
ओशो- मेरी दृष्टि में, व्यक्ति जितना सजग हो, उतना सरल हो जाता है। सरलता सजगता का सहज परिणाम है। और जब सरल हो जाता है तो जीवन में, प्रेम के, आनंद के, सत्य के फूल अपने आप खिलने लगते हैं। यह सरलता की भूमि में खिले हुए सहज फूल हैं। इनको खिलाने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता।
सरल आदमी प्रेमपूर्ण ही होगा और उसका प्रेम बेशर्त होगा, अनकंडीशनल होगा, क्योंकि वह जानता है कि प्रेम में कंडीशंस् सिर्फ जटिल आदमी लगाता है। और जब प्रेम में शर्त लगती है तो प्रेम दुख लाता है, प्रेम आनंद नहीं लाता। अगर मैंने प्रेम में शर्त लगाई कि तुम ऐसे हो तो मैं प्रेम करूंगा; तुम यह करो तो मैं प्रेम करूंगा; मेरे प्रेम के बदले में तुम्हें यह-यह करना पड़ेगा–तो मैं जानता हूं कि मैं अपने दुख को बुला रहा हूं। जहां मैंने शर्त लगाई, प्रेम तो गया। सिर्फ बंधन रह गया और बंधन दुख लाएंगे। इसलिए सरल व्यक्ति का प्रेम बेशर्त होता है।
सरल व्यक्ति प्रेम देता है, लेने की बात ही नहीं करता है। बहुत मिलता है, प्रभूत मिलता है, लेकिन वह लेने की बात नहीं करता है। जितना देता है, उससे हजार गुना मिलता है। लेकिन वह लेने की बात ही नहीं करता। आता है तो धन्यवाद करेगा, अनुगृहीत होगा। नहीं आता है तो बात खत्म हो गई। देने का काम था, वह पूरा हो गया। उसने देने में ही इतना आनंद उपलब्ध कर लिया है कि अब और मांगने की कोई जरूरत नहीं।
सरल आदमी को दिखाई पड़ेगा कि बाहर की जिंदगी में एक चैस्टिटी, एक सौंदर्य, एक तपश्चर्या आनी शुरू हो गई है। लेकिन, इसका कारण यह नहीं है कि वह किन्हीं चीजों को छोड़ रहा है। इसका कारण यह है कि कुछ चीजें व्यर्थ हो गई हैं और गिर रही हैं। जैसे सूखे पत्ते गिर जाते हैं। वृक्ष छोड़ता नहीं है उन्हें।
जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, वह सब होता है, करना नहीं पड़ता। और जीवन में जो भी व्यर्थ है, वह सब करना पड़ता है, वह कुछ भी होता नहीं। और हम सबने ऐसी जिंदगी बनाई, और हमारे नैतिक शिक्षकों ने, धार्मिक शिक्षकों ने हम सबको प्रयास ही सिखाया है, दमन ही सिखाया है, लड़ाई ही सिखाई है और इस तरह हमारे सारे जीवन को कुरूप कर दिया है। हमारे पास जीवन जैसी चीज ही नहीं है, क्योंकि सरल और सहज जैसा हमारा कोई अनुभव ही नहीं है। हम जो भी कर रहे हैं, वह सब हो नहीं रहा है, कर रहे हैं। और करने के कारण उसकी जो निर्दोषता, जो इनोसेंस, जो कुआंरापन है, वह सब खत्म हुआ चला जा रहा है।
तथाकथित साधक अक्सर ऐसी मरी हुई शांति को उपलब्ध हो जाते हैं। उसका कुल मतलब इतना है, उन्होंने अशांति को दबा लिया है, शांति नहीं आई है, अशांति दब गई है। अशांति दबी है तो पता नहीं चलता है। जैसे एक आदमी के हाथ पर घाव है, और पट्टी बांध कर घाव को दबा लिया है, और वह कहता है, घाव है ही नहीं। इस आदमी का घाव मिट नहीं गया है, सिर्फ उसने कपड़ों में दबा लिया है। ऐसी ही मरी हुई शांति के पीछे अशांति दबी हुई है। एक आदमी निरंतर कोशिश करे तो अपनी अशांति को दबा कर उसकी छाती पर चढ़ कर बैठ सकता है और ऐसा दिखने लगेगा कि वह शांत हो गया। लेकिन भीतर अशांति उबल रही है और वह प्रतीक्षा कर रही है। दबाई गई अशांति के लिए निरंतर दबाना पड़ेगा। हर-रोज, रोज दबाना पड़ेगा, जागते-सोते दबाना पड़ेगा। एक क्षण फिर आदमी फुरसत नहीं ले सकता। क्रमशः…..