निगम परिसर में बड़े-बड़े गढ्ढे, सवाल उठे – जब अपने घर की ही सुध नहीं, तो पूरे शहर का विकास कैसे करेंगे अधिकारी?

भिलाई-3/ नगर निगम भिलाई-चरोदा का परिसर इस समय खुद ही सवालों के घेरे में है। प्रवेश द्वार पर बने बड़े-बड़े गढ्ढे बरसात के पानी से हर समय भरे रहते हैं। ये गढ्ढे न केवल नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बने हैं, बल्कि निगम की कार्यप्रणाली और जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

प्रवेश द्वार पर गढ्ढों का स्वागत

नगर निगम के मुख्य परिसर में प्रवेश करते ही सबसे पहले नागरिकों का स्वागत इन गढ्ढों से होता है। हर रोज अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि इन्हीं गढ्ढों से गुजरते हैं, लेकिन किसी को इनकी सुध लेने की फुर्सत नहीं है। बरसात के दौरान यहां पानी भरा रहता है, जिससे परिसर के भीतर प्रवेश करना भी चुनौती बन जाता है।

नगरभर में गढ्ढों का साम्राज्य

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह समस्या केवल निगम परिसर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शहर में यही हाल है। जिन वार्डों में पहले गढ्ढे नहीं थे, वहां भी विकास कार्य के नाम पर खुदाई कर गढ्ढे छोड़ दिए गए हैं। हालात यह हैं कि “नगर विकास” अब “गढ्ढा विकास” में बदल चुका है।

विकास कार्य या आधे-अधूरे वादे?

सड़क मरम्मत और नालियों के निर्माण के नाम पर काम शुरू तो किए जाते हैं, लेकिन उन्हें अधूरा छोड़ दिया जाता है। कई वार्डों में महीनों तक गढ्ढे जस के तस पड़े रहते हैं। नागरिकों का कहना है कि जब निगम की प्राथमिकता गढ्ढों को भरने की बजाय और गढ्ढे बनाने में है, तो विकास की असली तस्वीर समझना मुश्किल नहीं है।

सुरक्षा और स्वास्थ्य पर खतरा

इन गढ्ढों में जमा पानी मच्छरों के पनपने का अड्डा बन चुका है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। वहीं, राहगीरों और वाहन चालकों के लिए ये गढ्ढे दुर्घटनाओं को न्योता दे रहे हैं।

जनता का आक्रोश

लोगों का कहना है –“जब निगम अपने ही मुख्यालय को ठीक से संभाल नहीं पा रहा है, तो पूरे शहर की हालत सुधरेगी, इसकी उम्मीद कैसे की जाए?”
नागरिकों का आरोप है कि अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल कागजों पर विकास दिखाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत निगम परिसर के गढ्ढों जैसी है।

राजनीतिक सवाल भी तेज

लोगों का कहना है कि निगम के अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल दिखावे और भाषणों तक ही सीमित हैं। लोगों का आरोप है कि निगम की लापरवाही की वजह से आम जनता परेशान है, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं को केवल उद्घाटन और फोटो खिंचवाने की चिंता है।
आरोप यह भी है कि करोड़ों की योजनाओं का पैसा खर्च तो हो रहा है, लेकिन उसका असर शहर की सड़कों और गलियों पर कहीं दिखाई नहीं देता।

निष्कर्ष

भिलाई-चरोदा नगर निगम परिसर की बदहाल तस्वीर शहर के विकास की असलियत बयान कर रही है। नगर की जनता अब सिर्फ दावे नहीं, बल्कि ठोस काम देखना चाहती है। सवाल साफ है – जब अपने घर की सुध नहीं, तो पूरे शहर का जिम्मा कैसे उठाएंगे निगम के अधिकारी और जनप्रतिनिधि?