अटल परिसर विवाद : “जनता के नाम पर राजनीति, विकास के नाम पर खेल!”

कुम्हारी/ नगर की राजनीति में एक बार फिर “अटल परिसर” चर्चा का केंद्र बन गया है। वार्डवासियों का सवाल है कि जब अटल परिसर के लिए अलग स्थान निर्धारित था, तो योग मंच को तोड़कर परिसर क्यों बनाया गया?

स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले मंगल भवन के सामने त्रिभुजाकार स्थान को सर्वसम्मति से तय किया गया था, ताकि वहां प्रतिदिन हजारों लोग भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रतिमा को नमन कर सकें।
मगर नगर के एक पार्षद द्वारा कथित मनमानी निर्णय लेते हुए योग मंच को ध्वस्त कर उसी पर अटल परिसर बना दिया गया — जिससे अब सवाल उठ रहा है कि क्या जनभावनाओं की अनदेखी “व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा” के नाम पर की गई?

रामाधार शर्मा का बयान : “गर्व भी है, ग़लती भी है”

रामाधार शर्मा ने कहा —

“अटल परिसर के लिए 30 लाख रुपए पास हुए हैं, पर कितना खर्च हुआ यह जांच का विषय है। मैंने स्वयं पालिका में आवेदन लगाया है। अटल जी की मूर्ति पर हमें गर्व है, लेकिन जगह का चयन पूरी तरह गलत हुआ है।”

अब बड़ा सवाल यह है — क्या यह बयान जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है या फिर नगर की राजनीति में एक नई चाल का हिस्सा है?

राजनीति का पुराना खेल — आरोप, जवाब और फिर सन्नाटा

नगर की जनता अब सवाल पूछ रही है —
क्या यह वही भाजपा नहीं है, जिसने नगर पालिका चुनाव के दौरान कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाकर चुनावी जीत हासिल की थी?
उस समय भ्रष्टाचार के किस्से हवा में उड़ाए गए, मंचों पर नारे लगे, “पारदर्शी शासन” का वादा किया गया…

लेकिन सत्ता में आने के एक साल बाद न कोई खुलासा हुआ, न कोई जवाब मिला।

दूसरी ओर, विपक्ष में बैठी कांग्रेस का मौन भी कम चौंकाने वाला नहीं।
कहीं न कहीं इस पूरे खेल में कांग्रेस का निष्क्रिय रवैया भी यह साबित करता है कि वह खुद भी इस राजनीतिक नगर विकास के खेल में पूरी तरह शामिल है।
अगर ऐसा नहीं होता, तो भाजपा द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों को एक साल से पचा कर क्यों बैठी है?

यह अब नगरवासियों के लिए सबसे गंभीर सवाल बन चुका है —
👉 भरोसा आखिर किस पर किया जाए?

जनता की पीड़ा – विकास गायब, बयानबाज़ी हाज़िर

जनता कह रही है —

“कभी भ्रष्टाचार का मुद्दा, कभी मूर्ति की जगह का झगड़ा, पर जनता की समस्या वही की वही!
नगर का विकास सिर्फ भाषणों और बोर्डों में दिखता है, ज़मीन पर नहीं।”

अंत में जनता का व्यंग्यात्मक संदेश:

“जब अटल जी के नाम पर भी राजनीति की जा सकती है,
तो फिर नगर के विकास की उम्मीद रखना शायद सबसे बड़ा मज़ाक है!”