“जागरण ही जीवन की क्रांति : अचेतन से चेतन की यात्रा”_ ओशो
ओशो- मेरी दृष्टि में, एक ही पाप है–सोया हुआ होना। और एक ही पुण्य है–जागा हुआ होना। क्योंकि सोए हुए होने में फिर सब पाप आमंत्रित हो जाते हैं, वह निमंत्रण है और पापों के लिए। और जागे हुए होने पर सब पुण्य भागे चले आते हैं क्योंकि वह निमंत्रण है सूरज का। वह निमंत्रण है, जहां फूल खिलते हैं, जहां बंद कलियां पंखुड़ियां खोल देती हैं, जहां बंद सुगंध भीतर की बाहर बिखर जाती है, जहां पक्षी गीत गाते हैं। जहां आकाश में उड़ने वाले पक्षी भी डेरा बसेरा करते हैं। वह एक नई दुनिया है बिलकुल।
तो इसलिए मैं कहता हूं, ट्रांसफार्मेशन का, क्रांति का, परिवर्तन का, रूपांतरण का, व्यक्तित्व को आमूल बदलने का एक मात्र गहरा सूत्र है, और वह है, निरंतर जागे हुए जीना; एक-एक पल जागे हुए जीना। हम जो भी कर रहे हैं, उसमें जागे हुए जीना। ऐसा कुछ भी न हो हमसे जब हम सोए हुए थे, इसका ध्यान रखना, इसका निरंतर स्मरण रखना। इसके लिए, इसके प्रति निरंतर सजग होना कि एक कदम भी मेरा ऐसा न पड़े, हाथ भी मेरा न उठे, आंख भी मेरी न झपके। न मैं कुछ ऐसा देखूं जो मैंने सोए हुए देखा हो। न मैं कुछ ऐसा सुनूं जो मैंने सोया हुआ सुना हो। मेरा एक गेस्चर भी सोया हुआ न हो, इशारा भी सोया हुआ न हो, सब जागा हुआ हो। ऐसी जो चेष्टा, ऐसा जो श्रम, ऐसी जो निरंतर साधना है, वह साधना व्यक्ति को मूच्र्छा से जागरण की दुनिया में ले जाती है और अनकांशस से कांशस में ले जाती है।
जितना व्यक्ति जागता है उतना अनकांशस मिटने लगता है, अचेतन मिटने लगता है, अचेतन समाप्त होने लगता है। और जितना व्यक्ति सोता है उतना अचेतन में डूबने लगता है। हमारे भीतर काफी गहरा अचेतन है। अगर दस हिस्से करें मन के, तो नौ हिस्सा अचेतन है, अनकांशस है, एक हिस्सा चेतन है। जब हम शराब पी लेते हैं तो वह भी अचेतन हो जाता है। जब हम रात सो जाते हैं तो वह भी अचेतन हो जाता है। जब हम सेक्स में, काम में पीड़ित होकर पागल हो जाते हैं तब वह फिर चेतन सो जाता है। वह चेतन सो जाता है और अब हम ‘पूरा का पूरा ब्लाक’ अचेतन के ही हो जाते हैं। जब हम जागते हैं तो चेतन बढ़ता है। और जब हम चैबीस घंटे जाग कर जीते हैं तो चेतन गहरा होने लगता है।
जिस दिन पूरा मन, पूरा मानस चेतन हो जाता है, एक कोना भी नहीं रह जाता जो अनकांशस है, अचेतन है; मेरे भीतर एक भी चीज नहीं रह जाती जिसे मैं नहीं जानता हूं, जो मेरे होश में नहीं है; मैं एक भी काम ऐसा नहीं करता हूं जिससे मुझे कहना पड़े कि मैंने अनजाने कुछ कर दिया, मुझे पता नहीं था; एक शब्द नहीं बोलता हूं, जो मैंने नहीं बोला है–तब फिर जीवन में एक क्रांति होनी शुरू हो जाती है। एक नया ही व्यक्ति जन्म ले लेता है। और ऐसा व्यक्ति आनंद को आकर्षित करता है। ऐसा व्यक्ति आनंद को बुलाता है। वह जो भी करता है आनंद ही आता है। वह जो भी करता है, उससे प्रेम ही बहता है। वह जो भी करता है उससे सदभावना ही उठती है। वह जो भी करता है, सुगंध ही बहती है। और ध्यान रहे, जो हम से बहता है, वही हम में आता है।
वह प्रभु को कैसे स्वीकार करे, दुखी चित्त माने ही कैसे कि प्रभु भी हो सकता है, परमात्मा भी हो सकता है? दुख तो इनकार ही करेगा। दुख तो कहेगा, कुछ भी नहीं है। दुख तो कहेगा, शुभ असंभव है। दुख तो कहेगा, सत्य हो नहीं सकता; क्योंकि दुख इतना बड़ा है कि इस दुख से तालमेल कैसा है ईश्वर का? मूच्र्छा इनकार करेगी परमात्मा से। और जैसे ही व्यक्ति जागा, परमात्मा ही रह जाएगा। और कण-कण में वही दिखाई पड़ने लगेगा। क्योंकि जिसे, सब तरफ से आनंद मिल रहा हो, जो सब तरफ से आनंद में जी रहा हो, जिसका कण-कण आनंद में नाच रहा हो, जिसकी श्वास-श्वास नृत्य कर रही हो, वह कैसे माने यह कि यह जगत सिर्फ पदार्थ है, कि सिर्फ मिट्टी-पत्थर से बना है, हवा-पानी से बना है? नहीं मान सकता। यह आनंद की पुलक उसे कह रही है कि इस जगत के बहुत गहरे में आनंद का ही स्रोत होना चाहिए।
जो व्यक्ति मूच्र्छित है, वह कैसे माने कि जगत में चेतना है, कांशसनेस है? कोई चेतन शक्ति है जीवन को सब तरफ से आवेष्ठित किए हुए है–कोई ब्रह्म, कैसे माने? जो खुद मूच्र्छित है, वह कैसे माने? वह यही मान सकता है कि सब पदार्थ है, सब मैटर है। असल में मूच्र्छा मान ही नहीं सकती कि चेतना कहीं है। वह मूच्र्छा कहेगी कि सब पदार्थ है, सब मैटर है। लेकिन जब कोई जागता है तब वह पाता है कि पदार्थ तो कहीं भी नहीं है। क्रमशः…..
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
ओशो का संदेश : जागरण ही जीवन की सच्ची क्रांति
एक ही पाप, एक ही पुण्य
ओशो कहते हैं– मेरी दृष्टि में केवल एक ही पाप है सोया हुआ होना, और केवल एक ही पुण्य है जागा हुआ होना।
सोया हुआ होना सभी पापों का निमंत्रण है और जागा हुआ होना सभी पुण्यों का आह्वान।
जागरण है जीवन का असली सूत्र
परिवर्तन, रूपांतरण और क्रांति का एक मात्र गहरा सूत्र है–
हर पल जागे हुए जीना।
एक भी कदम, एक भी इशारा, एक भी शब्द अचेतन से न आए; सब कुछ पूर्ण चेतना में घटित हो।
अचेतन से चेतन की ओर
मन का अधिकांश भाग अचेतन है।
- दस हिस्सों में नौ हिस्सा अचेतन
- केवल एक हिस्सा चेतन
जब हम शराब, नींद या वासना में खो जाते हैं, तो वह चेतन हिस्सा भी सो जाता है।
जैसे-जैसे व्यक्ति जागता है, चेतन बढ़ता है और अचेतन मिटने लगता है।
पूर्ण चेतना की अवस्था
जिस दिन पूरा मन चेतन हो जाता है, कोई कोना अचेतन नहीं रह जाता–
तब जीवन में एक गहरी क्रांति घटित होती है।
व्यक्ति नया जन्म लेता है।
उसके हर कार्य से आनंद, प्रेम, सद्भावना और सुगंध प्रवाहित होती है।
दुख बनाम आनंद
- दुखी चित्त ईश्वर को नहीं मान सकता।
- दुख हमेशा इनकार करेगा, कहेगा कि कुछ भी नहीं है।
- लेकिन जागरण के साथ व्यक्ति को हर कण-कण में परमात्मा दिखाई देने लगता है।
जागरण से नया दृष्टिकोण
मूर्छित व्यक्ति जगत को केवल पदार्थ मानता है।
परंतु जो जाग गया, उसे पता चलता है कि पदार्थ तो कहीं भी नहीं है, केवल चेतना है।
यही चेतना ही ब्रह्म है, जीवन को आवेष्ठित करने वाली शक्ति है।
यह प्रवचन हमें याद दिलाता है कि जीवन की सच्ची आध्यात्मिक यात्रा अचेतन से चेतन की ओर जागरण है।



