छत्तीसगढ़ में बड़ा फैसला: जशपुर में 114 एकड़ आदिवासी जमीन लौटाने का आदेश

  • जशपुर जिले से एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सामने आया है।
  • कलेक्टर कोर्ट ने आदिवासी भूमि संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा आदेश जारी किया है।

क्या है पूरा मामला?

कलेक्टर रोहित व्यास ने पहाड़ी कोरवा आदिवासियों की अपील पर सुनवाई करते हुए वर्ष 1955 से 1966 के बीच हुए जमीन सौदों को अवैध घोषित कर दिया। यह जमीन मतांतरित व्यक्तियों द्वारा खरीदी गई थी। जांच में पाया गया कि ये सौदे नियमों के विपरीत थे, जिसके बाद कोर्ट ने करीब 114 एकड़ जमीन को निरस्त कर
उसे मूल आदिवासी मालिकों को वापस लौटाने का आदेश दिया।

धारा 170-ख: आदिवासी जमीन का सुरक्षा कवच

यह फैसला छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता की धारा 170-ख के तहत दिया गया है। यह प्रावधान आदिवासी जमीन को गैर-आदिवासियों द्वारा अवैध रूप से कब्जा करने से रोकने के लिए बनाया गया है।

इस कानून के अनुसार:

  • कोई भी गैर-आदिवासी व्यक्ति आदिवासी जमीन नहीं खरीद सकता बिना अनुमति के
  • खरीद करने वाले को यह साबित करना होता है कि सौदा पूरी तरह वैध था
  • कलेक्टर की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है

मतांतरित भी होंगे गैर-आदिवासी की श्रेणी में

इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि अब
मतांतरित व्यक्तियों को भी गैर-आदिवासी माना जाएगा।
यानी वे भी आदिवासी जमीन खरीदने के नियमों के तहत ही आएंगे।

अन्य मामलों पर भी असर

इस फैसले का असर भविष्य में चल रहे अन्य मामलों पर भी पड़ सकता है। राज्य में ऐसे कई केस लंबित हैं, जिनमें अलग-अलग समुदायों द्वारा आदिवासी जमीन खरीदी गई है।

क्यों माना जा रहा है ऐतिहासिक फैसला?

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:

  • आदिवासी जमीन की सुरक्षा को मजबूत करता है
  • पुराने अवैध सौदों की समीक्षा का रास्ता खोलता है
  • कानून के दायरे को स्पष्ट और व्यापक बनाता है

विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आने वाले समय में आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत उदाहरण बन सकता है।