ओशो- तुम्हें भेंट में भी नहीं दी जा सकती मुक्ति। क्योंकि भेंट की कोई कीमत करना ही नहीं जानता। कितनी चीजें तुम्हें भेंट में मिली हैं, तुमने कोई कीमत की? जीवन तुम्हें भेंट में मिला है, तुमने कभी परमात्मा को धन्यवाद दिया कि हे प्रभु, तेरा मैं अनुगृहीत हूं, क्योंकि तूने मुझे जीवन दिया? जीवन से और क्या मूल्यवान हो सकता है? नहीं, तुम्हारे भीतर कोई अनुग्रह नहीं उठा। उसने तुम्हें चैतन्य दिया है, तुमने अपने चैतन्य के लिए धन्यवाद दिया? नहीं, शिकायतें की होंगी, संदेह प्रकट किए होंगे, न अनुग्रह जगा, न श्रद्धा जगी। ऐसे ही तुम्हें अगर मोक्ष भी मिल जाए, तो तुम मोक्ष में भी शिकायतें करोगे कि आज धूप ज्यादा है, कि आज वर्षा हो गई, कि आज कपड़े सुखाने थे, कि आज यह करना था, कि आज वह करना था। तुम्हें मोक्ष भी अगर मिल जाए मुफ्त . . .परमात्मा ने सब दिया है, मोक्ष को बचा रखा है। वह तुम्हें खोजना है। ताकि तुम उसकी कीमत कर सको, उसका मूल्य कर सको।