तो उसमें सारी दुनिया के लोगों के बाबत यह लिखा था। सिर्फ भारत उसमें छूट गया था। तो मेरे एक मित्र ने अमरीका से मुझे वह पत्रिका भेजी और पूछा कि इसमें भारत के बाबत कुछ भी नहीं है। आप मुझे कहें कि अगर भारतीय को शराब पिला दी जाए तो वह क्या करेगा? मैंने कहाः उत्तर जाहिर है। अगर भारतीय को शराब पिला दी जाए तो वह उपदेश देना शुरू कर देगा। वह फौरन आत्मा-परमात्मा की बातें शुरू कर देगा। और गरीबी की वजह से शराब तो मिलती नहीं, इसलिए बिना ही शराब के बातें करनी पड़ती हैं। और शराब मिलना भी तो आसान नहीं है, तो आत्मा-परमात्मा की बात बिना उसके करनी पड़ती है। लेकिन हम सिर्फ बातचीत करने वाली कौम हैं! हमने करना बंद कर दिया है, जीना भी बंद कर दिया है, क्योंकि हमने सोचना ही बंद कर दिया है।
आदमी की गहरी से गहरी आत्मा का विचार तत्व है, आधार है, बुनियाद है–थिंकिंग, सोचना आधार है आदमी के जीवन का। सिर्फ सोचने की वजह से आदमी जानवरों से अलग है। और अगर आदमी भी सोचना बंद कर दे तो वह जानवरों जैसा हो जाता है। भारत में करीब-करीब हालत ऐसी हो गई है। अगर किसी छोटे गांव में जाकर देखें तो आदमी भी वहीं सो रहा है, भैंस भी वहीं बंधी है, गाय भी वहीं खड़ी है, बैल भी वहीं खड़ा है–वह आदमी भी वहीं सो रहा है! अगर बहुत गौर से देखें तो उनमें बड़ी समानता मालूम होती है। वह गाय, बैल और वह आदमी में कोई बहुत बुनियादी फर्क नहीं मालूम पड़ता है। वे सब एक साथ खड़े हुए हैं, वे सब चुपचाप जीए जा रहे हैं। फिर गऊ को माता मानने वाले लोग निश्चित ही गऊ के बेटे से ज्यादा हो भी नहीं सकते।
सोचना छोड़ कर हमने मनुष्यता की, संघर्ष की जो यात्रा है, वह छोड़ दी है–खड़े हो गए हैं पशुओं की तरह। कोई विकास नहीं, कोई गति नहीं, कहीं कोई जाना नहीं–चुपचाप खड़े हैं, स्टैटिक और डेड, रुके हुए और मृत! यह आगे नहीं चलना चाहिए। नहीं चल सकता है, न चलना उचित है। इसे हम तोड़ें। तोड़ने के लिए कोई भीड़ की जरूरत नहीं है। एक-एक आदमी सोचना शुरू कर दे अपनी तरफ से तो हजार चीजें टूटना शुरू हो जाएंगी। सोचेगा तो शायद ताबीज खोल कर फेंक देगा कि यह क्या मैंने नासमझी बांध रखी है। सोचेगा तो शायद पूछेगा–ये पत्थर पर लाल रंग लगा हुआ है, तो इससे ये हनुमान जी हो गए? सोचेगा तो पूछेगा–मंदिर और मस्जिद का झगड़ा अच्छे आदमियों का हो सकता है? सोचेगा तो पूछेगा। सोचेगा तो हजार प्रश्न उठेंगे। और जब प्रश्न उठेंगे तो जवाब खोजने पड़ेंगे। और अगर जवाब नहीं मिलेंगे तो फिर गलत को पकड़ने की बात छोड़नी पड़ेगी। जवाब मिलेंगे तो ठीक हमारे हाथ में आएगा।
सोचना एक कठिन प्रक्रिया है, तकलीफदेह है, आर्डुअस है, मुश्किल है–क्योंकि सोचना कनवीनिएंट नहीं है, सुविधापूर्ण नहीं है।
यह मैं इसलिए कहता हूं कि शायद आपके मन पर कहीं चोट पड़ जाए और आप सोचना शुरू कर दें। नहीं कहता, मेरी बात मान लें। जो आदमी ऐसा कहता है, मेरी बात मान लें, वह आदमी सोचने को बल नहीं देता, सोचने को जड़ से काटता है। किसी की बात मत मानना। बहुत दिन हो चुके हमें बहुत लोगों की बातें मानते-मानते। कभी अपनी भी खोजना, और जिंदगी में एक खयाल ले लेना पक्का कि अगर मेरे पास अपना कोई विचार नहीं तो मैं बेकार जीआ। मरने के पहले कम से कम कुछ तो मेरे पास अपना विचार हो, कि मरते वक्त भगवान के सामने खड़ा होऊं तो कह सकूं, यह मैंने भी सोचा था, यह मैंने भी जीआ था, मैं उधार आदमी नहीं हूं। नहीं तो अभी हम भगवान के सामने खड़े होंगे, तो सिवाय उधारी के हमारे पास कुछ भी नहीं होगा। भगवान पूछेगा, तुम्हारा अपना क्या है? तुमने खुद सोचा था कुछ, जीआ था कुछ, तुमने चेतना कितनी विकसित की? हम कहेंगे, नहीं, हम तो गीता पढ़ते थे, रामायण याद करते थे। हम तो गुरुओं को मानते थे, महात्माओं के पीछे चलते थे। हमें सोचने की जरूरत क्या? हमारे मुल्क में बहुत महात्मा हैं, वे सब काम कर देते हैं। वह भगवान कहेगा, मैंने उन महात्माओं को भी पूछा, वे किन्हीं और महात्माओं के पीछे चलते थे! तुम पीछे ही चलते रहे, तुमने खुद कभी नहीं सोचा?