“अधूरे सत्य का संकट: विज्ञान और धर्म से परे पूर्ण सत्य की खोज”_ओशो

ओशो- मेरी दृष्टि में भौतिकवाद का कोई भी विरोध नहीं है। विरोध वहां शुरू होता है जहां भौतिकवाद अपने से ऊपर सब चीजों को इनकार करता है। भौतिकवाद अपने में बिलकुल सच है। जहां तक जाता है वहां तक बिलकुल सच है, लेकिन जहां वह बिलकुल नहीं जा सकता वहां इनकार करता है–वहीं गलत हो जाता है। भौतिकवाद, विज्ञान बाहर के जीवन में उस अवसर की तलाश है, जिस अवसर के बीच भीतर का अंकुर आनंद का खिल सके।

धर्म, योग, भीतर के उस अंकुर को जगाने, उठाने की खोज हैं। लेकिन इन धार्मिकों से मैं सहमत नहीं हूं जो मानते हैं कि धर्म पर्याप्त है; जो मानते हैं, बस, भीतर कुछ हो जाना काफी है; जो बाहर के निषेध में खड़े हैं। मैं मानता हूं कि वे भौतिकवादियों जैसे ही लोग हैं, सिर्फ उलटे खड़े हैं। उनकी पकड़ भी अधूरी है। और ध्यान रहे, अधूरा सत्य असत्य से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। क्योंकि वह सत्य मालूम पड़ता है, और सत्य होता नहीं। इसलिए अर्धसत्य मनुष्य को जितना भटका देता है उतना असत्य भी कभी नहीं भटकाता। असत्य भटका ही नहीं सकता है, क्योंकि असत्य का भ्रम बहुत जल्दी टूट जाता है। उसमें सत्य का मुलम्मा भी नहीं होता, उसमें सत्य की रूप-रेखा भी नहीं होती, उसमें खोजने पर सत्य कहीं मिलता ही नहीं। तो इसलिए असत्य को पकड़े रखना कठिन है, लेकिन अर्धसत्य को पकड़े रखना बहुत आसान है। क्योंकि जो सत्य का हिस्सा है उसमें, वह पकड़ बन जाता है। और जो असत्य का हिस्सा है, उसे हम आंख से ओझल कर देने में समर्थ हो जाते हैं।

और मजे की बात यह है कि जैसे एक रुपये को मैं अपने हाथ में पकडूं, तो पूरे रुपये को तो मैं कभी देख ही नहीं पाता हूं। जब देख पाता हूं, आधे को ही देख पाता हूं। अगर रुपये का ऊपर का सिक्का मुझे दिखाई पड़ता है, तस्वीर मुझे दिखाई पड़ती है तो नीचे का हिस्सा लोप हो जाता है। नीचे का हिस्सा दिखाई ही नहीं पड़ता। और अगर नीचे का उलटा सिक्का मैं देखने लगता हूं तो ऊपर का सिक्का लोप हो जाता है, वह मुझे दिखाई नहीं पड़ता। पूरे सिक्के को देखना बहुत मुश्किल है। आधा ही सिक्का दिखाई पड़ता है, और इसीलिए पूरे सत्य को देखना भी बहुत मुश्किल है, आर्डुअस है; आधा सत्य ही दिखाई पड़ता है। और आधे सत्य के दिखाई पड़ने से आधा पकड़ लिया जाता है। और शेष आधा जो उसके पीछे ही छिपा है, जिसके बिना यह आधा भी नहीं हो सकेगा वह ओझल हो जाता है; न केवल ओझल बल्कि इनकार हो जाता है।

भौतिकवाद आधा सत्य है, विज्ञान आधा सत्य है, आधा सिक्का! धर्म, योग आधा सत्य है, आधा सिक्का! लेकिन जो अपने आधे हिस्से को देख रहे हैं वे दूसरे हिस्से को स्वीकार भी करने को राजी नहीं हैं क्योंकि उनकी आंखों में वह है ही नहीं। लेकिन जिस आधे को वे इनकार कर रहे हैं वह आधा, जिस आधे को वे स्वीकार कर रहे हैं उसका आधार है। और उसके इनकार करने से यह आधा भी मिट जाएगा–बन नहीं सकता।

मैं पूर्ण सत्य के पक्ष में हूं। और पूर्ण सत्य सब विरोधों को आत्मसात कर लेता है। सब तरह के कंट्राडिक्शंस को अपने भीतर ले लेता है। पूर्ण सत्य में कुछ भी निषेध नहीं होता, कुछ नेगेट नहीं होता। पूर्ण सत्य में जो दो बिलकुल विरोधी बातें दिखाई पड़ती थीं–धर्म और विज्ञान, आत्मा और शरीर, बाहर और भीतर, पदार्थ और परमात्मा, जीवन और मृत्यु, सब समाहित हो जाते हैं। पूर्ण सत्य में सब विरोध मिल जाते हैं। असल में पूर्ण सत्य विरोधों के बीच पैदा हुई हार्मनी का ही अनुभव है।सब विरोधों के बीच जो संगीत पैदा होता है उसके ही अनुभव को पूर्ण सत्य कहेंगे। धर्म भी आधा है, विज्ञान भी आधा है। दोनों के अधूरेपन से मैं इनकार करता हूं। विज्ञान ने बड़ी कोशिश की है। उसकी कोशिश सराहनीय है, उसने आदमी के सुख की बहुत व्यवस्था जुटा दी है, लेकिन सिर्फ व्यवस्था! बीज उसके पास नहीं है जिसमें अंकुर आए। जिसमें अंकुर आ सके वह बीज उसके पास नहीं है। तो व्यवस्था उसने जुटा दी है, भूमि जुटा दी है, सीड जुटा दिया है, माली ला दिया है और प्रतीक्षा हो रही है; लेकिन अंकुर नहीं निकलता। पश्चिम सारा अवसर जुटा कर बैठा है बिना अंकुर के।

भौतिकवादी सारा इंतजाम करके बैठा है बिना बीज के और अब तकलीफ में पड़ गया है कि बीज कहां है? मान कर चला था कि व्यवस्था पूरी हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा। व्यवस्था पूरी होने के करीब आ गई है। और इसलिए इतना फ्रस्ट्रेशन है पश्चिम में–चाहे अमरीका में, चाहे रूस में, चाहे इंग्लैंड में–इतना विषाद है! विषाद इस बात का है कि निरंतर इस आशा में सारा श्रम किया था कि व्यवस्था पूरी हो जाएगी, सब ठीक हो जाएगा। व्यवस्था पूरी हो गई और पाया गया है कि कुछ खो रहा है, जो पूरा नहीं होता। कोई मिसिंग लिंक है, जिससे जोड़ नहीं बैठता। इसको ही वह गहरा करते चले गए हैं व्यवस्था को। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे निकट आती गई है व्यवस्था। सारी व्यवस्था पूरी हो गई है।

वह जो आपने कहा, कपड़े ठीक हो गए हैं, मकान ठीक हो गए हैं, सड़कें ठीक हो गई हैं, सब तरह के साधन विकसित हो गए हैं जिससे मनुष्य की सब इंद्रियां करोड़ गुना गतिमान हो गई हैं। आखिर पैर ही है जो स्पुतनिक में गतिमान हो गया है। और हाथ ही हैं जो तारों तक पहुंच गए हैं। और कान ही हैं, जो रेडियो बन गया है। और वाणी ही है, जो आज सारे जगत में सुनी जा सकती है। सारी व्यवस्था कर ली है आदमी के सुख की। लेकिन आदमी कहीं खोया हुआ मालूम पड़ता है, जिसके सुख का इंतजाम किया है उसका पता नहीं चल रहा है कि वह कहां है! इंतजाम पूरा हो गया है और इंतजाम में हम इतने व्यस्त थे कि हम भूल ही गए थे कि जिसके लिए इंतजाम किया है, जिस मेहमान के लिए घर सजाया है, सोफे लगाए हैं, चित्र लटकाएं हैं, संगीत बजाया है, फूल लगाए हैं, सुगंध छिड़की है, हमेशा आयोजन में इतने व्यस्त थे कि हम भूल ही गए हैं कि वह मेहमान कहां है। अब जब आयोजन पूरा हो गया है तो खोज शुरू हुई है कि वह मेहमान कहां है, वह अतिथि कहां है? उसका कोई पता नहीं चलता। सब आयोजन व्यर्थ हुआ जा रहा है। विज्ञान ने बड़ी मेहनत की है। लेकिन मेहनत एक जगह जाकर, जिसको कहें खड़ी हो गई है जिसके आगे कोई मार्ग नहीं है।

यह होना था। देर-अबेर यह घटना घटनी थी क्योंकि अधूरे सत्य निश्चित एक जगह ले जाते हैं–कल-डि-सैक पर–एक ऐसी जगह, जहां रास्ता खत्म हो जाता है। धर्म भी ऐसे ही अधूरे सत्यों पर खड़े होकर टूट चुका है। धर्म ने भी बड़ी मेहनत की; विज्ञान से कम नहीं, ज्यादा ही। योग ने भी बड़ा श्रम उठाया; कम नहीं, ज्यादा ही। करोड़-करोड़ लोगों ने श्रम किया और उसकी खोज की कि वह कौन है जो आनंदित हो सके? उसकी खोज भी हो गई। इसका भी पता चल गया कि मनुष्य के भीतर वह कौन सा तत्व है, कौन सी आत्मा है, वह कौन सा बीज है जो आनंदित हो सकता है? उसकी खोज भी हो गई, लेकिन बाहर उसके आनंद के लिए कोई अवसर नहीं था, बाहर अवसर ही नहीं था। उसकी खोज में हम इतने भूल गए हैं, मेहमान के पकड़ने में हम इतना भूल गए हैं कि हम यह भूल ही गए हैं कि मेहमान के लिए एक घर भी बनाना है; सोफे भी लगाने हैं, फूल भी लगाने हैं, धूप भी जलानी है, खाना भी बनाना है, संगीत भी सुनाना है। यह सब व्यवस्था करनी है। मेहमान को खोजने में सब भूल गए हैं। मेहमान को ही पकड़ लिया है, लेकिन न घर है, न फूल हैं, न आरती सजी है, कुछ भी नहीं है। मेहमान सामने खड़ा है और व्यवस्था कोई भी, कोई भी नहीं है! वह भूल भी हो चुकी और अब मुझे दिखाई पड़ता है, धर्म ने अतिथि की खोज कर ली, लेकिन अतिथि के लिए व्यवस्था नहीं कर पाया।

ऐसे ये दोनों अधूरे प्रयोग हो चुके और दोनों हार चुके हैं। पूरब ने धर्म हारा, पश्चिम ने विज्ञान हारा। और इस बात का खतरा है अब…हार में अक्सर यह खतरा होता है, दूसरी अति पर चले जाने का। इस बात का अब खतरा है कि पूरब धर्म से हार गया तो विज्ञान को पकड़ ले और पश्चिम विज्ञान से हार गया तो धर्म को पकड़ ले, और फिर वही नासमझी शुरू हो जाए।

इस खतरे से मनुष्य को बचाने की बड़ी जरूरत है। यह खतरा बिलकुल खड़ा हो गया है। पूरब विज्ञान को पकड़ना शुरू कर दिया है। पूरब का विचारशील आदमी भौतिकवादी हुआ जाता है, नास्तिक हुआ जाता है, वैज्ञानिक हुआ जाता है। पश्चिम का विचारशील आदमी उपनिषद, गीता, कुरान, सूफी, झेन, बुद्ध, महावीर की खोज में निकल पड़ा है। पश्चिम का विचारशील आदमी धार्मिक हुआ जाता है, पूरब का विचारशील आदमी भौतिक हुआ जाता है। वही दुर्घटनाएं फिर घटी जाती हैं। जिस चक्कर से मनुष्यता अभी तक गुजरी, वह चक्कर फिर जारी रहेगा। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

अधूरे सत्य का संकट: विज्ञान और धर्म से परे पूर्ण सत्य की खोज

नई सोच / विशेष प्रवचन

ओशो कहते हैं मनुष्य का जीवन हमेशा से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं के बीच झूलता रहा है। विज्ञान ने सुख-सुविधाओं की अपार व्यवस्था की, तो धर्म ने भीतर की आत्मा को जगाने का मार्ग दिखाया। लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों अधूरे हैं। यही अधूरापन आज मानवता के लिए सबसे बड़ा संकट है।

भौतिकवाद की सीमा

भौतिकवाद अपने में गलत नहीं है। विज्ञान जितना आगे जाता है, उतना सत्य है। लेकिन जहां उसकी सीमा समाप्त हो जाती है, वहां वह आध्यात्मिकता से इनकार करने लगता है। यहीं से उसका अधूरापन शुरू होता है। पश्चिम ने सारी व्यवस्था जुटा ली—मकान, सड़कें, कारखाने, उपग्रह, इंटरनेट, रेडियो… लेकिन जिस “मेहमान” यानी आत्मा या आनंद के लिए यह सब बनाया, उसका कहीं पता नहीं।

धर्म का अधूरापन

धर्म और योग भीतर की आत्मा को जगाने की खोज करते हैं। लेकिन यहां भी अधूरापन है। जिसने मेहमान (आत्मा) को खोज लिया, उसने उसके लिए घर (भौतिक व्यवस्था) नहीं बनाया। अतिथि सामने खड़ा है, लेकिन उसके लिए कोई सजावट, कोई स्वागत, कोई अवसर ही तैयार नहीं।

अधूरा सत्य – सबसे बड़ा खतरा

अर्धसत्य असत्य से भी ज्यादा खतरनाक है। असत्य जल्दी टूट जाता है, लेकिन आधा सत्य मनुष्य को भ्रम में डाल देता है। विज्ञान आधा है, धर्म आधा है—दोनों आधे सिक्के। और पूरा सिक्का देखना कठिन है, क्योंकि एक पहलू देखते ही दूसरा ओझल हो जाता है।

पूर्व और पश्चिम की हार

  • पश्चिम ने विज्ञान में पूरी मेहनत की, पर अंततः निराशा हाथ लगी।
  • पूरब ने धर्म में डूबकर आत्मा खोजी, पर बाहरी व्यवस्था की कमी रह गई।
    दोनों अपने-अपने अधूरे प्रयोग में असफल हुए। यही कारण है कि आज पश्चिम उपनिषद, गीता और सूफी परंपरा की ओर लौट रहा है, तो पूरब विज्ञान और भौतिकता की ओर। खतरा यह है कि फिर वही गलती दोहराई जाएगी।

समाधान – पूर्ण सत्य की ओर

पूर्ण सत्य विरोधों को मिटाता नहीं, बल्कि आत्मसात कर लेता है। विज्ञान और धर्म, आत्मा और शरीर, जीवन और मृत्यु—सब एक गहरी हार्मनी में मिलकर पूर्ण सत्य का अनुभव कराते हैं। यही मनुष्य की वास्तविक दिशा है।

यह प्रवचन हमें याद दिलाता है कि न तो केवल धर्म पर्याप्त है, न केवल विज्ञान। दोनों अधूरे हैं। असली राह वहीं है जहां दोनों का संगम हो, जहां बाहर की व्यवस्था और भीतर का बीज मिलकर सच्चा आनंद पैदा करें।