ग्रीन सिटी या सूखे गमलों का मॉडल? भिलाई-चरौदा निगम के दावों की पोल खोल रही निगम परिसर की बदहाली

 ग्रीन सिटी या सूखे गमलों का मॉडल? भिलाई-चरौदा निगम के दावों की पोल खोल रही निगम परिसर की बदहाली

स्वच्छता सर्वेक्षण में कई बार अवॉर्ड लेने वाला निगम अपने ही दफ्तर की हरियाली नहीं बचा पाया, जनता पूछ रही — लाखों खर्च हुए तो गए कहां?

भिलाई-3। शहर को “ग्रीन सिटी, क्लीन सिटी” बनाने के बड़े-बड़े दावे करने वाला भिलाई-चरौदा नगर निगम इन दिनों अपने ही परिसर की बदहाल तस्वीरों से कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। करोड़ों के विकास, हरियाली अभियान और स्वच्छता मॉडल का ढिंढोरा पीटने वाले निगम कार्यालय के बाहर जब लोग सूखे पौधे, टूटे गमले और जर्जर जालियां देखते हैं, तो उनके मन में सिर्फ एक ही सवाल उठता है — आखिर जनता के टैक्स का पैसा खर्च कहां हो रहा है?नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक जनता को पर्यावरण बचाने, पौधे लगाने और उन्हें संरक्षित करने की नसीहत देते नहीं थकते। लेकिन निगम परिसर की हालत देखकर ऐसा लगता है मानो ये सारे नियम सिर्फ आम नागरिकों के लिए बनाए गए हों। निगम कार्यालय में रखे गमलों में पौधे सूख चुके हैं, कई जगह जालियां टूटी हुई हैं और मुख्य द्वार की स्थिति खुद निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है।सबसे हैरानी की बात यह है कि यही निगम स्वच्छता सर्वेक्षण में कई बार अवॉर्ड हासिल कर चुका है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिर्फ कागजों, फोटोशूट और प्रचार से शहर “क्लीन” घोषित हो जाता है? अगर निगम अपने मुख्यालय की साफ-सफाई और हरियाली नहीं संभाल पा रहा, तो पूरे शहर के हालात कितने “ग्रीन” होंगे, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि निगम प्रशासन का पूरा ध्यान जमीनी काम से ज्यादा दिखावे पर रहता है। अभियान चलाए जाते हैं, बैनर लगाए जाते हैं, प्रेस नोट जारी होते हैं, लेकिन धरातल पर तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है। जनता का आरोप है कि हरियाली और सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन परिणाम सिर्फ सूखे पौधों और बदहाल व्यवस्था के रूप में सामने आता है।

व्यंग्य यह भी है कि जिस निगम कार्यालय से पूरे शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने की योजना तैयार होती है, वहीं की हालत खुद “देखरेख” मांग रही है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे “ग्रीन सिटी” का सपना सिर्फ फाइलों और भाषणों में ही हरा-भरा है, जबकि जमीन पर पौधों के साथ उम्मीदें भी सूख चुकी हैं।

अब शहरवासी पूछ रहे हैं कि आखिर निगम प्रशासन जवाबदेही कब तय करेगा? क्या सिर्फ अवॉर्ड और सर्वेक्षण के प्रमाण पत्र ही विकास का पैमाना रह गए हैं, या फिर कभी असली तस्वीर पर भी ध्यान दिया जाएगा? फिलहाल निगम परिसर की यह हालत साफ बता रही है कि “ग्रीन सिटी, क्लीन सिटी” का नारा जितना चमकदार पोस्टरों में दिखता है, हकीकत में उतना ही फीका नजर आ रहा है।