ध्यान रहे, एक बार जब हम बाहर के जगत में दुसरे का नकल करना शुरू करते हैं तो भीतर हमारी आत्मा मरनी शुरू हो जाती है
ओशो– तीन हजार वर्ष के लंबे इतिहास में हमने कोई साइंस विकसित नहीं की। क्यों? एक ही उत्तर हो सकता है कि हमें अज्ञात की पुकार सुनाई नहीं पड़ती। वह जो अननोन है, वह जो चारों तरफ से घेरे हुए है वह हमें बुलाता है, लेकिन हमें सुनाई नहीं पड़ता। हम बहरे हो गए हैं, हमें तो जो ज्ञात है हम उसी के घेरे में बैठ कर जी लेते हैं और समाप्त हो जाते हैं। क्यों हमें अज्ञात की पुकार सुनाई नहीं पड़ती? अज्ञात का आह्वान हमारे प्राणों को आंदोलित नहीं करता, क्यों? सिवाय इसके कि हमारे भीतर करेज, साहस नहीं है क्योंकि अज्ञात में जाने के लिए साहस चाहिए। ज्ञात में, नोन में जीने के लिए किसी साहस की जरूरत नहीं है।
इसीलिए तो भारत कभी भारत के बाहर नहीं गया। भारत के युवकों ने कभी भारत के बाहर जाकर अभियान नहीं किए। उन्होंने कोई लंबी यात्राएं नहीं कीं, उन्होंने पृथ्वी की कोई खोज-बीन नहीं की। वे नहीं गए दूर-दूर उत्तर ध्रुवों तक, न ही दक्षिण ध्रुव तक। न ही आज वे चांद-तारों पर जाने की आकांक्षा से भरे हैं। साहस नहीं है। साहस की कमी होती है तो हम वहीं रहना चाहते हैं जहां परिचित लोग हैं, जहां जाना माना है उसी रास्ते पर चलते हैं, जिस पर बहुत बार चल चुके हैं। क्योंकि अनजान रास्तों पर कांटे हो सकते हैं, गढ्ढे हो सकते हैं, भटकना हो सकता है, अनजान रास्ते पर भूल हो सकती है, अनजान रास्ते पर हम खो सकते हैं। यह सारा भय हमें इतना पकड़ लिया है कि हम ज्ञात पर ही चलते हैं, कोल्हू के बैल की तरह हम चक्कर लगाते रहते हैं। लकीर है जानी हुई, उसी को पीटते रहते हैं।
ऐसे कभी इस देश की आत्मा का उदय हो सकेगा? ऐसे भयभीत होकर कभी इस देश के प्राण जागरूक हो सकेंगे? ऐसे डरे-डरे हम जगत की दौड़ में साथ खड़े हो सकेंगे? जहां चेतनाएं दूर की यात्रा कर रही हों, जहां रोज अज्ञात की पुकार सुनी जाती हो, जहां रोज अज्ञात की दिशा में कदम रखे जाते हों, जहां जीवन के एक-एक रहस्य में प्रवेश करने की सारी चेष्टा की जा रही हो। उन सारे दुनिया के युवकों के मुल्क, युवकों के सामने, युवक-मुल्कों के सामने हमारा बूढ़ा और पुराना देश खड़ा रह सकेगा? हम जी सकेंगे उनके साथ? नहीं, हम नहीं जी सकेंगे। और फिर हमारे नेता कहते हैं कि हमारा युवक सिर्फ नकल करता है। नकल नहीं करेगा तो क्या करेगा? अपनी तो कोई खोज नहीं कर सकता है इसलिए जो खोज करते हैं उनकी नकल करने के सिवाय हमारे पास कुछ भी नहीं बचा है, हमारा पूरा व्यक्तित्व इमीटेशन है, पश्चिम का।
हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं। करेंगे हम, क्योंकि उनके साथ खड़े होने का इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। हमारी तो अपनी कोई खोज नहीं है, हमारा तो अपना कोई उदघाटन नहीं, अन्वेषण नहीं, हमारी तो अपनी कोई शोध नहीं, हमारे तो अपने कोई रास्ते नहीं हैं। हमें उनकी नकल करनी ही पड़ेगी। और ध्यान रहे, एक बार जब हम बाहर के जगत में नकल करना शुरू करते हैं तो भीतर हमारी आत्मा मरनी शुरू हो जाती है। क्यों? क्योंकि आत्मा कभी भी नकल नहीं बन सकती है। आत्मा कार्बनकापी नहीं बन सकती है। आत्मा का अपना व्यक्तित्व है, अनूठा, यूनिक। और जब भी हम बाहर से नकल करना शुरू करते हैं तभी भीतर हमारे प्राण सिकुड़ जाते हैं, तभी भीतर हमारे प्राण मुरझा जाते हैं क्योंकि उन प्राणों की अपनी प्रतिभा थी, अपना द्वार होता है, अपना मार्ग होता है। बाहर से नकल करने वाले लोग भीतर से मर जाते हैं लेकिन हम हमेशा नकल करते रहे हैं।
आप कहेंगे पश्चिम की नकल तो हमने अभी-अभी शुरू की है। पहले? पहले हम अतीत की नकल करते थे, अब हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं, इतना फर्क पड़ा है और कोई फर्क नहीं पड़ा है! पहले हम वह जो बीत चुका था उसकी नकल करते थे। जो हो चुका था, जा चुका था, उस इतिहास की जो पीछे था हमारे, उसकी हम नकल करते थे, क्योंकि कंटेम्प्रेरी जगत का हमें कोई भी पता नहीं था। तो हमारे सामने एक ही जगत था, बीता हुआ और हम थे। तो हम बीते की नकल करते थे। राम की, कृष्ण की, बुद्ध की, महावीर की, हम नकल करते थे। हम अतीत की नकल करके जीते थे। अब हमारे सामने कंटेम्प्रेरी वल्र्ड खुल गया है। अब इतिहास धुंधला मालूम होता है। चारों तरफ फैली हुई दुनिया आज हमें ज्यादा स्पष्ट दिखाई पड़ती है। हम उसकी नकल कर रहे हैं। लेकिन हम हजारों साल से नकल ही कर रहे हैं, चाहे बीते हुए लोगों की और चाहे हमसे दूर जो आस-पास खड़ा हुआ जगत है उसकी। लेकिन हमने अपनी आत्मा को विकसित करने की हिम्मत खो दी है, साहस खो दिया है।
युवक क्रांति दल साहस को पुनरुज्जीवित करना चाहता है बाहर के जगत-जीवन में भी, और अंतस के जगत और जीवन में भी। साहस जुट सके, वह कारा टूट सके, दीवालें टूट सकें और साहस की धारा बह सके भीतर से, उसकी फिकर करना चाहता है। लेकिन हमारी सारी धारणाएं साहस के विरोध में हैं। अगर साहस करना है तो संदेह करना पड़ेगा और अगर साहस नहीं करना है तो विश्वास कर लेना हमेशा अच्छा है। साहस करना है तो डाउट चाहिए और अगर साहस नहीं करना है तो फेथ, बिलीफ, श्रद्धा, विश्वास चाहिए।
हमारा सारा देश विश्वास करने वाला देश है। मान लेना है, हमें जो कहा जाता है उस पर सोचना नहीं है, विचार नहीं करना है, क्योंकि सोचने और विचार करने में फिर खतरा है। हो सकता है, हम मानी हुई मान्यताओं से विपरीत जाना पड़े हमें। हो सकता है, मानी हुई मान्यताएं तोड़नी पड़ें, हो सकता है जो स्वीकृत है, जो पक्ष है हमारा वह गलत सिद्ध हो, यह हम सहने को राजी नहीं हैं, इसलिए उसकी तरफ आंख ही नहीं खोलनी है। शुतुरमुर्ग निकलता है और अगर दुश्मन उसका आ जाए तो वह रेत में मुंह गड़ा कर खड़ा हो जाता है। आंख बंद हो जाती है। रेत में तो शुतुरमुर्ग को दिखाई नहीं पड़ता है कि दुश्मन है, वह खुश हो जाता है, वह मान लेता है जो नहीं दिखाई पड़ता है, वह नहीं है।
शुतुरमुर्ग को क्षमा किया जा सकता है, आदमी को क्षमा नहीं किया जा सकता। लेकिन भारत शुतुरमुर्ग के तर्क का उपयोग कर रहा है आज तक। वह कहता है, जो चीज नहीं दिखाई पड़ती है, वह नहीं है। इसलिए विश्वास का अंधापन ओढ़ लेता है और जीवन को देखना बंद कर देता है। क्रमशः……..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३



