“तीन राज्यों में जीत, कुम्हारी में ‘महाविकास’ का जश्न—जमीन गायब, ढोल-नगाड़े हाज़िर!”

 “तीन राज्यों में जीत, कुम्हारी में ‘महाविकास’ का जश्न—जमीन गायब, ढोल-नगाड़े हाज़िर!”

कुम्हारी/ तीन राज्यों में भाजपा की जीत का जश्न कुम्हारी में इस अंदाज़ में मनाया गया मानो चुनाव परिणाम सीधे इसी नगर की गलियों से निकलकर गए हों। ढोल-नगाड़ों की गूंज, सड़कों पर नाचते-गाते कार्यकर्ता और गगनभेदी जयकारों के बीच ऐसा माहौल बना दिया गया, जैसे कुम्हारी ने ही चुनावी इतिहास लिख दिया हो।

जश्न का जोश इतना था कि हकीकत कहीं पीछे छूटती नजर आई। नगर की आम जनता यह नज़ारा देखकर हैरान भी थी और मनोरंजन भी ले रही थी। कई लोगों के चेहरे पर साफ सवाल था—“ये जीत तीन राज्यों में हुई है या कुम्हारी में?” लेकिन सवाल पूछने वालों की आवाज़ ढोल की थाप में दबती चली गई।

कुछ स्थानीय लोगों ने चुटकी लेते हुए कहा, “लगता है कुम्हारी के विकास मॉडल ने इतना कमाल कर दिया कि तीनों राज्यों के मतदाता भी प्रभावित हो गए!” व्यंग्य में कही गई यह बात दरअसल उस सच्चाई की ओर इशारा करती है, जिसे जश्न के शोर में दबाने की कोशिश की जा रही है।

हकीकत यह है कि जिस “चहुमुखी विकास” का श्रेय लेकर जश्न मनाया जा रहा है, उसी कुम्हारी में आम नागरिक आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। कहीं सड़कें अधूरी हैं, तो कहीं पानी और सफाई की समस्या लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बनी हुई है। लेकिन इन मुद्दों पर बात करने के बजाय ढोल-नगाड़ों की आवाज़ ज्यादा तेज़ सुनाई देती है।

जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जहां एक तरफ जनता सुविधाओं के लिए जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि जश्न में डूबे नजर आते हैं। मानो विकास का काम पूरा हो चुका हो और अब सिर्फ जश्न बाकी हो।

लोकतंत्र में जीत का जश्न मनाना गलत नहीं, लेकिन जब जश्न हकीकत से बड़ा दिखने लगे, तो वह सवालों को जन्म देता है। कुम्हारी में भी यही हो रहा है—जमीन पर समस्याएं जस की तस हैं और ऊपर से जश्न का रंग इतना गाढ़ा कि सच्चाई दिखाई ही नहीं दे रही।

अब देखने वाली बात यह होगी कि ढोल-नगाड़ों की यह गूंज कब तक चलती है और क्या कभी यह आवाज़ उन समस्याओं तक भी पहुंचेगी, जिनसे कुम्हारी की आम जनता रोज दो-चार हो रही है। या फिर “विकास” सिर्फ नारों और जश्न तक ही सीमित रह जाएगा।