“पुरानी पीढ़ी की भूल: युवक बिगड़ा नहीं, ऊर्जा से भर गया है , “‘ना’ कहने के लिए शक्ति चाहिए, और आज के युवक में वह शक्ति है — ओशो”
ओशो- शायद आप जान कर हैरान होंगे कि अमरीका के मनोवैज्ञानिक आज अमरीका में यह सलाह दे रहे हैं कि बाल-विवाह फिर से शुरू कर दिया जाए। किन्से ने अपनी रिपोर्ट में दस साल की मेहनत के बाद यह खबर की है अमरीका की सरकार को कि बाल-विवाह के लिए हमें प्रोत्साहन देना चाहिए, क्योंकि युवकों के पास इतनी शक्ति इकट्ठी हो गई है कि कहीं वह डिस्ट्रक्टिव न हो जाएं। कहीं वे पूरे समाज को न तोड़ डालें।
यह इस बात की खबर है कि अतिरिक्त शक्ति खतरनाक हो सकती है। लेकिन अतिरिक्त शक्ति सृजनात्मक भी हो सकती है। सृजन और विध्वंस एक ही शक्ति से होते हैं। आज जो बच्चे पत्थर फेंक रहे हैं बसों पर, स्कूल के कांच तोड़ रहे हैं, शिक्षक के विरोध में खड़े हैं, वे सृजनात्मक भी हो सकते हैं। सिर्फ उनके पास अतिरिक्त शक्ति है और इस अतिरिक्त शक्ति का नियोजन शिक्षा के सामने एक नया सवाल है। स्मृति की जगह बुद्धिमत्ता को जगह देना है और अब तक की शक्ति जो पैदा हुई है, उसका नया नियोजन करना है। वह नियोजन नहीं है। हमें खयाल में नहीं है कि अगर एक युवक दो घंटे तक हाॅकी खेलता रहे तो पत्थर फेंकने की क्षमता उसमें कम हो जाती है। क्योंकि हाॅकी फेंकने में, बाॅल को चोट मारने में, गेंद को हमला करने में वही शक्ति निकल जाती है जो बस के ऊपर पत्थर फेंकती है, जो कांच तोड़ती है। शक्ति वही है, नियोजन का सवाल है। हमें अब तक खयाल था कि बच्चे खेलते हैं।
असल में दुनिया में जवान कभी था नहीं, इसलिए जवान की अतिरिक्त शक्ति के लिए खेल भी ठीक से विकसित नहीं हो पाया। और हमारे मुल्क में तो और कठिनाई है कि जवान करीब-करीब खेल ही नहीं रहा है। और मैं मानता हूं कि जब तक जवान तीन-चार घंटे खेलने में नियोजित न हो तब तक बसें टूटती रहेंगी और कांच फूटते रहेंगे। यह जवान अपनी तरफ से खेलने का रास्ता खोज रहा है। बूढ़े इसको गंभीरता से ले रहे हैं। जवानों के लिए यह खेल से ज्यादा नहीं है। बूढ़े इसे गंभीरता से ले रहे हैं। यह उनके लिए खेल है। अतिरिक्त शक्ति बाहर निकलना चाहती है, ओवरफ्लो होना चाहती है। अतिरिक्त शक्ति तो हमने इकट्ठी कर ली, ओवरफ्लो का कोई मार्ग नहीं है।
दूसरी बात, यह जो अतिरिक्त शक्ति है यह केवल स्कूल या कालेज में पांच घंटे बैठ कर टेबल पर पढ़ने से नहीं निकल पाती। बल्कि पांच घंटे टेबल पर बैठने से और इकट्ठी हो जाती है। स्कूल से बच्चों को निकलते आपने देखा होगा। स्कूल से वे ऐसे निकलते हैं जैसे कारागृह से छूट गए हों। किताबें फेंकते हुए, बस्ता उछालते हुए, स्लेटें फोड़ते हुए घर की तरफ भागते हैं। और जिस दिन पता चल जाए कि कल छुट्टी है तो सारे वातावरण में चिल्लाहट मच जाती है कि छुट्टी है और वह कल इस कारागृह में वापस नहीं आना पड़ेगा। पांच घंटे, छह घंटे बच्चे बैठे हैं। छोटे बच्चे! उनको बिठाया हुआ है वह छह घंटे उनकी बेचैनी इकट्ठी हो रही है। कहीं छह घंटे बच्चे इकट्ठे बैठ सकते हैं? अगर छह घंटे बच्चे को आप घर में छोड़ें तो आप देखो वह कितना दौड़ेगा, कितना भागेगा, वृक्ष पर चढ़ेगा, नदी में कूदेगा, लड़ेगा, गिरेगा, सब करेगा और छह घंटे वह बैठा रहा है। वह लड़ना, दौड़ना, वृक्ष पर चढ़ना वह सब इकट्ठा हो गया है। अब इसका क्या होगा? कंडेंस्ड, इकट्ठा हो गया है, इसका क्या होगा? इसका कुछ परिणाम होगा भयंकर। वह भयंकर परिणाम हम भोग रहे हैं।
शिक्षक और पुरानी पीढ़ी के लोग समझते हैं कि युवक बिगड़ गए हैं। गलत है उनका सोचना। कोई बिगड़ नहीं गया है। सिर्फ अतिरिक्त शक्ति इकट्ठी हो गई है उसका निष्कासन नहीं है। और यह भी ध्यान रहे कि इस अतिरिक्त शक्ति के इकट्ठे होने के और भी कारण हैं, जो पहले नहीं थे।
एक तो मैंने कहा, बाल-विवाह अतिरिक्त शक्ति को कभी इकट्ठा नहीं होने देता था। दूसरा मैं आपसे कहूं, दुनिया में स्वास्थ्य इतना अच्छा कभी भी नहीं था जितना अच्छा आज है। दस बच्चे पैदा होते थे पुरानी दुनिया में तो आठ बच्चे मर जाते थे। जिस दुनिया में दस बच्चे पैदा हों और आठ मरते हों, उसमें दो बच्चे जो बचते थे वे भी अधमरे ही बचते थे। वह भी ठीक से नहीं बच सकते थे। पुरानी दुनिया में पचास प्रतिशत लोगों के चेहरों पर चेचक के दाग मिल जाते थे। मलेरिया था, प्लेग था, हैजा था, न मालूम कैसी-कैसी महामारियां थीं। उनकी वजह से अतिरिक्त शक्ति कभी इकट्ठी न हो पाती थी और आदमी मरा-मरा जीता था, इसलिए आज्ञाकारी था। आज्ञाकारी सिर्फ मरे-मराए लोग ही हो सकते हैं। जहां जिंदगी है वहां थोड़ी आज्ञा का टूटना शुरू होगा। और या फिर जिंदगी को नियोजित करने के लिए हमें चिंता करनी पड़ेगी, मार्ग देना पड़ेगा। इसलिए बेटे सदा सिर झुकाए हुए बाप की आज्ञा मानते हैं। असल में ‘नो’, नहीं, कहने के लिए अतिरिक्त शक्ति चाहिए। ‘हां’ कहने के लिए शक्ति की कोई जरूरत नहीं होती। ‘हां’ शक्तिहीन भी कह सकता है। ‘न’ शक्तिशाली ही कह सकता है।
पुरानी पीढ़ी के बच्चों ने कभी ‘न’ न कहा, क्योंकि इतनी शक्ति ही न थी। न स्वास्थ्य था, न ज्यादा उम्र थी, न विटामिंस थे, न बीमारियों से लड़ने के लिए दवाइयां थीं। आदमी ऐसा जीता था बुझा-बुझा। दीया भी जल लेता है, तेल कम हो तो भी, लेकिन भभक कर नहीं जल सकता। और तूफानों से टक्कर लेने का विचार नहीं कर सकता। लेकिन जब तेल पूरा हो और बाती स्वच्छ हो तो फिर दीया धीमे-धीमे नहीं जलता। फिर वह भभक कर जलता है। फिर वह तूफानों से टक्कर लेना चाहता है, फिर वह हवाओं से जूझना चाहता है और उस जूझने में आनंद लेना चाहता है।
युवक पहली दफे पैदा हुआ है। वैज्ञानिक सुविधा ने युवक को पैदा किया है। और इस युवक के साथ हम क्या करें, हमें कुछ भी पता नहीं है। क्योंकि पुराना कोई अनुभव काम नहीं देता। क्रमशः…
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
युवक पहली बार पैदा हुआ है — अतिरिक्त शक्ति का नियोजन ही शिक्षा की नई चुनौती : ओशो
ओशो का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था।
उन्होंने कहा था कि आज की युवा पीढ़ी के पास जितनी शक्ति है, उतनी पहले किसी भी समय नहीं थी। यह शक्ति सृजन का भी कारण बन सकती है और विध्वंस का भी। सवाल केवल इस शक्ति के नियोजन का है।
अमेरिका में उठी बाल-विवाह की चर्चा
ओशो ने अपने प्रवचन में कहा था कि —
“शायद आप जानकर हैरान होंगे कि अमेरिका के मनोवैज्ञानिक आज यह सलाह दे रहे हैं कि बाल-विवाह फिर से शुरू किया जाए। डॉ. किन्से ने अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दिया कि युवकों में इकट्ठी हुई शक्ति कहीं समाज को तोड़ न दे, इसलिए उसे दिशा देना आवश्यक है।”
उन्होंने कहा, यह संकेत है कि अतिरिक्त शक्ति खतरनाक भी हो सकती है और सृजनात्मक भी।
सृजन और विध्वंस — एक ही शक्ति से
ओशो ने स्पष्ट किया कि आज जो युवक पत्थर फेंक रहे हैं, बसों के शीशे तोड़ रहे हैं, या विद्रोह कर रहे हैं —
उनमें वही ऊर्जा है जो सृजन भी कर सकती है।
“सिर्फ फर्क है नियोजन का,” उन्होंने कहा।
“अगर एक युवक दो घंटे तक हॉकी खेले तो बस पर पत्थर फेंकने की शक्ति कम हो जाती है। क्योंकि वही ऊर्जा खेल में निकल जाती है।”
ओशो के अनुसार, जब तक युवाओं की ऊर्जा को खेल, कला या सृजन में नहीं लगाया जाएगा —
वह किसी न किसी रूप में विनाश का मार्ग ढूंढेगी।
स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
ओशो ने शिक्षा प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न उठाया।
उन्होंने कहा —
“बच्चों को पाँच-छह घंटे तक टेबल पर बैठा दिया जाता है।
इतनी देर तक बैठने से उनकी शक्ति और बेचैनी इकट्ठी हो जाती है।
स्कूल से निकलते ही वे किताबें फेंकते हैं, बस्ता उछालते हैं — जैसे जेल से छूटे हों।”
उनका कहना था कि शिक्षा को स्मृति-आधारित नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता-आधारित बनाना चाहिए,
ताकि युवा की ऊर्जा दबे नहीं, बल्कि सही दिशा पाए।
पुरानी पीढ़ी की गलतफहमी
ओशो ने कहा —
“शिक्षक और पुरानी पीढ़ी यह मान रही है कि युवक बिगड़ गए हैं,
पर ऐसा नहीं है। वे केवल ऊर्जा से भरे हुए हैं और उसका निकास नहीं हो पा रहा।”
उन्होंने समझाया कि पुरानी पीढ़ी में इतनी ऊर्जा नहीं थी —
क्योंकि तब बीमारियाँ, कमजोर स्वास्थ्य और असुरक्षा हावी थीं।
आज के युवा पहले से कहीं अधिक स्वस्थ, समर्थ और ऊर्जावान हैं।
इसलिए वे ‘ना’ कहने की ताकत रखते हैं।
‘ना’ कहना भी जीवन का संकेत
“‘हां’ कहना शक्तिहीन भी कर सकता है, लेकिन ‘ना’ कहना केवल शक्तिशाली ही कर सकता है,”
ओशो ने कहा।
पुराने समय में लोग आज्ञाकारी थे क्योंकि उनमें जीवनी-शक्ति कम थी।
अब जब जीवन शक्ति बढ़ी है, तो विरोध, सवाल और विद्रोह स्वाभाविक हैं।
यह बिगड़ापन नहीं, बल्कि जीवन का उफान है।
अतिरिक्त शक्ति को दिशा देना ही समाधान
ओशो का संदेश स्पष्ट था —
“आज के युवक पहली बार वास्तव में पैदा हुए हैं।
पुराना अनुभव अब काम नहीं आएगा।
अब हमें नई शिक्षा, नए खेल, और नई दिशा की आवश्यकता है।”
उन्होंने कहा कि जब तक युवा की अतिरिक्त शक्ति को सृजन की ओर नियोजित नहीं किया जाएगा,
वह समाज में विस्फोट का कारण बनती रहेगी।
निष्कर्ष
ओशो के शब्दों में —
“जहां जिंदगी है, वहां आज्ञा टूटेगी।
लेकिन उस टूटन में भी सृजन छिपा है —
बस जरूरत है, उस ऊर्जा को दिशा देने की।”
आज जब युवा पीढ़ी ऊर्जावान, जिज्ञासु और असंतुष्ट दिखाई देती है —ओशो का यह विचार और भी गहराई से समझने योग्य हो गया है।



