“सम्मान की कमी से जन्मती हीनता, और हीनता से विनाश : ओशो”

ओशो- नई पीढ़ी को कैसे शिक्षित करना, यह बड़े से बड़ा सवाल है। और मनुष्यता का सारा भविष्य इस पर निर्भर है। इसकी दो-तीन गहरी बातों को खयाल में लेना चाहिए।

एक तो अब तक बच्चे का पूरी दुनिया में कहीं भी कोई आदर नहीं है। बच्चे से आदर हम मांगते थे, बच्चे को आदर देते नहीं थे। प्रेम देते थे, आदर नहीं देते थे। इसके बहुत ही भयानक परिणाम हुए। इसका सबसे बुरा जो परिणाम हुआ, वह यह हुआ कि जब तक बच्चे को आदर न दिया जाए तब तक हम किसी न किसी गहरे रूप में यह प्रकट करते हैं कि वह हमसे हीन है। हम उसमें हीनता का भाव पैदा करते हैं।यह हीनता का भाव बहुत तरह की विकृतियां पैदा करेगा, करता है और बच्चे बड़े होकर इसी हीनता का बदला जब लेना शुरू करते हैं तभी हमें पता चलता है कि यह क्या हो गया। लेकिन तब भी हम बीमारी को नहीं समझ पाते, क्योंकि बीमारी के बीज बचपन में बोए गए थे और उनका जवाब और उनके फूल और फल बहुत देर बाद आने शुरू होते हैं।

बच्चों के प्रति किया गया अनादर और अपमान अंततः बूढ़े के प्रति किए गए अपमान और अनादर का कारण बनता है। लेकिन पुरानी सारी शिक्षा और सारी संस्कृति बच्चे के सम्मान पर नहीं खड़ी थी। तो बच्चे को कोई सम्मान जैसी बात न थी। हम बच्चे से सम्मान मांगते थे। और मजे की बात यह है कि सम्मान केवल वही दे सकता है जिसको सम्मान दिया गया हो। सम्मान प्रतिध्वनि है। इसलिए बाप आदर योग्य था, मां आदर योग्य थी, शिक्षक आदर योग्य था, और ये तीनों मिल कर जिससे आदर मांग रहे थे, वह बिलकुल आदर योग्य नहीं था। इससे हमने प्रत्येक बच्चे के मन में निरंतर सदियों से इनफिरिआरिटी और हीनता की ग्रंथियां हमने पैदा की। वह हीनता की ग्रंथि कितना दुष्परिणाम लाती है उस पर थोड़ा सा खयाल कर लेना जरूरी है।

असल में जो व्यक्ति एक दफे हीनता के भाव से भर जाता है वह…या तो उसके पास दो ही उपाय रह जाते हैं, या तो वह जीवन में दूसरों को हीन सिद्ध करने की कोशिश में लग जाएगा जो कि रुग्ण है, जैसे राजनीतिज्ञ है। ये हीनता की ग्रंथि से पीड़ित हैं। यह बड़े पदों पर चढ़ कर, बड़ी कुर्सियों पर बैठ कर दूसरों को छोटा करने की कोशिश में लगे हैं। ऐसा फिर जीवन में वह बच्चा बहुत तरह के रास्ते खोजेगा जिनसे दूसरों को कैसे हीन कर सके, छोटा कर सके। और या फिर वह अगर ऐसी स्थितियों में पला हो कि उसे कोई उपाय ही न रह जाए, दूसरे को हीन सिद्ध करने का तो वह अपनी हीनता को आत्मसात कर लेगा, स्वीकार कर लेगा कि मैं हीन हूं।

और कोई व्यक्ति यह मान ले कि मैं हीन हूं तो उसके भीतर जो-जो संभावनाएं थीं, जो प्रकट हो सकती थीं, वे अब कभी प्रकट न हो सकेंगी। उसके भीतर जो-जो बीज थे, फूल बन सकते थे, अब वे कभी फूल न बन सकेंगे। तो या तो वह सुपीरियर होने की कोशिश में लग जाएगा, श्रेष्ठ होने की। और श्रेष्ठ होने की कोशिश में अनेक लोगों को हीन करेगा। और या फिर वह खुद हीन होकर बैठ जाएगा जो कि सुसाइडल है। तो या तो वह दूसरों की हत्या करने का कारण बनेगा या अपनी हत्या करने का कारण बन जाएगा।

तो भविष्य में बच्चों की शिक्षा के संबंध में जो पहली बात मैं कहना चाहूं, वह यह कि हमें अब तक की सारी व्यवस्था का जो मूल आधार था, बच्चे से आदर मांगना और बच्चे को आदर देना–कभी नहीं! उसे आमूल मिटा देना पड़ेगा। बच्चे को आदर देना पड़ेगा। लेकिन हमारे गहरे मन में कहीं यह बात समझ में नहीं आती कि बच्चे को और आदर! असल में हम सब भी हीनता की ग्रंथि से पीड़ित हैं क्योंकि हमारे मां-बाप ने भी हमारे साथ वही किया है। तो छोटे को आदर कैसे दे सकते हैं। लेकिन बड़े आश्चर्य की बात है कि जिसे हम आदर दे नहीं सकते, उससे आदर मांग कैसे सकते हैं! बच्चे को आदर देते ही हमारा चुकता खयाल बदलेगा।

पुराना स्कूल था, उसमें शिक्षक केंद्र पर था, बच्चा नहीं। नया स्कूल, नई शिक्षा में बच्चा केंद्र पर होगा, शिक्षक नहीं। पुराने परिवार में मां केंद्र पर थी, बच्चा नहीं; बाप केंद्र पर था, बच्चा नहीं। नये परिवार में बच्चा केंद्र पर होगा, मां-बाप परिधि पर होंगे। जीवन की सहज स्वाभाविकता भी यही है कि आने वाला सूरज केंद्र पर हो, जाने वाला सूरज परिधि पर हो। आदमी ने जो व्यवस्था बनाई है उसमें जाने वाला सूरज केंद्र पर है और आने वाला सूरज परिधि पर है। जो उग रहा है वह महत्वपूर्ण है, जो विदा हो रहा है, फेड आउट हो रहा है, जा रहा है, उसे हमने महत्वपूर्ण बना रखा है। इसका सबसे बड़ा खतरा तो यह हुआ कि जो विदा हो रहा है, वह इस बच्चे को जिस तरह की भी शिक्षा देगा वह खतरनाक है। वह खतरनाक इसलिए है कि वह जीवन से विदा होता आदमी है। उसके ऊपर मृत्यु की छाया पड़ने लगी है। और अभी यह जीवन की जो कोंपल उग रही है, यह मृत्यु की छाया जिस पर पड़ने लगी है वह इसे शिक्षित करेगा, दीक्षित करेगा और स्वयं महत्वपूर्ण होगा। तो बहुत संभावना यह है कि वह इस उगते हुए अंकुर को जगह-जगह से काट डाले।
अब तक आदमी ने यही किया है इसलिए अच्छा आदमी पैदा नहीं हो सका। और यह विसियस सर्किल है कि क्योंकि जो हमारे मां-बाप ने हमारे साथ किया है वह ब्लूपिं्रट बन जाता है। हम अपने बच्चों के साथ वही करते हैं। बच्चे अपने बच्चों के साथ वही करते हैं। तो यह सिलसिला लंबा होता है। इसका कोई अंत नहीं मालूम होता। अगर ठीक से समझें तो आदमी विकास नहीं कर पाता, सिर्फ पुनरुक्त करता है। हर पीढ़ी दोहरा जाती है वही जो पिछली पीढ़ी ने उसके साथ किया था। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3