“कप्तान साहब कब जाएंगे?” — दुर्ग पुलिस महकमे का सबसे चर्चित सवाल, लेकिन आखिर बेचैनी किस बात की है?

 “कप्तान साहब कब जाएंगे?” — दुर्ग पुलिस महकमे का सबसे चर्चित सवाल, लेकिन आखिर बेचैनी किस बात की है?

दुर्ग। जिले के पुलिस महकमे में इन दिनों अपराध नियंत्रण, कानून-व्यवस्था या जनता की सुरक्षा से ज्यादा एक सवाल चर्चा के केंद्र में है—”एसपी साहब का ट्रांसफर कब होगा?”। हैरानी की बात यह है कि यह सवाल आम नागरिक नहीं, बल्कि विभाग के भीतर के कुछ लोग ही सबसे ज्यादा पूछते और फैलाते नजर आते हैं।

थानों के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक, हर जगह यही चर्चा सुनाई पड़ जाती है। कोई संभावित तारीख बता रहा है, कोई तबादला सूची आने का दावा कर रहा है, तो कोई अपने “पक्के सूत्रों” का हवाला देकर माहौल बनाने में जुटा है। हालांकि इन पक्की खबरों का हश्र अक्सर कच्ची अफवाहों जैसा ही होता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वर्तमान पुलिस कप्तान से ऐसी कौन-सी परेशानी है, जो कुछ लोगों को उनके जाने का इतना बेसब्री से इंतजार है? क्या वजह यह है कि विभाग में अनुशासन की कसावट बढ़ी है? क्या जवाबदेही तय होने लगी है? क्या अब काम के बदले सिर्फ कुर्सी गर्म करने का दौर समाप्त हो रहा है? या फिर कुछ लोगों को यह तकलीफ है कि अब हर चीज पहले जैसी सहज और सुविधाजनक नहीं रही?

समझ से परे यह भी है कि जिन लोगों की निगाहें हर समय तबादला सूची पर टिकी रहती हैं, वे आने वाले कप्तान से आखिर कौन-सी विशेष “सुविधाओं” की उम्मीद लगाए बैठे हैं। क्या उन्हें ऐसा माहौल चाहिए जहां काम कम और आराम ज्यादा हो? क्या वे उस दौर की वापसी चाहते हैं जब जिम्मेदारियों से ज्यादा रिश्तों का महत्व हुआ करता था? या फिर उन्हें उस व्यवस्था की तलाश है जहां सवाल कम पूछे जाएं और जवाबदेही नाम की चीज फाइलों में बंद रहे?

यह भी चिंतन का विषय है कि यदि वर्तमान व्यवस्था से इतनी असहजता है तो आखिर उससे पहले ऐसी कौन-सी सुविधाएं उपलब्ध थीं जो अब दिखाई नहीं दे रहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ लोगों को कानून के पालन से ज्यादा मनमर्जी की आदत पड़ गई थी? और अब जब नियम-कायदे सामने खड़े हैं तो बेचैनी स्वाभाविक लग रही है।

विडंबना यह है कि जिस विभाग की प्राथमिकता अपराधियों में डर पैदा करना होना चाहिए, वहां कुछ लोग अपने ही कप्तान के तबादले की संभावनाओं का गणित बैठाने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। जनता यह देखकर हैरान है कि जिन कंधों पर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी है, वे कुछ स्थानों पर प्रशासनिक अटकलों में अधिक रुचि लेते नजर आते हैं।

सरकारी सेवा में तबादले सामान्य प्रक्रिया हैं। अधिकारी आते हैं, जाते हैं और व्यवस्था चलती रहती है। लेकिन यदि किसी अधिकारी के जाने की प्रतीक्षा कामकाज से ज्यादा उत्साह के साथ की जा रही हो, तो सवाल अधिकारी पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर खड़ा होता है जो अनुशासन से असहज और जवाबदेही से परेशान हो जाती है।

फिलहाल दुर्ग पुलिस महकमे में यह चर्चा जारी है। मगर आम जनता की नजर में असली सवाल एसपी के ट्रांसफर का नहीं, बल्कि उन लोगों की बेचैनी का है जो हर सुबह ड्यूटी से पहले यह जानने में अधिक रुचि रखते हैं कि “कप्तान कब जाएंगे”, बजाय इसके कि वे यह सोचें कि जनता के लिए क्या बेहतर किया जा सकता है।

क्योंकि इतिहास गवाह है—ईमानदार और सख्त अधिकारियों के जाने की सबसे ज्यादा प्रतीक्षा अक्सर वही लोग करते हैं जिन्हें व्यवस्था से नहीं, व्यवस्था में आई सख्ती से परेशानी होती है।