राम प्रिय हैं, लेकिन रामराज्य नहीं—अतीत की पुनरावृत्ति नहीं, नए समाज का निर्माण जरूरी है
ओशो- एक गांव में, एक चर्च में एक फकीर को निमंत्रण दिया था लोगों ने बोलने के लिए कि आप बोलने आएं। वह फकीर बोलने गया। उन लोगों ने कहा कि सत्य के संबंध में हमें समझाइए। उस फकीर ने कहा, सत्य के संबंध में! लेकिन समझाने के पहले मैं एक बात पूछूंगा, चर्च के लोगों तुमसे मैं एक बात पूछता हूं। मेरा उत्तर दे दोगे तभी मैं समझाऊंगा। उस फकीर ने कहा कि तुमने बाइबिल जरूर पढ़ी होगी, बाइबिल में ल्यूक का उनहत्तरवां अध्याय है वह भी तुमने पढ़ा होगा, जिन लोगों ने ल्यूक का उनहत्तरवां अध्याय पढ़ा हो वह हाथ ऊपर उठा दें।
सब लोगों ने हाथ उठा दिए, सिर्फ एक आदमी जो सामने बैठा था उसको छोड़ कर। उन सबने कहा कि हमने पढ़ा है। उस फकीर ने कहा, हाथ नीचे कर लें, अब मैं सत्य पर प्रवचन शुरू करता हूं। और तुम्हें बता देता हूं कि ल्यूक का उनहत्तरवां अध्याय जैसा कोई अध्याय ही बाइबिल में नहीं है। और आप सबने पढ़ा है! वह है ही नहीं अध्याय वहां। उनहत्तरवां अध्याय है ही नहीं ल्यूक का कोई। अब मैं सत्य पर बोलना शुरू करता हूं क्योंकि पहले पता तो चल जाए कि कैसे लोग इकट्ठे हैं? अगर सभी लोग सत्य पर बोलते हों तो सत्य पर बोलना फिजूल है। अब ठीक वक्त, ठीक जगह तुमने मुझे बुला लिया। लेकिन उसने कहा कि मुझे बड़ा आश्चर्य है कि इस चर्च में एक सत्य बोलने वाला कैसे आ गया? क्योंकि चर्च की तरफ, मंदिरों की तरफ सत्य बोलने वाले जाते ही नहीं। यह आदमी मेरे सामने बैठा है यह मिरेकल है, एक चमत्कार है यह आदमी हाथ नहीं उठाया। हे मेरे भाई! उसने उस आदमी से कहा कि तुमने हाथ क्यों नहीं उठाया? आश्चर्य! तुम इतने सत्यवादी हो। उस आदमी ने कहा कि महाशय, जरा जोर से बोलिए मुझे कम सुनाई पड़ता है। क्या आप यह कह रहे हैं कि उनहत्तरवां अध्याय ल्यूक का? साहब रोज पढ़ता हूं, सुबह उसी का पाठ करता हूं। ये चर्च में इकट्ठे लोग हैं, यहां इनको सत्य की शिक्षा देनी पड़ती है।
ये बुद्ध-महावीर सुबह से सांझ तक बेचारे सत्य की, अहिंसा की, प्रेम की चर्चा करते हैं। ये किन लोगों के सामने करते होंगे? इसी तरह इस चर्च जैसे लोग वहां इकट्ठे होंगे।
नहीं; राम थे सुंदर, राम थे सत्य, लेकिन राम का समाज नहीं है। अगर समाज इतना सुंदर और सत्य होता, तो उस समाज से हम पैदा होते! हम पैदा कहां से होते हैं? हम अपने अतीत से पैदा होते हैं। हम सबूत होते हैं अपने अतीत के असली। इतिहास नहीं। हम हैं असली सबूत अतीत के। बेटा अपने बाप का सबूत है। फल अपने बीज का सबूत है। फल अगर कड़वा है और फल कहे कि बीज तो बड़ा मधुर था। तो हम मानेंगे नहीं। हम कहेंगे कि बीज का पता नहीं चला होगा तुम्हें। बीज कड़वा ही रहा होगा, अन्यथा तुम कड़वे कैसे हो जाते! तुम उससे पैदा हुए हो, तुम उसके सबूत हो। आज बीज तो नहीं है खो गया मिट्टी में कहीं, लेकिन तुम हो। और तुम बताते हो कि बीज कैसा रहा होगा!
हिंदुस्तान में कुछ व्यक्ति अच्छे पैदा हुए हैं। समाज कभी भी अच्छा नहीं था। हम सबूत हैं उसके। वह समाज तो खो गए। हम हैं सबूत उसके। हम उससे पैदा हुए हैं। हम उसी की प्रॉडक्ट हैं। इसलिए भूल कर भी पीछे लौटने का विचार मत करें। पीछे से तो हम आ रहे हैं। वहां जाने की अब जरूरत नहीं है। हमें जाना है आगे। और आगे जहां जाना है वहां अतीत की भूलों से हम सीख लें, अतीत के ढांचे को पुनरुक्त करने की जरूरत नहीं है। नये ढांचे, जीवन के लिए नये मार्ग, जीवन के लिए नया चिंतन, नये द्वार, नये तथ्य, नई समाज व्यवस्था खोजनी है।
नहीं; राम बहुत प्यारे हैं, लेकिन रामराज्य बिल्कुल भी नहीं चाहिए। गांधी को बहुत प्रेम था राम से। वे दीवाने थे राम के। कहें कि बिल्कुल दीवाने थे राम के। बड़ा प्रेम उनको रहा होगा। मरते वक्त, गोली भी लगी तो न पिता का नाम याद आया, न मां का, न भाई का, न बेटों का, न गांधीवादियों का, राम का नाम याद आया। नाम आया राम का याद! लग गई छाती में गोली उस क्षण में वही नाम याद आया जो सबसे प्यारा उन्हें रहा होगा। जो प्राणों के प्राण में बैठा रहा होगा वही उस क्षण में याद आ सकता है। उस वक्त धोखा नहीं दिया जा सकता। फुर्सत कहां हैं मरते आदमी को कि धोखा दे दे। तो उस वक्त सोचे कि अभी राम का नाम ले दूं तो अच्छा असर पड़ेगा, लोग कहेंगे कि धार्मिक है। इतनी फुर्सत वहां नहीं है। आमतौर से तो ऐसे ही लोग रामराम कहते हुए सड़क पर से निकलते हैं। जब कोई नहीं सुनता तो धीरे-धीरे कहते हैं या नहीं भी कहते। जब रास्ते पर कोई दिखाई पड़ता है कि आ रहा है तब जोर-जोर से राम-राम, राम-राम जोर से कहने लगते हैं। वह सुनाने के लिए। लेकिन गांधी की छाती में तो लगी है गोली, सुनाने का सवाल कहां है! इस अंतिम क्षण में तो वही निकल सकता है जो प्राणों के प्राणों में गहरे बैठा हो। राम उनके प्राण हैं। राम के वे दीवाने हैं। उसी दीवानगी में वे कहने लगे कि राम का राज्य चाहिए। वह भूल है। वह बात ठीक नहीं है। राम का राज्य नहीं चाहिए। हमें तो भविष्य का राज्य निर्मित करना है। कोई सामंतवादी व्यवस्था में वापस नहीं लौट जाना है। इन्हीं सारी बातों पर देश के प्राणों को चिंतन करना जरूरी है।
मैं यह नहीं कहता हूं कि जो मैं कहता हूं वही मान लें। जो भी आदमी आपसे कहे कि मेरी बात मान लो वह आदमी अच्छा नहीं है, सज्जन नहीं है, वह आदमी ठीक नहीं है, वह आदमी खतरनाक है। सच तो यह है कि अपनी बातों को मनवाने की जबरदस्त चेष्टा वही करता है जिसको खुद शक होता है कि मेरी बातें ठीक हैं या नहीं। मुझे उसका प्रयोजन नहीं है। मुझे जो ठीक लगता है वह मैं पूरे मुल्क को कह देना चाहता हूं। अगर वह ठीक लगे ठीक, गलत लगे उसे कचरे में फेंक देना। अगर आपके विवेक को ठीक लगे तो ठीक, अन्यथा मेरे कहने से कुछ सत्य नहीं हो जाता है। लेकिन मेरी इतनी स्पष्ट बात से भी गांधीवादी परेशान हो गए।
मैं कहता नहीं किसी को कि मेरी बात मान लो। मैं कहता नहीं कि मेरा वचन आप्त वचन है कोई आथेरिटी है। मैं कहता नहीं यह। मैं यह कहता हूं कि मैं गांधी पर सोचता हूं, जो मुझे दिखाई पड़ता है वह मुझे कहना चाहिए। और लोगों को बता देना चाहिए। वे भी यह सोचें, विचार करें। गांधी पर हम ठीक से सोचें और विचार करें तो शायद हम अपने मुल्क के लिए, आने वाले भविष्य के रास्ते बनाने में, देखने में, बहुत योग्यता से सफल हो सकेंगे।
और यह ध्यान रहे कि गांधी पर सोचना महावीर और बुद्ध पर सोचने से ज्यादा कारगर सिद्ध होगा। क्योंकि महावीर और बुद्ध से हमारा फासला बहुत लंबा हो गया है। ढाई हजार साल का। गांधी से हमारा फासला बहुत कम है। बहुत निकट है।
दूसरी बात, गांधी पर सोचना और भी उपयोगी है क्योंकि महावीर और बुद्ध ने समाज के जीवन को बदलने के लिए कोई विचार नहीं किया। उन्होंने व्यक्ति को शांति, ध्यान, मोक्ष तक ले जाने की विज्ञान को खोजा। लेकिन समाज के ढांचे को बदलने की कोई बात नहीं सोची। गांधी हिंदुस्तान में, पहले इतनी ऊंची कोटि के विचारक हैं जिन्होंने समाज के मोक्ष के लिए भी विचार किया है। इसलिए गांधी पर विचार करना बहुत जरूरी है।
और स्वभावतः क्योंकि गांधी पहले आदमी हैं, एक माइल स्टोन हैं। हिंदुस्तान में गांधी के पीछे का इतिहास, हिंदुस्तान के साधु और संन्यासी का समाज से भागने का इतिहास है। गांधी हिंदुस्तान के पहले साधु हैं जो समाज से नहीं भागे और समाज में खड़े होकर समाज को बदलने की कोशिश की। पहले आदमी से भूल-चूक होना संभव है। पहला आदमी पायोनियर है। पहला आदमी एक नया रास्ता तोड़ता है। वह परिपूर्ण बातें नहीं कह सकता। परिपूर्ण बातें तो अंतिम आदमी भी नहीं कह सकता है। और गांधी हिंदुस्तान में एक नई दृष्टि के पहले उदघाटक हैं। इसलिए बहुत भूल की संभावनाएं हैं। अगर हम इन पर विचार नहीं करेंगे तो हम अपना ही आत्मघात करने में सहयोगी होंगे।
क्रमशः….29
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3



