भिलाई-चरोदा में विकास कम, “ठेका ट्रांसफर उद्योग” ज्यादा! जनप्रतिनिधि बने ठेकेदार या नगर विकास के सौदागर?

 भिलाई-चरोदा में विकास कम, “ठेका ट्रांसफर उद्योग” ज्यादा! जनप्रतिनिधि बने ठेकेदार या नगर विकास के सौदागर?

भिलाई-चरोदा नगर निगम में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा चर्चा “ठेका मॉडल” की हो रही है। नगर की गलियों, सड़कों और निर्माण कार्यों से ज्यादा लोगों की जुबान पर यह सवाल है कि आखिर नगर का विकास होगा कैसे, जब जिम्मेदार जनप्रतिनिधि ही विकास कार्यों को व्यवसाय बनाकर बैठे हों।

सूत्रों की मानें तो नगर निगम में कई ऐसे जनप्रतिनिधियों के नाम सामने आ रहे हैं, जो सीधे तौर पर ठेके लेने के खेल में सक्रिय बताए जा रहे हैं। आरोप यह भी है कि अपने नाम से ठेका लेने के बाद वही काम दूसरे ठेकेदारों को मोटी रकम लेकर “बेच” दिया जाता है। यानी विकास कार्य कम और कमीशन का गणित ज्यादा दिखाई दे रहा है।

नगर में चर्चा है कि अब विकास कार्यों की गुणवत्ता इंजीनियर नहीं, बल्कि कमीशन प्रतिशत तय कर रहा है।

विडंबना देखिए, मंचों पर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं — “नगर को स्मार्ट बनाएंगे”, “सड़कों का जाल बिछाएंगे”, “जनता को बेहतर सुविधाएं देंगे”। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही गुणवत्ता पर सवाल खड़े होने लगते हैं। कहीं सड़क कुछ महीनों में उखड़ जाती है तो कहीं नाली निर्माण अधूरा छोड़ दिया जाता है।

नगरवासियों का कहना है कि जब ठेका लेने वाला व्यक्ति खुद मौके पर काम कराने की बजाय दूसरे को बेच देगा, तो गुणवत्ता की उम्मीद आखिर किससे की जाए? हर स्तर पर कमीशन और हिस्सेदारी तय होगी तो विकास कार्यों का हाल क्या होगा, यह किसी से छिपा नहीं है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर विकास के नाम पर राजनीति तो खूब हो रही है, लेकिन वास्तविक विकास पीछे छूटता जा रहा है। जनता टैक्स दे रही है, लेकिन बदले में उन्हें धूल भरी सड़कें, अधूरे निर्माण और भ्रष्टाचार की चर्चाएं मिल रही हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधियों का काम जनता की आवाज बनना है या फिर ठेका कारोबार चलाना? यदि नगर की जिम्मेदारी संभालने वाले लोग ही निजी लाभ के खेल में उतर जाएं, तो फिर प्रशासनिक पारदर्शिता और विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

भिलाई-चरोदा की जनता अब यह पूछने लगी है कि नगर निगम विकास का केंद्र बनेगा या फिर “ठेका एक्सचेंज बाजार”? क्योंकि नगर की तस्वीर देखकर फिलहाल यही लगता है कि यहां विकास की गाड़ी कम और कमीशन का पहिया ज्यादा तेज घूम रहा है।

अब देखने वाली बात होगी कि प्रशासन इन चर्चाओं और आरोपों को गंभीरता से लेकर जांच की दिशा में कदम बढ़ाता है या फिर नगर विकास के नाम पर यही खेल आगे भी चलता रहेगा।