यही तो कठिनाई है। अगर कोई आदमी आपसे आकर कहे कि फलां आदमी असाधु है, बेईमान है, चोर है, तो हम बड़ी प्रफुल्लता से स्वीकार कर लेते हैं। कोई आकर कहे कि फलां आदमी साधु है, सज्जन है, संत है, तो कभी आपने खयाल किया है कि आपके भीतर स्वीकार का भाव बिलकुल नहीं उठता। आप कहते हैं कि तुम्हें पता नहीं होगा अभी, पीछे के दरवाजों से भी पता लगाओ कि वह आदमी साधु है? क्योंकि हमने बहुत साधु देखे हैं। तुमने सुन लिया होगा किसी से। कोई दलाल, कोई एजेंट तुम्हें मिल गया होगा साधु का, उसने तुमसे प्रशंसा कर दी। जरा सावधान रहना। इस तरह के जाल में मत फंस जाना।