा बड़ी गलत है। वे या तो दूसरे-दूसरे सब्स्टीट्यूट खोज रही हैं, या पुरुषों जैसे होने की चेष्टा में संलग्न हैं। उन सबसे कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है। स्त्री को तय करना पड़ेगा, नारी को तय करना पड़ेगा कि वह नारी होने के ठीक अर्थ को समझे और नारी होने के ठीक अर्थ को उपलब्ध हो जाए। क्रमशः…..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
ओशो : स्त्री और पुरुष — भेद में ही छिपा है संतुलन
परमात्मा की कृपा है यह भेद
ओशो कहते हैं — मेरी दृष्टि में स्त्री और पुरुष के व्यक्तित्व में एक बुनियादी भेद है, और यह भेद शुभ है।
यही भेद आकर्षण का कारण है। यदि यह भेद टूट जाए तो या तो पुरुष स्त्रैण हो जाएगा या स्त्री पुरुषवत् बन जाएगी — दोनों ही स्थितियाँ विनाशकारी हैं।
शिक्षा समान हो, दिशा अलग हो
स्त्री को शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिए, लेकिन उसकी अपनी दिशा में।
आज की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह पुरुष के लिए बनाई गई है — उसी ढाँचे में स्त्री को ढालने का प्रयास किया जा रहा है। परिणामस्वरूप, शिक्षित होते हुए भी स्त्री के भीतर का स्त्रैण तत्व क्षीण हो रहा है।
ओशो कहते हैं,
“यदि किसी नगर में सारी शिक्षा केवल स्त्रियों के लिए हो — नृत्य, संगीत, भोजन, सजावट, पालन—पोषण की — और वहाँ पुरुषों को उसी शिक्षा में प्रवेश दिया जाए, तो वे पुरुष स्त्रैण हो जाएंगे।”
वही दुर्भाग्य आज स्त्रियों के साथ
आज पूरी पृथ्वी पर यही दुर्भाग्य स्त्रियों के साथ घट रहा है।
उनके व्यक्तित्व का बुनियादी भेद छोड़ा जा रहा है। जबकि, यदि उसी भेद को समझकर स्त्री-पुरुष को अपनी-अपनी दिशाओं में समान शिक्षा और विकास मिले — तभी दांपत्य में शांति संभव है।
“घर-घर की अशांति ही विश्व की अशांति बन जाती है,”
ओशो कहते हैं।
छोटे-छोटे घरों के झगड़े ही मिलकर समाज के आकाश में धुएं का बादल बना देते हैं।
दंपत्ति की अशांति ही विश्व की अशांति
ओशो के अनुसार,
“जब स्त्री-पुरुष का संबंध अशांत हो, तो उससे पैदा हुआ तनाव पूरे समाज में फैलता है।”
हर घर का कलह धीरे-धीरे सामूहिक पीड़ा बन जाता है।
लाखों छोटे चूल्हों का धुआं जैसे पूरे गाँव के आकाश को ढँक देता है — वैसे ही लाखों घरों की कलह से पूरी पृथ्वी दुख और तनाव से भर जाती है।
घर अब विश्राम का स्थान नहीं रहा
ओशो बताते हैं —
पति अब घर में शांति नहीं पाता, वह घर से भागता है।
विश्वविद्यालयों, दफ्तरों या क्लबों में देर तक रुकने का एक ही कारण है — घर की अशांति।
पत्नी अकेली रह जाती है, भीतर ही भीतर गुस्सा जमा करती है, और पति के लौटते ही वही गुस्सा टूट पड़ता है।
फिर यह सिलसिला रोज़ दोहराया जाता है।
“घर की पहली इकाई ही विकृत हो गई है। इसलिए किसी यज्ञ या प्रार्थना से शांति नहीं आ सकती, जब तक पति-पत्नी के बीच का यज्ञ शांत न हो जाए।”
मित्रता तभी संभव जब दोनों व्यक्तित्व हों
ओशो के अनुसार, असली मित्रता दो व्यक्तित्वों के बीच होती है, न कि व्यक्ति और उसकी छाया के बीच।
पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी छाया बना दिया है — उनके पास व्यक्तित्व नहीं रह गया।
वे केवल आदेश पालन करने वाली बन गईं:
“पुरुष ने कहा, उठो — तो उठो। बैठो — तो बैठो। पूरब — तो पूरब, पश्चिम — तो पश्चिम।”
जब तक स्त्री को अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं मिलेगा, तब तक दंपत्ति में सच्ची मित्रता और शांति संभव नहीं।
न स्त्री को पुरुष बनना है, न पुरुष को स्त्री
ओशो का स्पष्ट संदेश है —
“स्त्री को पुरुष जैसी नहीं बनना है, बल्कि अपने स्त्रैण अस्तित्व को समझना है।”
स्त्री को तय करना होगा कि वह नारी होने के वास्तविक अर्थ को समझे और उसी में खिल उठे।
तभी समाज की मूल इकाई — स्त्री और पुरुष — सौंदर्यपूर्ण, संतुलित और शांत हो सकती है।
अंतिम संदेश
ओशो के शब्दों में —
“जब पति-पत्नी में सौमनस्य स्थापित हो जाएगा, तब ही पृथ्वी पर शांति उतर सकेगी। घर की शांति ही विश्व की शांति का आधार है।”



