“झूठी नैतिकता से मुक्ति ही सच्ची स्वतंत्रता है”_ ओशो

ओशो- बट्रेंड रसल ने एक अनुभव लिखा है। उसने लिखा है कि जब मैं पहली दफा पढ़ने यूनिवर्सिटी गया तो मैंने सोचा था कि दर्शनशास्त्र पढूंगा तो मुझे सब उत्तर मिल जाएंगे। सब प्रश्न मेरे हल हो जाएंगे तो मैं निश्चिंत हो जाऊंगा। लेकिन अब अस्सी वर्ष के बुढ़ापे में मैं यह कहना चाहता हूं कि वह मेरी धारणा गलत थी। मैं सोचता था, दर्शनशास्त्र उत्तर दे देगा लेकिन हर उत्तर ने मेरे सामने नये दस प्रश्न खड़े कर दिए। तब मैंने लिखा था कि दर्शनशास्त्र, मनुष्य के गहरे उत्तरों की खोज है। अब मैं कहना चाहता हूं कि दर्शनशास्त्र नये प्रश्नों की खोज है। लेकिन यह बट्र्रेंड रसल को हुआ। बट्र्रेंड रसल के साथ और लोग भी पढ़े होंगे, वे उत्तर लेकर चले गए होंगे।अब तक हमारे बीच जो प्रतिभा थी, जीनियस था, वह तो नहीं बनता था उधार ज्ञान से, वह बच जाता था। वह तो इनकार कर ही देता था हमारी सब कोशिश के बावजूद–इंस्पाइट आॅफ अस, वह ज्ञानी नहीं बनता था। लेकिन जो सामान्य चित्त था, जो मिडियाकर माइंड है वह ज्ञानी बन कर लौट आता था। अब हमें एक ऐसी शिक्षा की व्यवस्था बनानी है जहां हम किसी को मिडियाकर न बनने देंगे। हम प्रत्येक के भीतर प्रश्न उठाएंगे। हमें उत्तर देने की चिंता नहीं होगी जितना प्रश्न जगाने की। अगर हम उत्तर भी लाएंगे कहीं से तो सिर्फ इसलिए, कि वे नये दस प्रश्नों के लिए जन्म देने का कारण बन जाएं। वह आपके भीतर समाधान न बने, नई समस्याओं का द्वार बन जाए। और विश्वविद्यालय से निकला हुआ विद्यार्थी ऐसे प्रश्न लेकर आए जो जिंदगी में उसे खोजने हैं। ऐसे उत्तर लेकर न आ जाए, जो जिंदगी पर उसे थोपने हैं; तो हम नया जीवंत मनुष्य पैदा कर सकेंगे।

जीवित मनुष्य अगर पैदा नहीं किया जा सका तो पुराना मनुष्य मरने की उस जगह पर पहुंच गया है, जहां से शायद फिर जीवन की संभावना भी खत्म हो जाएगी, शायद पूरी तरह मर जाएगा। मरते-मरते-मरते, मरते हमने आदमी को वहां पहुंचा दिया है कि जहां या तो बिलकुल मरेगा वह, और या फिर हमें बिलकुल नये मनुष्य को पैदा करना पड़ेगा। मैं जो भी कह रहा हूं, वह उस नये मनुष्य की खोज के लिए ही।

मनुष्यता को मुक्त तो करना ही है क्योंकि मनुष्यता मुक्त न हो तो विक्षिप्त होगी। पूरी मनुष्यता विक्षिप्त हो जाएगी–हो ही गई है। पृथ्वी करीब-करीब एक मैड हाउस है, एक बड़ा पागलखाना है। यहां हमने छोटे-छोटे पागलखाने भी बनाए हैं, ज्यादा पागल हो गए लोगों के लिए। और कहना कठिन है कि वे लोग, जिन्हें हमें पागलखाने में रखना पड़ रहा है, वे इसीलिए तो नहीं कहीं ज्यादा पागल हो गए हैं, कि हम सब पागलों के बीच उन्हें रहना मुश्किल है? यह भी हो सकता है कि हम सबके बीच रहना कुछ लोगों के लिए इतना कठिन हो जाता है कि सिवाय पागल होने के उनके पास उपाय नहीं बचता।

सारी दुनिया पागल है। मनुष्यता को बचाना ही होगा इस पागलपन से, नहीं तो मनुष्यता मरेगी। उसके पागलपन से युद्ध आते हैं, महायुद्ध आते हैं, और अब अंतिम युद्ध भी आ सकता है। पागल मनुष्यता का कोई भरोसा नहीं है कि कब आत्महत्या कर ले। उसने तैयारियां पूरी कर ली हैं। लेकिन मजे की बात यह है कि मनुष्यता के इस पागल होने में बुरे लोगों का हाथ नहीं है। और यही कठिनाई है सबसे बड़ी, जिसे समझना मुश्किल हो जाता है। मनुष्यता के इस पागल होने में तथाकथित अच्छे लोगों का हाथ है। क्योंकि उन्होंने जो तरकीबें सुझाई थीं, उनका यह फल हुआ है। उन्होंने तरकीबें सुझाईं थीं कि सरल दिखाई पड़ो, सरल हो जाओ। उन्होंने तरकीबें सिखाईं थीं कि प्रेम करो, अहिंसा साधो। उन्होंने तरकीबें सिखाईं थीं कि सत्य बोलो, झूठ छोड़ो। उन्होंने तरकीबें सिखाईं थीं कि परिग्रह नहीं, अपरिग्रह–वस्तुएं कम, आवश्यकताएं थोड़ी। ये सारी तरकीबें जो सिखाई थीं–ब्रह्मचर्य, सेक्स नहीं; त्याग, भोग नहीं; शरीर की दुश्मनी, तो परमात्मा को पा सकोगे। यह सारी तरकीबों का अंतिम, इकट्ठा परिणाम यह हुआ है कि आदमी पागल होता चला गया। अच्छे आदमियों ने मिल कर मनुष्यता को पागल कर दिया है।

इस पागलपन को अगर मिटाना हो, तो हमें अच्छे आदमियों द्वारा सिखाई गई सारी बातों पर पुनर्विचार करना होगा। जैसे उसमें से एक यह बुनियादी बात है कि हम कोई भी चीज मनुष्य पर थोपना बंद कर दें। मनुष्य पर कुछ भी थोपना बंद कर दें, ऊपर से डालना बंद कर दें। जो लोग भी जाने या अनजाने खुद को या दूसरे को दुख देते हैं उनमें किसी न किसी तरह के विक्षिप्त रोग हैं, वे किसी न किसी तरह से पागलपन में पड़े ही हुए हैं। दूसरे को दुख देने वाला हमको दिखाई पड़ जाता है, लेकिन खुद को दुख देने वाला हम महात्मा बना लेते हैं। लेकिन दुख देने की वृति वही है। उसका आॅब्जेक्ट कोई भी हो सकता है। मैं दूसरे को भी सता सकता हूं, खुद को भी सता सकता हूं। यह जो दुनिया की अब तक की नैतिकता है वह सैडिस्ट और मैसोचिस्ट है। दुनिया की पूरी नैतिकता, अब तक की पूरी नैतिकता मनुष्य को मुक्त करने वाली नहीं है, रुग्ण करने वाली है।

तो यही मैं कह रहा हूं कि मनुष्यता की मुक्ति का पहला आधार तो यह होगा कि मनुष्य जैसा है हम उसे स्वीकार कर लें। उसे जल्दी नैतिक बनाने की चेष्टा खतरनाक है, महंगी है। उसके भीतर क्रोध है तो हम जल्दी से क्षमा न सिखाएं। क्योंकि जल्दी सिखाई गई क्षमा सिर्फ क्रोध को दबा देगी और झूठी हो जाएगी। वह आदमी क्रोधी ही रहेगा और क्षमा का अभिनय करेगा। यह इतना टेंशन पैदा करेगी उसकी स्थिति भीतर की, कि क्षमा का अभिनय करना और क्रोध में जीना, यह इतना तनाव पैदा कर देगी कि आदमी पागल होगा।

तो हम क्रोध को स्वीकार कर लें और बजाय क्षमा सिखाने के, क्रोध के प्रति जागना सिखाएं। इसलिए पूरी नैतिकता और अर्थ की होगी। यह नई नैतिकता, मनुष्य जैसा है, उसके प्रति जागरण सिखाएगी। कैसा होना चाहिए, इसकी शिक्षा नहीं देगी। यह नई नैतिकता उपदेश की नहीं होगी, और क्या अच्छा है, इसकी नहीं होगी। जो है, उसके प्रति हम कैसे जागें, हाउ टु बी अवेयर, इसकी होगी। और मनुष्य जैसा है, उसको हम स्वीकार करते हैं। उसमें क्रोध है, काम है, लोभ है, घृणा है, प्रेम है, जो भी है उसके भीतर, हम उसे स्वीकार करते हैं कि वह है। इसे हम मानते हैं, दि गिवन, वह मिला हुआ है। अब इसके प्रति हमें जागना है ताकि हम ठीक से परिचित हो सकें कि मैं क्या-क्या हूं! क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

नए मनुष्य की खोज: जागरण, न कि थोपे गए उत्तर

दर्शनशास्त्र उत्तर नहीं, प्रश्नों की खोज है

ओशो ने बर्ट्रेंड रसल के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि जब वे विश्वविद्यालय पढ़ने गए तो सोचा था कि दर्शन से उन्हें सभी उत्तर मिल जाएंगे। लेकिन अस्सी वर्ष की उम्र में रसल ने माना कि दर्शन ने हर उत्तर के साथ दस नए प्रश्न खड़े कर दिए। यही अंतर है—दर्शन उत्तर देने की जगह नए प्रश्न जगाने का माध्यम है।

शिक्षा का असली उद्देश्य

ओशो कहते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली को बदलने की ज़रूरत है। अब तक की शिक्षा ने सामान्य दिमाग को “ज्ञानी” बना दिया, लेकिन असली प्रतिभा उससे बचती रही। ज़रूरी यह है कि हम विद्यार्थियों को उत्तर न थोपें बल्कि प्रश्न करने की क्षमता दें। शिक्षा का लक्ष्य समाधान नहीं, बल्कि नए प्रश्नों के द्वार खोलना होना चाहिए।

पागलपन की कगार पर मनुष्यता

ओशो का कहना है कि आज पूरी पृथ्वी एक “पागलखाना” बन चुकी है। युद्ध, महायुद्ध और आत्मविनाश की तैयारी इसी पागलपन का परिणाम है। हैरानी की बात यह है कि इस पागलपन के पीछे बुरे लोग नहीं, बल्कि तथाकथित “अच्छे लोग” हैं, जिन्होंने नैतिकता के नाम पर गलत तरकीबें सिखाईं।

झूठी नैतिकता ने बिगाड़ी स्थिति

उन्होंने कहा कि अब तक की नैतिकता ने मनुष्य को दबाया है—सिखाया कि क्रोध मत करो, सेक्स मत करो, भोग मत करो, अहिंसा साधो, अपरिग्रह अपनाओ। इस दबाव ने मनुष्य को भीतर से विक्षिप्त कर दिया। किसी और को दुख देने वाला हमें पापी लगता है, लेकिन खुद को दुख देने वाला हम महात्मा मान लेते हैं। असल में दोनों एक ही रोग से पीड़ित हैं।

असली नैतिकता: जागरण की शिक्षा

ओशो के अनुसार नई नैतिकता यह नहीं होगी कि मनुष्य को बताया जाए “कैसा होना चाहिए”। बल्कि यह होगी कि “मनुष्य जैसा है, उसे उसी रूप में स्वीकार करके उसके प्रति जागरण सिखाया जाए।” जल्दी क्षमा सिखाने से क्रोध दब जाएगा, लेकिन खत्म नहीं होगा। असली मार्ग है—क्रोध को पहचानो, उसे देखो और उसके प्रति सजग हो जाओ।

जागरण से स्वतः परिवर्तन

जब इंसान अपने पूरे चित्त के प्रति जाग जाता है, तो नकारात्मक तत्व अपने आप गिर जाते हैं और सकारात्मक स्वभाव सहज रूप से उभरने लगता है। जाग्रत व्यक्ति जाने-अनजाने क्रोध से क्षमा तक, सेक्स से ब्रह्मचर्य तक और पाप से पुण्य तक पहुंच जाता है—बिना किसी दबाव या दिखावे के।

आनंदित जीवन ही असली धर्म

ओशो कहते हैं कि जाग्रत मनुष्य पुण्य का दावा नहीं करता, स्वर्ग की आकांक्षा नहीं करता। क्योंकि उसके हर क्षण में ही आनंद भर जाता है। यही सच्ची मुक्ति है—जागरण से उत्पन्न आनंद, न कि थोपे गए आदर्शों से पैदा हुआ तनाव।