लेकिन जब संपत्ति पैदा होती है तो दिखाई पड़नी शुरू होती है और हजारों आंखों में ईष्र्या का कारण बनती है।
अब यह जो आदमी है, ईष्र्या में जी रहा है। मकान बड़े हो सकते हैं सृजन से, ईष्र्या से नहीं। हां, ईष्र्या से बड़े मकान छोटे बनाए जा सकते हैं; लेकिन ईष्र्या से छोटे मकान बड़े नहीं बनाए जा सकते। ईष्र्या के पास सृजनात्मक शक्ति नहीं है। ईष्र्या जो है–मृत्यु की साथी है, जीवन की नहीं। लेकिन सारी दुनिया में समाजवाद का जो प्रभाव है उसकी बुनियाद में ईष्र्या आधार है। लेकिन मजा यह है कि जिस गरीब को यह ईष्र्या सता रही है और शायद गरीब को उतनी नहीं सता रही है जितनी अमीर और गरीब के बीच के जो नेता खड़े हैं; उनको सता रही है। यह जो ईष्र्या इनको सता रही है, वह ईष्र्या अमीरों के खिलाफ जितना नुकसान पहुंचाएगी; वह बड़ा नहीं है। इसका अंतिम नुकसान गरीबों को ही पहुंचनेवाला है। क्योंकि अमीर जो संपत्ति पैदा कर रहा है वह संपत्ति अंततः गरीब तक पहुंच रही है, पहुंचती है, पहुंच ही जाती है। उसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।