“जीवन रूपांतरण: भीतर और बाहर दोनों का संतुलन ही आनंद का द्वार”_ ओशो


दुनिया के मौजूदा हालात मुझे मायावी (भ्रमपूर्ण) प्रतीत होते हैं। जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विद्वान जीवन के रूपांतरण के अलग-अलग विषय या सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, धार्मिक नेता यह कहते हैं कि केवल ईश्वर या धर्म ही सर्वशक्तिमान है और वही जीवन को बदल सकता है तथा स्वर्ग प्रदान कर सकता है। समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञ, शिक्षा शास्त्री और नैतिकतावादी मानते हैं कि बेहतर समाज केवल बेहतर आचरण (नैतिक मूल्यों) से ही बन सकता है। प्राकृतिकवादी कहते हैं कि प्रकृति की समझ ही जीवन के रूपांतरण को लाएगी। वहीं मनोवैज्ञानिक और मनोविकार विज्ञानी का विश्वास है कि मनोविश्लेषण, शांति दवाएँ, नींद की गोलियाँ या ब्रेनवॉश करने वाले साधन जीवन को बदल सकते हैं, इत्यादि-इत्यादि। लेकिन मेरे लिए, सर, यह सब केवल आंशिक रूपांतरण जैसा प्रतीत होता है। क्या आप बता सकते हैं कि वास्तविक, संपूर्ण और स्वतःस्फूर्त (स्पॉन्टेनियस) रूपांतरण क्या है?
ओशो- मनुष्य निरंतर ही यह सोचता रहा है, कैसे आमूल जीवन परिवर्तित हो। सोचने के कारण भी हैं। जैसा जीवन है, उसमें सिवाय दुख, पीड़ा, अशांति, संघर्ष और कलह के कुछ भी नहीं है। जीवन के इस दुखद रूप ने ही जीवन को रूपांतरित करने की प्रेरणा भी पैदा की है। शायद ही ऐसा कोई क्षण हो जब मनुष्य आनंद को उपलब्ध हो पाता है। आनंद की आशा रहती है, कल मिलेगा और आज उसी आशा में हम दुख में व्यतीत करते हैं।
और कल जब आता है तब वह इतना ही दुखी सिद्ध होता है जितना आज था। आशा फिर आगे सरक जाती है। ऐसे जीवन भर आदमी सुख की आशा में जीता है और पाता निरंतर दुख है। इस आशा के कारण दुख को झेल भी लेता है। लेकिन आनंद इस तथाकथित जीवन में दिखाई नहीं पड़ता। या तो यह हो सकता है कि जीवन में आनंद है ही नहीं, आनंद की खोज ही गलत है। या यह हो सकता है कि जैसा जीवन है, इस जीवन में आनंद नहीं है इसलिए जीवन को परिवर्तित करने की, ट्रांसफार्म करने की खोज सार्थक है।
फिर जीवन को परिवर्तित करने के भी दो विकल्प हैं। या तो हम जीवन को बदलें तो आनंद हो जाए; जीवन–जो हमसे बाहर है। या यह भी हो सकता है कि बाहर का सारा जीवन बदल जाए तो भी आनंद न हो, क्योंकि हम जैसे थे वैसे ही रह जाएं।
तो दूसरा विकल्प यह है कि हम जैसे हैं उस होने को बदलें, तो जहां दुख दिखाई पड़ता है, शायद वहां आनंद हो जाए। इन सब दिशाओं से आदमी ने कोशिश की है, इन सब दिशाओं से आदमी ने प्रयास किया है। जो ऐसा मान लेते हैं कि आनंद है ही नहीं, वे अत्यंत निराशावादी मालूम पड़ते हैं। जीवन के तथ्य उनकी बात का समर्थन करते हैं। लेकिन कुछ व्यक्तियों के जीवन में आनंद घटित हुआ है–होता है। कुछ गवाह हैं जीवन के बड़े तथ्यों के खिलाफ। और वे गवाहियां इतने सच्चे आदमियों से आई हैं कि उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। अगर हम जीवन, सामान्य जीवन की तरफ देखें तो निराशावादी, वह जो पैसिमिस्ट है, वही ठीक मालूम पड़ता है। जीवन में दुख है! शायद दुख ही दिखाई पड़ता है। अगर जीवन के आंकड़े ही हम बटोरें तो निराशावादी सही सिद्ध मालूम होता है।
लेकिन कभी-कभी कोई एक व्यक्ति पैदा होता है–कोई एक कृष्ण, कोई एक बुद्ध, और जिसके जीवन में आनंद के फूल खिले हुए दिखाई पड़ते हैं; और जो गवाही बन जाता है, विटनेस बन जाता है। असाधारण हैं ये घटनाएं। कभी-कभी घटती हैं, सामान्य नहीं हैं, अपवाद ही मालूम पड़ते हैं अभी, लेकिन इनसे आशा बंधती है और निराशा का कारण नहीं रह जाता है। क्योंकि यदि एक मनुष्य के जीवन में आनंद घटित हो सकता है, तो फिर सबके जीवन में घटित क्यों नहीं हो सकता है? फिर ऐसा मालूम पड़ता है कि हम सबके होने में कहीं कोई भूल है, जिससे, जिससे आनंद के द्वार नहीं खुल पाते हैं। अगर जगत में एक मनुष्य प्रकाश में खड़ा हो सका, तो फिर हमारा जो अंधेरा है वह कुछ हमारे ही ओढ़े हुए होने के कारण है। शायद हम अपना द्वार बंद किए हुए बैठे हैं अंधेरे में। सूरज बाहर निकला हो। अगर एक मनुष्य के जीवन में संगीत घट सका है तो संभावना यही है कि शायद हम बहरे बने बैठे हैं, कान बंद किए बैठे हैं। क्योंकि संगीत है, यह एक मनुष्य के जीवन में घटने से भी सिद्ध हो जाता है। यह सबके जीवन में घटे तभी सिद्ध होगा, ऐसा नहीं है। अगर एक मनुष्य के जीवन में भी आनंद के स्वर उठते हैं, तो वे उठ सकते हैं इसकी पाॅसिबिलिटी, इसकी संभावना खुल जाती है।
इसलिए मैं निराशावादी से तो सहमत नहीं हूं, क्योंकि निराशावाद का गहरे से गहरा अर्थ आत्मघात के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हो सकता है। अगर जीवन दुख ही है और ट्रांसफर्मेशन के, रूपांतरण के कोई उपाय नहीं हैं तो फिर जीवन जीने जैसा नहीं है। फिर इस अर्थहीन, एब्सर्ड, व्यर्थ के जीवन को छोड़ देना ही उचित है। फिर सिर्फ कायर जीएंगे, बहादुर छोड़ देंगे। फिर जो मरने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वे ही सरकेंगे कीड़ों की तरह। जो मरने का साहस रखते हैं वे तत्काल इस जीवन के बाहर हो जाएंगे।
लेकिन मैं राजी नहीं हूं। अपने अनुभव के कारण भी राजी नहीं हूं। मैं खुद भी देख पाता हूं कि आनंद के अनंत द्वार हैं और प्रकाश की अनंत संभावनाएं हैं। और जीवन एक ऐसा आनंद हो सकता है जहां दुख की कोई लहर भी कभी नहीं पहुंच सकती। मैं खुद भी एक गवाही, एक विटनेस हूं। बुद्ध ही गवाही होते तो शायद इतनी हिम्मत से मैं नहीं कह पाता, लेकिन निराशावादी आमूल गलत है, यद्यपि जीवन के सारे तथ्य उसके समर्थन में हैं, लेकिन तथ्यों के समर्थन से भी कुछ भी नहीं होता। तथ्य सत्य नहीं हैं, फेक्ट ट्रूथ नहीं हैं। यह हो सकता है कि तथ्य तो दुख के ही दिखाई पड़ रहे हैं, लेकिन सत्य आनंद का हो और हम सत्य को खोज नहीं पा रहे हैं। और कई बार ऐसा होता है कि तथ्यों की भीड़ में भटक जाने से सत्य का खोजना ही मुश्किल हो जाता है। मैं निराशावादी से सहमत नहीं हूं, क्योंकि उससे सहमत होने का मतलब है, रूपांतरण का कोई मार्ग नहीं है, कोई उपाय नहीं है।
दूसरे वे लोग हैं; जो कहते हैं जीवन में दुख है, क्योंकि जीवन जैसा है वह ठीक नहीं है–उनकी पहुंच ऑब्जेक्टिव है। उनकी पकड़ वस्तुओं को बदलने की, व्यवस्था को बदलने की, शरीर को बदलने की, स्वास्थ्य को बदलने की, बीमारी हटाने की, अच्छा मकान बनाने की, अच्छे कपड़े देने की–इस बात में थोड़ी सचाई है। अगर जीवन की सारी व्यवस्था दुखदाई हो जाए तो अत्यंत कठिन हो जाता है आनंद को अनुभव करना। इसलिए मैं मानता हूं कि इस बात में थोड़ी सचाई है कि जीवन की बाहर की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि भीतर आनंद घटित होने में सहयोगी बने, विरोधी नहीं। लेकिन फिर भी मैं यह नहीं मानता हूं कि बाहर की व्यवस्था ही आनंद बन जाएगी। वह सिर्फ अवसर बन सकती है, ऑपरच्युनिटी बन सकती है।
एक बीज को हम बोते हैं, अंकुर बीज से निकलता है, लेकिन पास में पड़ी बूंद, गिरा हुआ पानी, सूरज की किरणें मौका बनती हैं। वे सिर्फ मौका बनती हैं कि अंकुर निकल सके। अंकुर उनसे नहीं निकलता, अंकुर तो बीज से ही निकलता है। और बीज की जगह अगर कंकड़ डाला हो तो अच्छे से अच्छी जमीन, अच्छे से अच्छा पानी, अच्छे से अच्छी सूरज की किरणें और कुशल से कुशल माली भी अंकुर नहीं ला सकेगा। दूसरी बात भी सच है–श्रेष्ठतम बीज हो और अच्छी भूमि न मिले, पत्थर पर डाल दिया हो, पानी न मिले और सूरज की किरणें न मिलें, माली के कुशल हाथ न मिले तो अच्छे से अच्छा बीज पत्थर पर पड़ा हुआ, अंधेरे में पानी बिना, सूरज बिना, माली बिना मर जाएगा–अंकुर नहीं निकलेगा।
असल में मेरी दृष्टि में ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव एक ही बड़े हिस्से को दो रूप हैं। दोनों जुड़े हैं। इसलिए जिन लोगों का यह जोर है कि बाहर की व्यवस्था ही ठीक कर देने से आदमी आनंदित हो जाएगा, वे मुझे भ्रांति में मालूम पड़ते हैं; उतनी ही भ्रांति में जैसे वे लोग, जो सोचते हैं कि भीतर का आदमी ही बदल जाए, बाहर से कोई प्रयोजन नहीं है–वे भी इतने ही भ्रांत हैं। क्योंकि उन दोनों ने आधे-आधे को स्वीकार किया है; पूरे जीवन को नहीं। वे दोनों ही गलत हैं अपने अधूरेपन में। और वे दोनों ही सही हैं अपनी उस अधूरी सचाई में, जिससे पूरा जीवन सुखद हो सकता है।
इसलिए एक तरफ जिन्होंने बाहर के जीवन पर ही जोर दिया है, उन्होंने विज्ञान को विकसित करने की कोशिश की है। विज्ञान मूलतः बाहर के जीवन को बदलने की व्यवस्था है। उन्होंने एक तरह का भौतिकवादी, हेडोनिस्ट, सुखवादी दृष्टिकोण विकसित किया है। सुखवाद, भौतिकवाद, बाहर को बदलने का धर्म है। क्रमशः…..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
ओशो का संदेश: आनंद की कुंजी भीतर और बाहर दोनों के रूपांतरण में छिपी है
मनुष्य हमेशा इस खोज में रहा है कि जीवन को कैसे मूल रूप से परिवर्तित किया जाए।
ओशो कहते हैं कि वर्तमान जीवन दुख, पीड़ा, संघर्ष और अशांति से भरा हुआ है। इस दुखद जीवन ने ही परिवर्तन की प्रेरणा पैदा की है। इंसान हमेशा आनंद की आशा करता है—आज दुख में जीता है, कल सुख की उम्मीद करता है, लेकिन जब कल आता है तो वही उतना ही दुखी सिद्ध होता है जितना आज था।
आनंद की खोज क्यों मायावी लगती है
मनुष्य जीवन भर सुख की आशा में जीता है, लेकिन निरंतर दुख ही पाता है। ओशो कहते हैं कि या तो यह मान लिया जाए कि जीवन में आनंद है ही नहीं, या यह समझा जाए कि जिस तरह हम जीवन जी रहे हैं, उसमें आनंद संभव नहीं है—इसलिए जीवन को परिवर्तित करना आवश्यक है।
रूपांतरण के दो मार्ग
- बाहरी परिवर्तन – व्यवस्था, समाज, शरीर, स्वास्थ्य और सुविधाओं को बदलकर आनंद की खोज।
- भीतरी परिवर्तन – अपने अस्तित्व को बदलना ताकि दुख वहीं आनंद में परिवर्तित हो सके।
ओशो मानते हैं कि केवल बाहरी परिवर्तन या केवल भीतर का परिवर्तन अधूरा है। आनंद तभी संभव है जब भीतर और बाहर दोनों में संतुलन हो।
निराशावाद बनाम आशा
निराशावादी कहते हैं कि जीवन में केवल दुख है और आनंद की खोज व्यर्थ है। लेकिन ओशो के अनुसार, यदि एक बुद्ध, कृष्ण या अन्य ज्ञानी के जीवन में आनंद संभव हुआ है, तो यह सभी के लिए संभव है। यदि सूरज निकला है तो अंधकार केवल हमारे बंद द्वारों का परिणाम है।
बीज और अवसर का उदाहरण
ओशो स्पष्ट करते हैं कि जैसे बीज में ही अंकुर छिपा होता है, लेकिन उसके उगने के लिए पानी, धूप और जमीन का सहयोग ज़रूरी है—वैसे ही जीवन में आनंद के लिए भीतर की क्षमता और बाहर का अनुकूल वातावरण दोनों ज़रूरी हैं।
ओशो का निष्कर्ष
- केवल बाहरी व्यवस्था बदलने से आनंद नहीं आएगा।
- केवल भीतर का परिवर्तन भी अधूरा है।
- विज्ञान बाहरी परिवर्तन लाता है, ध्यान (मेडिटेशन) भीतर का रूपांतरण लाता है।
- आनंद का वास्तविक द्वार तभी खुलता है जब भीतर और बाहर दोनों का संतुलन साधा जाए।

