भिलाई-3 में ‘विरोध’ या ‘औपचारिकता’? पूर्व मुख्यमंत्री भुपेश बघेल के समर्थन में जुटी भीड़ ने खड़े किए सवाल
AI वीडियो विवाद पर कांग्रेस का प्रदर्शन, लेकिन गिनती के कार्यकर्ता ही पहुंचे थाने
भिलाई। सोशल मीडिया पर वायरल कथित एआई वीडियो को लेकर छत्तीसगढ़ की राजनीति गरमाई हुई है, लेकिन इस मुद्दे पर कांग्रेस का जमीनी जोश उतना गर्म नजर नहीं आया। पूर्व मुख्यमंत्री
Bhupesh Baghel और उनकी पूर्व उप सचिव Soumya Chaurasia को आपत्तिजनक तरीके से दिखाए जाने के विरोध में सोमवार को पुरानी भिलाई थाने में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन जरूर किया, मगर भीड़ की संख्या चर्चा का विषय बन गई।
गिने-चुने चेहरों में सिमटा विरोध
विरोध प्रदर्शन में Shrikant Verma के साथ मनोज मढ़रिया, संतोष तिवारी, मोहन साहू, गोपेंद्र चंद्राकर, संदीप सिंह, हरमिक सिंह, युवराज कश्यप, राम सूर्यवंशी, जवाहर यादव, विनोद कुमार और सुप्रिय टेमुलकर जैसे कुछ परिचित चेहरे जरूर दिखे। लेकिन “भीड़” शब्द का इस्तेमाल यहां थोड़ा उदार माना जाएगा।
स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि जिस मुद्दे को लेकर पार्टी इतना आक्रामक रुख दिखा रही है, उसी मुद्दे पर ज़मीन पर समर्थन इतना सीमित क्यों दिखा। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह विरोध सिर्फ औपचारिकता भर था या संगठन की वास्तविक स्थिति की झलक?
चुनाव से पहले संकेत?
मामला इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है क्योंकि भिलाई-चरोदा नगर निगम के 40 वार्डों का पार्षद चुनाव एवं महापौर का चुनाव इसी साल दिसंबर में संभावित है। यही नहीं,
Bhupesh Baghel का निवास भी इसी क्षेत्र में आता है। ऐसे में यह प्रदर्शन सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि संगठन की ताकत का ‘टेस्ट’ भी माना जा रहा था।
लेकिन नतीजा उम्मीदों के उलट रहा। जिस मुद्दे को लेकर पार्टी को व्यापक समर्थन जुटाना चाहिए था, वहां सीमित उपस्थिति ने कई तरह के राजनीतिक संदेश दे दिए। विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोग तंज कसते नजर आए—“इतना ही गुस्सा था तो भीड़ कहां थी?”
सोशल मीडिया बनाम जमीनी हकीकत
दिलचस्प बात यह है कि जिस एआई वीडियो को लेकर इतना बवाल मचा, वही लड़ाई फिलहाल सोशल मीडिया पर ज्यादा मजबूत दिख रही है, जबकि जमीनी स्तर पर उसकी गूंज अपेक्षाकृत कम नजर आ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक कमजोरी या कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता का संकेत भी हो सकती है। वहीं विरोधियों को बैठे-बिठाए एक नया मुद्दा मिल गया है।
निष्कर्ष: संदेश स्पष्ट है?
भिलाई के इस छोटे से विरोध ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या कांग्रेस के पास मुद्दे तो हैं, लेकिन उन्हें लेकर मैदान में उतरने वाले लोग कम पड़ रहे हैं? या फिर कार्यकर्ताओं का उत्साह अब पहले जैसा नहीं रहा?
जो भी हो, दिसंबर के चुनाव से पहले यह ‘कम भीड़ वाला विरोध’ राजनीतिक गलियारों में लंबी चर्चा का कारण जरूर बन गया है।

