ओशो- हमने जीवन को दो हिस्सों में तोड़ लिया है, शरीर और आत्मा के। इसलिए समाज दो हिस्सों में टूट गयाः गृहस्थ और संन्यासी।
मैं आपको कहूं, जिस दिन मकान-मकान मंदिर बनेगा, उस दिन दुनिया में धर्म आ सकेगा, उसके पहले धर्म नहीं आ सकता। जब तक रहने का मकान अलग और पूजा का मकान अलग, तब तक दुनिया में धर्म कभी नहीं आ सकता। यह जिंदगी टूटी हुई नहीं है। जिंदगी इकट्ठी है। जिंदगी बिलकुल इकट्ठी है। और अगर आप सोचते हों कि मैं तेईस घंटे दुकान पर बैठूंगा और घर का काम करूंगा और घंटे भर के लिए मंदिर में भी आकर बैठ जाऊंगा, तो आप सोचते हैं, क्या तेईस घंटे का आदमी घंटे भर के लिए बदल जाएगा, दूसरा हो जाएगा? यह कैसे संभव है। जो आप तेईस घंटे थे, चेतना अविछिन्न है, कंटिन्युअस है। जो आप तेईस घंटे थे वही मंदिर में बैठ कर भी, आप घंटे भर में होंगे। आप माला फेरते हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; आप नमोकार पढ़ते हों; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; आप गीता पढ़ते हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; पढ़ने वाला व्यक्ति वही है, जो दुकान पर बैठा था। उसका चित्त वही है, उसके जीवन की दृष्टि और ढंग वही है। वह माला पढ़े, वह मंदिर में आए, वह जप करे, वह कुछ भी करे, इससे कुछ होने वाला नहीं है। नहीं होने वाला इसलिए है कि इन सारी बातों से चेतना परिवर्तित नहीं होती।