मुस्लिम महिलाएँ: जमीनी लोकतंत्र की नई धुरी, बदल रही है स्थानीय शासन की तस्वीर

नई दिल्ली/ भारत में स्थानीय स्तर का लोकतंत्र केवल सत्ता तक पहुँचने का रास्ता नहीं है, बल्कि समाज में वास्तविक बदलाव का जरिया भी है। इस बदलाव की अगुवाई आज मुस्लिम महिलाएँ कर रही हैं, जो पंचायतों से लेकर शहरी निकायों तक चुनाव लड़कर और जीतकर शासन की दिशा तय कर रही हैं।

महिलाओं की भागीदारी: लोकतंत्र की धड़कन

भारतीय लोकतंत्र का सबसे जीवंत स्वरूप गांव और कस्बों की राजनीति में दिखाई देता है। यहाँ महिलाओं की भागीदारी ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नई ऊर्जा दी है। विशेषकर मुस्लिम महिलाएँ, जिन्होंने सामुदायिक मुद्दों को प्राथमिकता देकर राजनीतिक आख्यान को नया रूप दिया है। वे न केवल मतदाता और प्रचारक हैं, बल्कि अब उम्मीदवार और निर्वाचित प्रतिनिधि के तौर पर भी सामने आ रही हैं।

सरकारी योजनाओं से खुला रास्ता

उज्ज्वला योजना, जन-धन योजना, नारी शक्ति पुरस्कार, अटल पेंशन योजना और स्वयंसिद्धा जैसी कल्याणकारी योजनाओं ने मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी के रास्ते खोले हैं। इन पहलों ने उन्हें न केवल चुनावी राजनीति में जगह दी है बल्कि निर्णय-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर भी प्रदान किया है।

उत्तर प्रदेश और बिहार का अनुभव

उत्तर प्रदेश के 2023 शहरी स्थानीय चुनावों ने इस प्रवृत्ति को स्पष्ट कर दिया। अधिक मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतरे और उनमें से 61 ने जीत हासिल की। सहारनपुर के चिलकाना नगर पंचायत में फूल बानो की अध्यक्ष पद पर जीत इसका उदाहरण है।
बिहार में भी मुस्लिम महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों और सामाजिक नेटवर्क के बल पर चुनावी सफलता हासिल कर रही हैं, भले ही उन्हें नामांकन और प्रचार के दौरान कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा हो।

असम और केरल में नई इबारत

असम के दक्षिणी ज़िलों में मुस्लिम महिलाओं ने बिना किसी पार्टी चिन्ह के पंचायत चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इससे संकेत मिलता है कि गृहिणियाँ भी अब चुनावी राजनीति में कदम रख रही हैं।
वहीं, केरल का मशहूर महिला समूह कुदुम्बश्री राजनीतिक भागीदारी का बड़ा मंच बन गया है। 2020 के स्थानीय चुनावों में 7,071 सदस्य विजयी हुईं, जिनमें मलप्पुरम जैसे मुस्लिम बहुल ज़िले की महिलाएँ भी शामिल थीं।

संस्थागत सहयोग और भविष्य की राह

राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान और महिला पंचायत सभाओं जैसी पहलें मुस्लिम महिलाओं को नेतृत्व और प्रशिक्षण का अवसर दे रही हैं। वे इन मंचों का इस्तेमाल न केवल अपनी अभिव्यक्ति के लिए कर रही हैं, बल्कि सामुदायिक मुद्दों के ठोस समाधान भी ला रही हैं—जैसे पेयजल, स्वच्छता, सड़क और आंगनबाड़ी सुविधाओं पर विशेष जोर।

निष्कर्ष

स्थानीय निकायों में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश भारतीय राजनीति में केवल प्रतीकात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर गहराई से मज़बूत कर रहा है। आरक्षण, सरकारी योजनाएँ और पंचायती राज संस्थान इनके लिए अवसर बना रहे हैं। यदि यह सहयोग और सशक्तिकरण लगातार जारी रहा, तो आने वाले समय में भारत का जमीनी लोकतंत्र पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन सकता है।

लेखक: डॉ. अल्ताफ़ मीर
जामिया मिल्लिया इस्लामिया