गीता पढ़ने से कृष्ण पैदा नहीं होते–कृष्ण की भांति उतनी ही तीव्रता से सोचने वाला आदमी कृष्ण जैसी चेतना को, आत्मा को उपलब्ध होता है

ओशो– एक छोटी सी घटना और अपनी बात मैं पूरी करूंगा। एक मित्र ने मुझे अमरीका से एक पत्रिका भेजी। उस पत्रिका में एक लेख था, मजाक का लेख था। उस लेख में, किसी ने सारी दुनिया की जातियों के बाबत कुछ मजाक किए थे। लिखा था कि अगर अंग्रेज को शराब पिला दी जाए तो अंग्रेज बिलकुल चुप हो जाता है, फिर उससे एक शब्द भी निकलवाना बहुत मुश्किल है। सच में, वैसे भी अंग्रेज चुप रहता है। अगर अंग्रेज के साथ सफर करने को मिल जाए डिब्बे में, ट्रेन की, तो वह आपको स्वीकार भी नहीं करेगा कि आप हैं! चैबीस घंटे भी आप साथ होंगे तो वह ऐसे ही रहेगा, जैसे वह अकेला है अपने में बंद। वह आपसे बातचीत नहीं करेगा। अगर शराब पिला दी जाए तो उसका गुण और पूरे रूप में निखर आता है, फिर वह बात करता ही नहीं। अगर फ्रांसीसी आदमी को शराब पिला दी जाए, तो वह नाचने-गाने लगता है एकदम। वह वैसे ही नाचता-गाता रहता है। और अगर डच को शराब पिलाई जाए, तो वह एकदम भोजन पर टूट पड़ता है। वैसे भी डच आदमी भोजन करने बैठता है, तो उसे टेबल पर से उठाना आसान बात नहीं है।तो उसमें सारी दुनिया के लोगों के बाबत यह लिखा था। सिर्फ भारत उसमें छूट गया था। तो मेरे एक मित्र ने अमरीका से मुझे वह पत्रिका भेजी और पूछा कि इसमें भारत के बाबत कुछ भी नहीं है। आप मुझे कहें कि अगर भारतीय को शराब पिला दी जाए तो वह क्या करेगा? मैंने कहाः उत्तर जाहिर है। अगर भारतीय को शराब पिला दी जाए तो वह उपदेश देना शुरू कर देगा। वह फौरन आत्मा-परमात्मा की बातें शुरू कर देगा। और गरीबी की वजह से शराब तो मिलती नहीं, इसलिए बिना ही शराब के बातें करनी पड़ती हैं। और शराब मिलना भी तो आसान नहीं है, तो आत्मा-परमात्मा की बात बिना उसके करनी पड़ती है। लेकिन हम सिर्फ बातचीत करने वाली कौम हैं! हमने करना बंद कर दिया है, जीना भी बंद कर दिया है, क्योंकि हमने सोचना ही बंद कर दिया है।आदमी की गहरी से गहरी आत्मा का विचार तत्व है, आधार है, बुनियाद है–थिंकिंग, सोचना आधार है आदमी के जीवन का। सिर्फ सोचने की वजह से आदमी जानवरों से अलग है। और अगर आदमी भी सोचना बंद कर दे तो वह जानवरों जैसा हो जाता है। भारत में करीब-करीब हालत ऐसी हो गई है। अगर किसी छोटे गांव में जाकर देखें तो आदमी भी वहीं सो रहा है, भैंस भी वहीं बंधी है, गाय भी वहीं खड़ी है, बैल भी वहीं खड़ा है–वह आदमी भी वहीं सो रहा है! अगर बहुत गौर से देखें तो उनमें बड़ी समानता मालूम होती है। वह गाय, बैल और वह आदमी में कोई बहुत बुनियादी फर्क नहीं मालूम पड़ता है। वे सब एक साथ खड़े हुए हैं, वे सब चुपचाप जीए जा रहे हैं। फिर गऊ को माता मानने वाले लोग निश्चित ही गऊ के बेटे से ज्यादा हो भी नहीं सकते।सोचना छोड़ कर हमने मनुष्यता की, संघर्ष की जो यात्रा है, वह छोड़ दी है–खड़े हो गए हैं पशुओं की तरह। कोई विकास नहीं, कोई गति नहीं, कहीं कोई जाना नहीं–चुपचाप खड़े हैं, स्टैटिक और डेड, रुके हुए और मृत! यह आगे नहीं चलना चाहिए। नहीं चल सकता है, न चलना उचित है। इसे हम तोड़ें। तोड़ने के लिए कोई भीड़ की जरूरत नहीं है। एक-एक आदमी सोचना शुरू कर दे अपनी तरफ से तो हजार चीजें टूटना शुरू हो जाएंगी। सोचेगा तो शायद ताबीज खोल कर फेंक देगा कि यह क्या मैंने नासमझी बांध रखी है। सोचेगा तो शायद पूछेगा–ये पत्थर पर लाल रंग लगा हुआ है, तो इससे ये हनुमान जी हो गए? सोचेगा तो पूछेगा–मंदिर और मस्जिद का झगड़ा अच्छे आदमियों का हो सकता है? सोचेगा तो पूछेगा। सोचेगा तो हजार प्रश्न उठेंगे। और जब प्रश्न उठेंगे तो जवाब खोजने पड़ेंगे। और अगर जवाब नहीं मिलेंगे तो फिर गलत को पकड़ने की बात छोड़नी पड़ेगी। जवाब मिलेंगे तो ठीक हमारे हाथ में आएगा।सोचना एक कठिन प्रक्रिया है, तकलीफदेह है, आर्डुअस है, मुश्किल है–क्योंकि सोचना कनवीनिएंट नहीं है, सुविधापूर्ण नहीं है।

न सोचना बहुत सुविधापूर्ण है। कोई और हमारे लिए सोच देता है, हम उसको मान लेते हैं, हमें कुछ भी नहीं करना पड़ता। और हम सब काम दूसरों से लेने के आदी हो गए हैं। और वह भी हम उनसे ले रहे हैं, जो कभी के हो चुके!

अब कृष्ण को हुए कितना जमाना हुआ? अब बेचारे कृष्ण ने सोचा होगा–हम उन्हीं के सोचने से काम चला रहे हैं! हम रोज गीता पढ़ लेते हैं। हमारे बड़े से बड़े महात्मा भी गीता में ही खोजते रहते हैं कि कहां उत्तर मिल जाए! जिंदगी अभी सवाल उठाती है, वह गीता खोल लेते हैं! वह पूछते हैं कि कृष्ण कहीं उत्तर दे दें! तो कृष्ण ने सोचना पूरा कर दिया है? अब हमारा काम यह है कि हम उसी को उधार लेते चले जाएं–बाॅरोड, उधार जीते चले जाएं! हम नहीं सोचेंगे तो हमारे भीतर कृष्ण कभी पैदा नहीं हो सकता।
गीता पढ़ने से कृष्ण पैदा नहीं होता–कृष्ण की भांति उतनी ही तीव्रता से सोचने वाला आदमी कृष्ण जैसी चेतना को, आत्मा को उपलब्ध होता है।यह मैं इसलिए कहता हूं कि शायद आपके मन पर कहीं चोट पड़ जाए और आप सोचना शुरू कर दें। नहीं कहता, मेरी बात मान लें। जो आदमी ऐसा कहता है, मेरी बात मान लें, वह आदमी सोचने को बल नहीं देता, सोचने को जड़ से काटता है। किसी की बात मत मानना। बहुत दिन हो चुके हमें बहुत लोगों की बातें मानते-मानते। कभी अपनी भी खोजना, और जिंदगी में एक खयाल ले लेना पक्का कि अगर मेरे पास अपना कोई विचार नहीं तो मैं बेकार जीआ। मरने के पहले कम से कम कुछ तो मेरे पास अपना विचार हो, कि मरते वक्त भगवान के सामने खड़ा होऊं तो कह सकूं, यह मैंने भी सोचा था, यह मैंने भी जीआ था, मैं उधार आदमी नहीं हूं। नहीं तो अभी हम भगवान के सामने खड़े होंगे, तो सिवाय उधारी के हमारे पास कुछ भी नहीं होगा। भगवान पूछेगा, तुम्हारा अपना क्या है? तुमने खुद सोचा था कुछ, जीआ था कुछ, तुमने चेतना कितनी विकसित की? हम कहेंगे, नहीं, हम तो गीता पढ़ते थे, रामायण याद करते थे। हम तो गुरुओं को मानते थे, महात्माओं के पीछे चलते थे। हमें सोचने की जरूरत क्या? हमारे मुल्क में बहुत महात्मा हैं, वे सब काम कर देते हैं। वह भगवान कहेगा, मैंने उन महात्माओं को भी पूछा, वे किन्हीं और महात्माओं के पीछे चलते थे! तुम पीछे ही चलते रहे, तुमने खुद कभी नहीं सोचा?

और जो आदमी खुद नहीं सोचता, वह खुद कभी हो ही नहीं पाता। उसको बीइंग नहीं मिलता, वह आदमी व्यक्ति नहीं बन पाता। और जो आदमी व्यक्ति बनने से बच गया, वह कैसे धार्मिक होगा? वह कैसे सत्य को जानेगा? वह कैसे प्रभु के मंदिर में प्रवेश पा सकता है? उसके मंदिर में प्रवेश पाने की पहली शर्त है व्यक्ति होना, इंडीवीजुअल होना। अपना कुछ लेकर जाना पड़ेगा वहां चढ़ाने को। समर्पण भी वह मांगेगा–तो अपना तो कुछ होना चाहिए।
देने को हमारे पास अपना क्या है? इसे थोड़ा पूछना, खोजना, सोचना, तो शायद एक धारा फूट पड़े। और अगर इस देश में थोड़े से लोग भी सोचने लगें, तो इस देश का पुरानापन मिट जाए, नई आत्मा पैदा हो जाए; इसकी जड़ता टूट जाए, चेतना विकसित होने लगे। धारा खुल जाए तो शायद पृथ्वी पर हम फिर पैर खड़े करने में समर्थ हो जाएं। वे दूसरे लोग चांद पर पैर रख रहे हैं। और हम पृथ्वी पर ही डगमगा रहे हैं कि कब गिर जाएं। वे दूसरे लोग पैर जमा कर चांद पर खड़े हो गए हैं, और हम? हम उस पृथ्वी पर ही खड़े नहीं रह सकते जहां हम हजारों वर्ष से खड़े हैं, पैर डगमगा रहे हैं। वहीं से हम गिर सकते हैं! यह शोभा योग्य नहीं है। लेकिन, हम होशियार लोग हैं। हम यह देखते नहीं, हम तो पुरानी गाथा चिल्लाए चले जाते हैं कि हम जगतगुरु हैं! हम सारी दुनिया के नेता हैं, सारी दुनिया हमारी तरफ देख रही है! कोई नहीं देख रहा है किसी की तरफ। सब अपनी तरफ देख रहे हैं। और इस भ्रम में मत रहना कि सारी दुनिया हमारी तरफ देख रही है। कोई नहीं देख रहा है। कोई नहीं देख रहा है–किसी को देखने की फुर्सत भी नहीं है, जरूरत भी नहीं है किसी की तरफ देखने की। और कोई हमारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है कि हम आएं और उसको बोध दें, और ज्ञान दें।

हमारी हालत बता रही है कि हम अज्ञान की गहरी से गहरी पर्तों में पड़े हैं–हमसे ज्ञान लेने कौन आएगा? हम सबूत हैं न? हमसे कौन पूछेगा? और हमारी देने की सामथ्र्य क्या है? जिन्हें रोटी मांगनी पड़ रही है, वे और कुछ क्या दे सकते हैं?

नहीं, हम धोखा न दें, अपने को झूठी बातों में न डालें। स्थिति को समझें, सोचें। कम से कम नयेे बच्चों, नई पीढ़ी, नये युवकों, विद्यार्थियों को मैं कहना चाहता हूं, तुम सोचना। तुम अपने पिता की बात मत मान लेना, तुम अपने गुरु की बात मत मान लेना, तुम सोचना। अगर ठीक लगे तो मानना, न ठीक लगे तो लड़ना, मत मानना।

सोरबोन विश्वविद्यालय पर विद्यार्थियों ने एक बड़ी भारी तख्ती लगा दी है फ्रांस में। अलग करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कहा तख्ती अलग नहीं होगी। तख्ती बड़ी छोटी है, लेकिन बड़ी अदभुत है। तख्ती पर लिखा हुआ हैः प्रोफेसर्स, यू आर ओल्ड। लिखा हैः अध्यापको, आप बूढ़े हो चुके हैं। यह तख्ती सोरबोर्न विश्वविद्यालय की बड़ी बिलिं्डग पर सामने लगी है। बहुत कोशिश की, बहुत झगड़ा हुआ; विद्यार्थियों ने कहाः इसे हम अलग नहीं होने देंगे। इसको प्रत्येक प्रोफेसर को पढ़ कर निकलना चाहिए रोज कि आप बूढ़े हो गए हैं। और कृपा करके ध्यान रखें कि हमको बूढ़े बनाने की कोशिश मत करें। तो थोड़ा सोचना। क्रमशः……..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३