इस देश में बचपन आता है और बुढ़ापा आता है; युवक कभी भी पैदा नहीं होता जाने क्यों?
ओशो- युवक क्रांति दल, युक्रांद की इस पहली बैठक को संबोधित करते हुए मैं अत्यंत आनंदित हूं। युवक क्रांति दल के संबंध में पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि मैं युवक किसे कहता हूं। युवक क्रांति दल की दृष्टि में युवक होने का संबंध उम्र और आयु से नहीं है। युवक से अर्थ हैः ऐसा मन जो सीखने को सदा तत्पर है–ऐसा मन जिसे यह भ्रम पैदा नहीं हो गया है कि जो भी जानने योग्य था, वह जान लिया गया है–ऐसा मन जो बूढ़ा नहीं हो गया है और स्वयं को रूपांतरित और बदलने को तैयार है। बूढ़े मन से अर्थ होता है ऐसा मन जो अब आगे इतना लोचपूर्ण नहीं रहा है कि नये को ग्रहण कर सके, नये का स्वागत कर सके। बूढ़े मन का अर्थ हैः पुराना पड़ गया मन। उम्र से उसका भी कोई संबंध नहीं है। आदमी के शरीर की उम्र होती है, मन की कोई उम्र नहीं होती है। मन की दृष्टि होती है, धारणा होती है।
इस देश में युवक हजारों वर्षों से पैदा होने बंद हो गए हैं। इस देश में बचपन आता है और बुढ़ापा आता है; युवक कभी भी पैदा नहीं होता है। वह बीच की कड़ी खो गई है, इसलिए तो देश इतना पुराना पड़ गया है, इतना जरा-जीर्ण हो गया है, इतना बूढ़ा हो गया है। जिस देश में युवक होते हों, उस देश में इतना बुढ़ापा आने का कोई भी कारण नहीं था। हम से ज्यादा बूढ़ा देश पृथ्वी पर और कहीं नहीं है। हमारी पूरी आत्मा बूढ़ी और पुरानी पड़ गई है। हमारी सारी तकलीफ और पीड़ा के पीछे बुनियादी कारण यही है कि हमारे पास युवा चित्त, यंग माइंड नहीं है।
युवक क्रांति दल इस देश में युवा चित्त को पैदा करना चाहता है। युवा-चित्त! युवा-चित्त का अर्थ हैः जो सख्त नहीं हो गया, कठोर नहीं हो गया, पत्थर नहीं हो गया, अभी बदल सकता है, रूपांतरित हो सकता है, अभी सीख सकता है–उसने सब कुछ सीख नहीं लिया।
स्वामी रामतीर्थ की उम्र मुश्किल से तीस वर्ष थी और वे हिंदुस्तान के बाहर गए। पहली बार उन्होंने जापान की यात्रा की। वे जिस जहाज पर सवार थे उस जहाज के डेक पर एक जर्मन बूढ़ा जिसकी उम्र कोई नब्बे वर्ष होगी; जिसके हाथ-पैर कंपते थे, जिसे चलने में तकलीफ होती थी, जिसकी आंखें कमजोर पड़ गई थीं, वह चीनी भाषा सीख रहा था।
चीनी भाषा जमीन पर बोली जाने वाली कठिनतम भाषाओं में से एक है। चीनी भाषा को सीखना सामान्यतया बहुत श्रम की बात है। कोई दस-पंद्रह-बीस वर्ष ठीक से मेहनत करे तो चीनी भाषा में ठीक से निष्णात हो सकता है। बीस वर्ष जिसके लिए मेहनत करनी पड़े, नब्बे वर्ष का बूढ़ा उसे अ ब स से सीखना शुरू कर रहा हो, पागल है। कब सीखेगा वह? कब सीख पाएगा? कौन सी आशा है उसको बच जाने की कि वह बीस साल बचेगा? और अगर बीस साल बच भी जाए और निष्णात भी हो जाए चीनी भाषा में तो उसका उपयोग कब करेगा? जिस चीज को सीखने में पंद्रह-बीस वर्ष खर्च करने पड़ें उसके उपयोग के लिए भी तो दस, पच्चीस-पचास वर्ष हाथ में होने चाहिए। यह उपयोग कब करेगा? रामतीर्थ परेशान हो गए उसको देख-देख कर, परेशान हो गए और वह सुबह से शाम तक सीखने में लगा हुआ है। नहीं, बरदाश्त के बाहर हुआ तो उन्होंने तीसरे दिन उससे पूछा कि क्षमा करें, आप इतने वृद्ध हैं, नब्बे वर्ष पार कर गए मालूम पड़ते हैं, आप यह भाषा सीख रहे हैं, यह कब सीख पाएंगे? कब बच पाएंगे आप सीखने के बाद, कब इसका उपयोग करेंगे?
उस बूढ़े आदमी ने आंखें ऊपर उठाईं और उसने कहाः तुम्हारी उम्र कितनी है? रामतीर्थ ने कहाः मेरी उम्र कोई तीस वर्ष होगी। वह बूढ़ा हंसने लगा और उसने कहा, मैं तब समझ पाता हूं कि हिंदुस्तान इतना कमजोर, इतना हारा हुआ क्यों हो गया है। उस बूढ़े ने कहाः जब तक मैं जिंदा हूं और मर नहीं गया हूं और जब तक जिंदा हूं तब तक कुछ न कुछ सीख ही लेना है; नहीं, तो जीवन व्यर्थ हो जाएगा। मरना तो एक दिन है, वह तो जिस दिन मैं पैदा हुआ उसी दिन से तय है कि मरना एक दिन है। अगर मैं मृत्यु पर ध्यान रखता तो शायद कुछ भी नहीं सीख पाता क्योंकि एक दिन मरना है, क्योंकि एक दिन मरना है। लेकिन जब तक मैं जिंदा हूं, मैं पूरी तरह जिंदा रहना चाहता हूं। और पूरी तरह जिंदा वही रह सकता है जो जीते-जी एक-एक पल का, एक-एक क्षण का, नया कुछ सीखने में उपयोग कर रहा है।
जीवन का अर्थ हैः नये का रोज-रोज अनुभव। जिसने नये का अनुभव बंद कर दिया है वह मर चुका है, उसकी मृत्यु कभी की हो चुकी। उसका अब अस्तित्व पोस्थूमस है, वह मरने के बाद अब किसी तरह जी रहा है। उस बूढ़े आदमी ने कहा कि मैं सीखूंगा, जब तक जीता हूं, और परमात्मा से एक ही प्रार्थना है जब मैं मरूं तो मृत्यु के क्षण में भी सीखता हुआ ही मरूं ताकि मृत्यु भी मुझे मृत्यु जैसी न मालूम पड़े। वह भी जीवन प्रतीत हो।
सीखने की प्रक्रिया है–जीवन। ज्ञान की उपलब्धि है–जीवन। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि हमने सीखना तो हजारों साल से बंद कर दिया है। हम नया कुछ भी सीखने को उत्सुक और आतुर नहीं हैं। हमारे प्राणों की प्यास ठंडी पड़ गई है, हमारी चेतना की ज्योति ठंडी पड़ गई है, हमें एक भ्रम पैदा हो गया है कि हमने सब सीख लिया है, हमने सब पा लिया, हमने सब जान लिया। जानने को अनंत शेष है। आदमी का ज्ञान कितना ही ज्यादा हो जाए, उस विस्तार के सामने ना-कुछ है जो सदा जानने को शेष रह जाता है। ज्ञान तो थोड़ा सा है, अज्ञान बहुत बड़ा है। उस अज्ञान को जिसे तोड़ना है उसे सीखते ही जाना होगा, सीखते ही जाना होगा, सीखते ही रहना होगा।
लेकिन भारत में यह सीखने की प्रक्रिया और युवा होने की धारणा ही खो गई है। यहां हम बहुत जल्दी सख्त हो जाते हैं, कठोर हो जाते हैं, लोच खो देते हैं। बदलाहट की क्षमता, रिसेप्टिविटी, ग्राहकता सब खो देते हैं। एक जवान आदमी से भी यहां बात करो तो वह इस तरह बात करता है जैसे उसने अपनी सारी धारणाएं सुनिश्चित कर ली हैं। उसका सब ज्ञान ठहर गया है, उसकी आंखों में इंक्वायरी नहीं मालूम होती, उसके व्यक्तित्व में जिज्ञासा नहीं मालूम होती, खोज नहीं मालूम होती। ऐसा लगता है, उसने पा लिया, जान लिया, सब ठीक है। आगे अब कुछ करने को शेष नहीं रह गया है। प्राण इस तरह बूढ़े हो जाते हैं, व्यक्तित्व इस तरह जराजीर्ण हो जाता है और हजारों वर्षों से इस देश का व्यक्तित्व जरा-जीर्ण है।
युवक क्रांति दल इस जराजीर्ण व्यक्तित्व को तोड़ देना चाहता है। आकांक्षा यह है कि हम भारत की युवा-चेतना को जन्म दे सकें। युवा-चेतना का दूसरा लक्षण है–साहस। भारत से साहस भी खो गया है, सीखना भी खो गया है, जिज्ञासा भी खो गई है, साहस भी खो गया है। हम तो अंधेरे में जाने से भी भयभीत होते हैं; अनजान रास्तों पर जाने से भयभीत होते हैं; सागर में उतरने से भयभीत होते हैं; पहाड़ चढ़ने से भयभीत होते हैं; और ये तो बहुत छोटी चीजें हैं। जो इन अनजान चीजों से भयभीत होता है वह चेतना के अनजान लोकों में, अननोन में कैसे प्रवेश करेगा! वहां तो वह डर कर लौट आएगा, वहीं बैठा रहेगा जहां है। हमने जीवन की कुछ अनजान गहराइयां-ऊंचाइयां हैं, उनकी यात्रा भी बंद कर दी है। हमने कुछ सूत्र याद कर लिए हैं, हम उन्हीं सूत्रों को याद करके चुपचाप बैठे रह जाते हैं।
व्यक्तित्व हमारी एक साहसपूर्ण, एक एडवेंचरस खोज नहीं है, न तो बाहर के जगत में…हिमालय पर चढ़ने के लिए बाहर से यात्री आते रहे, सैंकड़ों यात्री आते रहे, प्रतिवर्ष उनके दल के दल आते रहे। वे मरते रहे, टूटते रहे, पहाड़ों से गिरते रहे, खोते रहे, लेकिन उनके दलों के आने में कमी नहीं हुई, वे आते रहे। हिमालय पर चढ़ना था, एक अज्ञात शिखर बाकी था जहां मनुष्य के पैर नहीं पहुंचे थे। लेकिन हम, हम सोचते रहे कि पागल हैं, क्या जरूरत है एवरेस्ट पर जाने की, क्या प्रयोजन है? क्यों अपनी जान जोखिम में डालते हैं? हम हंसते रहे कि ये पागल हैं, नासमझ हैं, क्यों अपनी जान जोखिम में डालते हैं? हम, जिनका एवरेस्ट है उन्होंने उस पर चढ़ने की कोई तीव्र आकांक्षा प्रकट नहीं की। यह सवाल एवरेस्ट पर चढ़ने का और हिंद महासागर की गहराइयों में उतर जाने का ही नहीं है। इससे हमारे व्यक्तित्व का पता चलता है कि हम अज्ञात के प्रति आतुर नहीं हैं कि उसका पर्दा उघाड़ लेंगे कि उसे हम जानने में लग जाएंगे, फिर जीवन में बहुत कुछ अज्ञात है। पदार्थ का अज्ञात लोक है, साइंस उसे खोजती है, हमने कोई साइंस विकसित नहीं की। क्रमशः…….
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-३



