ओशो: अतीत और भविष्य के बीच सेतु बनाना युवाओं की जिम्मेदारी है”
ओशो- जब किसी मुल्क की जिंदगी में ऐसी घटना घट जाए, जहां कि हमें किसी एक-दूसरे की भाषा पर भी भरोसा न रह जाए, तो उस मुल्क को हमें सेन नहीं मानना चाहिए, वह इनसेन हो गया, एक पागलपन पकड़ गया है। इस पागलपन को तोड़ना जरूरी है। अन्यथा हम बड़ी अजीब हालतों में रोज उलझते चले जाएंगे। समस्याएं जिनको दिखाई पड़ती हैं उन्हें समाधान नहीं दिखाई पड़ता, जिन्हें समाधान दिखाई पड़ता है उन्हें कोई समस्याएं दिखाई नहीं पड़तीं। बूढ़ों के पास समाधान हैं लेकिन उन्हें समस्याएं दिखाई नहीं पड़तीं। बच्चों के पास समस्याएं हैं लेकिन उन्हें समाधान दिखाई नहीं पड़ते। किन्हीं के पास पैर हैं, किन्हीं के पास आंखें हैं, दोनों के बीच कोई सेतु नहीं है।
इससे हम अनेक तलों पर मल्टी-डाइमेन्शनल न मालूम कितने आयामों में कितनी दिशाओं में कितने सवाल खड़े कर लिए हैं। इन सारे सवालों को मिटाने के लिए एक तो सुझाव मैं देना चाहता हूं वह यह है और मैं समझता हूं कि वह युवकों को ही सुझाव शुरू करना पड़ेगा। क्योंकि बढ़े कई अर्थों में रिजिड हो जाते हैं। स्वभावतः जब हम भी बूढ़े हो जाएंगे तो हम भी रिजिड हो जाएंगे। आज जो बच्चे हैं कल जब बूढ़े हो होंगे वे भी रिजिड हो जाएंगे। बुढ़ापा रिजिडिटी लाता है। असल में बुढ़ापे का मतलब ही रिजिडिटी है। हड्डियां ही सख्त नहीं होतीं दिमाग की नसें भी सख्त हो जाती हैं। हाथ-पैर ही कड़े नहीं हो जाते, विचार भी कड़े हो जाते हैं। शरीर ही मरने के करीब नहीं पहुंच जाता, भीतर का सारा व्यक्तित्व भी सख्त हो कर सूख जाता है और मरने के करीब पहुंच जाता है। इसलिए बूढ़े आदमी से बहुत ज्यादा आशा नहीं की जा सकती है।
अगर जिस डायलॉग की मैं बात कर रहा हूं उसको अगर पैदा करना है तो हिंदुस्तान के युवकों को ही उसको फेस करना पड़ेगा। हिंदुस्तान के युवक को ही कोशिश करके हिंदुस्तान के बूढ़े से संबंध स्थापित करना पड़ेगा। और एक बात तो यह भी ठीक है कि बूढ़े को चिंता भी ज्यादा नहीं हो सकती, क्योंकि भविष्य बूढ़े का नहीं है, भविष्य जवानों का है। अगर चिंता भी होनी चाहिए तो जवानों को होनी चाहिए, क्योंकि कल उनको जीना होगा इस मुल्क में, कल इस मुल्क में बूढ़ों को नहीं जीना होगा। वे अपने कब्रिस्तानों में और अपने कब्रगाहों में चले गए होंगे। उनके लिए बहुत चिंता का कारण भी नहीं है।
चिंता का कारण होना चाहिए युवकों के लिए। लेकिन बड़े मजे की बात है कि युवक बिल्कुल चिंतित मालूम नहीं पड़ते, बूढ़े बहुत चिंतित मालूम पड़ते हैं। युवक ऐसे निशिं्चत जी रहे हैं जैसे कि बूढ़ों का कोई भविष्य है, उनको परेशान होने की कोई जरूरत है। विद्यार्थी इस तरह जी रहे हैं जैसे कि शिक्षकों की सारी मुसीबत है।
नहीं, पिछली पीढ़ी की कोई भी मुसीबत नहीं है, पिछली पीढ़ी विदा हो जाएगी। आने वाली सारी मुसीबतें नई पीढ़ी पर होंगी। और अगर नक्सलाइट ढंग से सोचने वाले युवक सोचते हों कि हम बूढ़ों से लड़ रहे हैं, तो वे गलती में हैं। वे अपने ही भविष्य को नष्ट करने के लिए लड़ रहे हैं। क्योंकि बूढ़ों से लड़ने का क्या मतलब है? वे तो मरने के करीब हैं वे विदा हो जाएंगे। उनकी जिंदगी गई, उनकी समाज की व्यवस्था भी गई। जिनको जीना होगा इस मुल्क में उनके लिए सवाल उठेगा।
लेकिन कुछ ऐसी भूल हो रही है कि ऐसा लगता है कि हम पिछली पीढ़ी से लड़ कर कुछ बड़ी कामयाबी हासिल कर रहे हैं। लड़के सोचते हैं कि शिक्षकों से लड़ कर कामयाबी हासिल कर रहे हैं। उन्हें पता नहीं कि शिक्षकों से लड़ कर कामयाबी हासिल करने का कोई मतलब नहीं है।
असल में हम जो भी लड़ रहे हैं, उपद्रव कर रहे हैं, उसमें हम अपने ही पैरों को पंगु कर रहे हैं। कल जिसको इस देश में जीना होगा उसी के लिए यह सवाल है। लेकिन शायद जवान को इतनी समझ नहीं होती कि इतनी दूर तक देख सके। शायद वह बहुत दूर तक नहीं देख पाता। भविष्य उसका है, लेकिन भविष्य में देखने की क्षमता जवान के पास नहीं होती। असल में जवान वर्तमान में जीता है। आज काफी मालूम पड़ता है। लेकिन अगर आज हम गलत जीएं तो कल हमारा गलत हो जाएगा। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि यह जो सवाल है, यह जो समस्या है कि हम दोनों पीढ़ियों के बीच भारत के अतीत और भारत के भविष्य के बीच अगर कोई सेतु, कोई ब्रिज बनाना चाहते हैं, तो यह काम भारत के जवानों को अपने हाथ में उठाना पड़ेगा। यह सवाल उन्हीं का है। और हिंदुस्तान की पुरानी पीढ़ियों को साफ जवानों से कह देना चाहिए कि सवाल तुम्हारे हैं, सवाल हमारे नहीं हैं। और अगर तुम आत्महत्या करने पर उतारू हो तो तुम आत्महत्या कर लो, हमें चिंता नहीं है। क्योंकि हम तो मर जाएंगे।
हिंदुस्तान के जवान को यह बात साफ हो जानी चाहिए कि वह जो भी कर रहा है उसका अच्छा या बुरा परिणाम उसके ही ऊपर होने वाला है। यह बहुत साफ बात मालूम नहीं दिखाई पड़ती। ऐसा मालूम पड़ता है कि सब सवाल बूढ़ों के हैं। परेशानी बूढ़ों को हो रही है और जवान उनको परेशान करने में आनंदित मालूम हो रहा है। उसका आनंद बहुत महंगा पड़ेगा। और उसका आनंद बहुत अज्ञानपूर्ण है। उसके आनंद में बहुत प्रज्ञा नहीं है, उसके आनंद में बहुत वि.जडम नहीं है। वह अपने हाथ से अपने आगे के रास्ते तोड़ रहा है और खराब कर रहा है। और ध्यान रहे कि जो वह अपने बूढ़ों के साथ कर रहा है वह अपने बच्चों से अपेक्षा कर ले कि उससे भी ज्यादा उनके साथ किया जाएगा। क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो किया जाता है।
मैं एक घर में मेहमान था, और मैं हैरान हुआ उस घर में एक घटना को देख कर। उस घर में तीन पीढ़ियां थीं, जैसे कि आमतौर में परिवारों में होती हैं। मैं दूसरे नंबर की पीढ़ी का मेहमान था। उस पीढ़ी के बेटे भी थे, उस पीढ़ी के बाप भी थे। उस पीढ़ी के सज्जन अपने बाप के साथ ऐसा दुव्र्यवहार करते थे जिसका कोई हिसाब नहीं। तीन दिन देख कर मैं तो हैरान हो गया। मैं तो अपरिचित मेहमान था, लेकिन तीन दिन देख कर मैं तो हैरान हो गया। लेकिन वे सज्जन अपने बेटे से बहुत अच्छे व्यवहार की अपेक्षा भी करते थे।
मैंने एक दिन रात चलते वक्त उनसे कहा कि आप बड़े गलत ख्यालों में पड़े हैं। आपका बेटा भलीभांति देख रहा है कि आप अपने बाप के साथ क्या कर रहे हैं। तो आप यह भूल कर भी मत सोचें कि आपका बेटा आपसे कमजोर निकलेगा। आपका बेटा आपसे भी मजबूत निकलेगा। और जो आप अपने बाप के साथ कर रहे हैं वह बेटा आपको ठीक से उत्तर दे जाएगा। आप बड़ी गलत अपेक्षा कर रहे हैं कि आप अपने बाप के साथ दुव्र्यवहार कर रहे हैं और अपने बेटे से सदव्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं।
अधिक लोग दुनिया में यह भूल करते हैं। चाहे उनके लोगों की कोई भी व्यवस्था हो। हम सब अपने से पिछली पीढ़ी के साथ दुव्र्यवहार करते हैं और अपने से आने वाली पीढ़ी के साथ अच्छे व्यवहार की आशा रखते हैं। यह असंभावना है।
असल में अगली पीढ़ी हमारे व्यवहार को देख कर ही सीखती है कि हम क्या कर रहे हैं। अगर हिंदुस्तान के आज के जवानों को अपनी पुरानी पीढ़ी से सेतु बनाने से असमर्थता है, तो वे ध्यान रखें, यह खाई उनके बच्चों और उनके बीच और भी बड़ी हो जाएगी। अभी तो हम भाषा ही नहीं समझ रहे हैं, फिर हम बोलचाल भी नहीं कर सकेंगे। अभी तो हम बोलते हैं कम से कम, भाषा समझ में नहीं आती। फिर हम बोलना भी बंद कर देंगे। क्योंकि बोलना भी फिजूल है, बेकार है। बोलने का कोई मतलब न रह जाएगा।
हिंदुस्तान में दोनों पीढ़ियों से मैं संबंधित हूं और बहुत हैरानी से देखता हूं कि वे दोनों एक-दूसरे को समझने में असमर्थ मालूम पड़ते हैं। कौन सी कठिनाइयां हैं? पहली कठिनाई तो यह है कि जवान आदमी कभी भी यह नहीं समझ पाता कि बूढ़ा रिजिड हो जाता है। यह स्वभाव है। वह ठहर जाता है, जम जाता है, फ्रोजन हो जाता है। उसने जिंदगी में जो भी जाना है वह धीरे-धीरे ठहर कर सख्त हो जाता है। और बूढ़े को बदलना बहुत असंभव है। असल में बूढ़े का मतलब ही यह है कि जो बदलने की सीमा के पार चला गया, जिसको अब नहीं बदला जा सकता। इसलिए बूढ़े को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई भी मार्ग नहीं होता। सुसंस्कृत कौम उसे कहा जाता है, जो इस सत्य को स्वीकार करके अपने बूढ़ों के प्रति उनकी इस असमर्थता को जान कर भी सदभाव रख पाती है वह सुसंस्कृत कौम है। सुसंस्कृति का एक ही अर्थ है कि हम स्थितियों को देख कर उनकी फैक्टिसिटी को, उनके तथ्यों को समझ कर वैसा जीने की कोशिश करें।
लेकिन सारे बच्चे अपने मां-बाप के प्रति क्रोध से भरे हुए हैं। एंग्री जेनरेशन, हम कह रहे हैं, क्रोध से भरी हुई पीढ़ी है। सब बच्चे अपने मां-बाप के प्रति क्रोध से भरे हुए हैं। विद्यार्थी शिक्षक के प्रति क्रोध से भरे हुए हैं। छोटे भाई बड़े भाई के प्रति क्रोध से भरे हुए हैं। यह क्रोध बहुत असंगत है, अमानवीय है, इनह्यूमन है, असंस्कृत है, अनकल्चर्ड है। और यह क्रोध जवान आदमी के योग्य, शोभा के योग्य नहीं है। यह बताता है कि जवान आदमी नहीं समझ पा रहा कि बुढ़ापे की अपनी परेशानियां हैं, अपनी मजबूरियां हैं। अगर जवान को यह साफ दिखाई पड़ जाए तो बुढ़ापा दया योग्य मालूम पड़ेगा। और यह भी उसे ख्याल रखना चाहिए कि वह भी रोज बूढ़ा होता जा रहा है। और कल इसी दया की अपेक्षा उसे दूसरी पीढ़ी से हो जाएगी।
दूसरी बात ख्याल रखनी जरूरी है कि जवान को ही हाथ बढ़ाना पड़ेगा। अभी उसके हाथ बढ़ने योग्य हैं, बड़े हो सकते हैं, अभी ठहर नहीं गए। और जवान को ही समझदारी दिखानी पड़ेगी, क्योंकि उसकी समझ लोचपूर्ण है, फ्लेक्जिबल है, अभी वह बदल सकती है और नई हो सकती है। और ध्यान रहे कि बूढ़े ने जो भी जाना है, बूढ़े ने जो भी जीआ है, अतीत की पीढ़ी ने जो भी अनुभव किया है, वह अगर जवान उसे समझ ले तो निश्चित ही उसे उसके जिंदगी में रिचनेस और समृद्धि में बढ़ावा मिलेगा। अगर वह उसे नासमझी से तोड़ दे तो हो सकता है उसकी जिंदगी की जड़ें कट जाएं, वह अपरूटेड हो जाए और भविष्य में फूल आने असंभव हो जाएं।
क्रमशः……10
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3



