कुम्हारी का पुराना स्वास्थ्य केंद्र खंडहर में तब्दील: सरकारी संपत्ति लुट रही, अधिकारी मौन और जनप्रतिनिधि विकास के दावों में व्यस्त
कुम्हारी। नगर के मध्य स्थित पुराना स्वास्थ्य केंद्र आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है। कभी क्षेत्र के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने वाला यह सरकारी भवन अब जर्जर होकर खंडहर का रूप ले चुका है। भवन की खिड़कियां और दरवाजे तोड़े जा चुके हैं, अंदर रखा सरकारी सामान धीरे-धीरे गायब हो रहा है और असामाजिक तत्वों के लिए यह परिसर सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस पूरी स्थिति से संबंधित विभागीय अधिकारी, प्रशासनिक अमला और स्थानीय जनप्रतिनिधि पूरी तरह बेखबर नहीं हैं, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई बार शिकायतों और मांगों के बावजूद भवन की सुरक्षा, मरम्मत या पुनः उपयोग को लेकर कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। न तो परिसर में सुरक्षा व्यवस्था की गई और न ही सरकारी संपत्ति को बचाने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाया गया। परिणाम यह है कि जनता के टैक्स के पैसों से निर्मित करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति धीरे-धीरे बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है।
नगर में विकास कार्यों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। नई सड़कें, नए भवन, नए प्रोजेक्ट और नए निर्माण कार्यों का लगातार प्रचार किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब पहले से मौजूद सरकारी भवन और सार्वजनिक संपत्तियां संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रही हैं, तब विकास के इन दावों का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
नगरवासियों के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कहीं विकास का फोकस केवल नए निर्माण कार्यों तक सीमित तो नहीं हो गया है। लोगों का कहना है कि नए भवन, नई सड़कें और नई परियोजनाएं शुरू करने में अधिक रुचि दिखाई जाती है, जबकि पुराने सरकारी संसाधनों और संरचनाओं की अनदेखी कर दी जाती है। आम नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि क्या पुराने भवनों के संरक्षण में कोई रुचि इसलिए नहीं दिखाई जाती क्योंकि वहां नए निर्माण कार्यों जैसी गतिविधियां और बजट नहीं होते? यह सवाल भले ही जनता के बीच चर्चा का विषय हो, लेकिन जिम्मेदार तंत्र को इसका जवाब देना चाहिए।
यदि किसी सरकारी संपत्ति को वर्षों तक उपेक्षित छोड़ दिया जाए, उसकी सुरक्षा न की जाए और उसे असामाजिक तत्वों के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के प्रति गंभीर गैर-जिम्मेदारी भी मानी जाएगी। आखिर जब नए विकास कार्यों के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा सकते हैं, तो पहले से मौजूद सार्वजनिक संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक बजट और इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई जाती?
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। चुनाव के दौरान जनता के बीच विकास और जनहित के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन नगर की आंखों के सामने एक महत्वपूर्ण सरकारी भवन लगातार बर्बाद होता रहा और इस मुद्दे पर कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दी। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि विकास की प्राथमिकताएं जमीनी जरूरतों के बजाय केवल दिखाई देने वाले निर्माण कार्यों तक सीमित होती जा रही हैं।
नगरवासियों ने मांग की है कि पुराने स्वास्थ्य केंद्र की तत्काल सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, भवन की स्थिति का तकनीकी परीक्षण कराया जाए, गायब हुए सामान की जांच हो तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही इस भवन के पुनर्विकास या जनहित में उपयोग की स्पष्ट कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए।
कुम्हारी की जनता आज एक सीधा सवाल पूछ रही है—क्या विकास का मतलब केवल नए निर्माण कार्यों का उद्घाटन और शिलान्यास है, या फिर जनता की संपत्तियों को बचाना भी शासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है? यदि सरकारी भवन इसी तरह उजड़ते रहे और जिम्मेदार लोग केवल दावे करते रहे, तो विकास के नारों और जमीनी सच्चाई के बीच का अंतर जनता साफ-साफ देखती रहेगी।

