“तीन हजार वर्षों का स्वप्न-शून्य भारत: जब राष्ट्र ने जीने के सपने छोड़ दिए”, “क्या भारत जीवन-विरोधी बन गया है? मोक्ष की चाह में सपनों की हत्या” _ओशो
ओशो- भारत के मन में हमें अभीप्सा जगाने की जरूरत है। कोई हमने ढाई-तीन हजार वर्ष से सपने नहीं देखे। कोई बड़ा सपना नहीं देखा सिवाय मरने के और मोक्ष जाने के, जो कि कोई सपना नहीं है। हमने तीन हजार वर्ष में ऐसा कोई सपना नहीं देखा जिसको पूरा करने में हमारी शक्तियों की भी पुकार आए। जिसको पूरा करने के लिए हमारा युवक डूबे, जिसको पूरा करने के लिए युवक की जवानी रस ले। हमने कोई सपना नहीं देखा। हम स्वप्न-न्यून कौम हैं। अगर हम पूरा अपने इतिहास को देखें तो हम बड़े हैरान होंगे कि हम अकेली कौम हैं इस पृथ्वी पर जिसके पास कोई उटोपिया और कोई बड़े सपने नहीं हैं। जरूरी नहीं है कि वे सपने पूरे होने वाले हैं। सच तो यह है कि सपने ऐसे चाहिए जो कभी पूरे होने वाले न हों। जो हमें रोज बुलाते रहें और हम रोज बढ़ते रहें और कभी पूरे भी न हों।
हमने जो सपना देखा है वह है सुसाइडल। हमारा सपना जो है वह मरने का है। और मरना भी हम साधारण मरने से तृप्त नहीं हैं, हम कहते हैं हमें इस भांति मरना है कि फिर हम जन्म न सकें। हम असल में एब्सोल्यूट डेथ के आकांक्षी हैं। साधारण मृत्यु से राजी नहीं हैं। या तो पृथ्वी सिंह मरते हों, तो वह साधारण मृत्यु से राजी नहीं हैं, वे कहते हैं–फिर कहीं जन्म न हो। उनकी आकांक्षा ऐसी है कि मरें तो ऐसे मरें कि फिर जन्म ही न हो। तो हम एकदम जन्म-विरोधी, जीवन-विरोधी हैं। आत्मघाती हमारा चित्त है। निश्चित ही हमें कुछ आत्मघाती लोगों ने प्रभावित किया है। कुछ सुसाइडल माइंड्स हमारी छाती पर सवार हो गए हैं और उन्होंने हमारा पूरा का पूरा देश का मानस एक दिशा में मोड़ दिया है।
और सच यह है कि देश के पास बहुत मानस नहीं होता। दस-पांच लोग उसे चलाते हैं। अगर कहीं हमारे ऊपर ऐसे लोग हावी हो जाएं, जो आत्मघाती हों, और मरने की आकांक्षा रखते हों, तो वे हम सबको मरने की दिशा में मोड़ देंगे। तो हमें अब इस देश में ऐसे व्यक्ति चाहिए, बहुत ज्यादा नहीं थोड़े से ही चाहिए, जो जीवन के आकांक्षी हों, जिनके जीवन की आकांक्षा प्रबल और अदम्य हो और जो यह कहने को इनकार करते हों कि हम मरने वाला मोक्ष नहीं चाहते हैं, हम ऐसा मोक्ष चाहते हैं जो परम जीवन हो। हम जन्मों से नहीं डरते हैं, हम ऐसा जन्म चाहते हैं कि उसके बाद मौत ही न हो।
अगर हम यह जीवन के अभियान की कल्पना और यह सपना भारत को दे सकें तो हमारे भीतर की सब अवरुद्ध शक्तियां आज जग सकती हैं। मर नहीं जाती हैं, सिर्फ अवरुद्ध होती हैं और कई बार ऐसा होता है कि अगर भीतर शक्तियां अवरुद्ध हो जाएं, तो उनका अवरुद्ध होना बड़ी बेचैनी पैदा करता है। मार्ग मिलता नहीं और बेचैनी पैदा होती है। यह जो आज जैसा हमें दिखाई पड़ रहा है, यह आजादी भी एक नकारात्मक आजादी है।
अब मैं इधर देखता हूं कि अगर विस्तारवादी हमारा मुल्क होता, तो आजादी पाजिटिव होती, विधायक होती। संकोचवादी मन है इसलिए आजादी नकारात्मक है। हम सिकुड़ गए, पड़ोसी हमारे ऊपर कब्जा कर लिए। अब ज्यादा से ज्यादा हमारी आजादी का कुल मतलब इतना है कि कृपा करके हम पर कब्जा छोड़ो। यह नकारात्मक भाव है आजादी का। यह आजादी का इतना ही भाव है कि कृपा करके हमें गुलाम मत बनाओ। लेकिन जो गुलाम नहीं है, जरूरी रूप से आजाद नहीं हो जाता। गुलाम होना एक स्थिति है, आजाद होना बिलकुल दूसरी स्थिति है। गुलाम न होना सिर्फ बीच की कड़ी है। जैसे हम गुलामी से आजादी में यात्रा करते हैं। तो अभी भारत गुलाम न होना बिलकुल बेमानी है। या तो हम आजाद बनें और या हम गुलाम हो जाएं, वे दोनों चैन की अवस्थाएं हैं। क्योंकि उनकी एक स्थिति है। गुलाम न होना सिर्फ एक सेतु है जिससे हमें आजादी को पहुंचना चाहिए।
लेकिन आजादी का हम करेंगे क्या? आजादी का करने का एक ही अर्थ हो सकता है कि हमारे पास कोई सपने हों जिनको हम पूरा करना चाहें तो आजादी का कोई मतलब है। हमारे पास कोई सपने न हों, हमारे पास सिर्फ एक भाव था, जो किसी भांति ऊपर जो बैठा है, वह नीचे उतर जाए। वह नीचे उतर गया है। अब हम बड़ी दिक्कत में पड़ गए हैं। हमारे पास एक काम भी था, वह भी खत्म हो गया कि किसी को नीचे उतारना था, वह भी नीचे उतर गया। और हमें बड़ी दिक्कत में छोड़ गया है। और ऐसे असमय में उतर गया है जब हमें आशा भी नहीं थी कि उतरेगा। हम बड़े भरोसे में जी रहे थे कि अभी नहीं उतरेगा। आजादी की लड़ाई हम जारी रखेंगे। वह अचानक गर्दन से उतर गया, अब हमारे पास कोई लड़ाई भी नहीं है, कोई काम भी नहीं है।
अब हम बड़ी बेचैनी में पड़ गए हैं। अब हमें ऐसा लगता है कि अब हम क्या करें। भारत के सामने बड़े से बड़ा मनस में सवाल है कि क्या करें, वाॅट टु डू? और जो भी करना है, वह सदा विस्तारवादी होता है। उसमें किसी तरह का विस्तार चाहिए, तो हम दरिद्रता को वरण किए बैठे हैं। हम दरिद्र को कहते हैं, तुम नारायण हो–दरिद्रनारायण, हम तुम्हारी पूजा करेंगे। हम जो आदमी सड़क पर नंगा खड़ा हो जाता है, उसके जाकर पैर छुएंगे। जो आदमी ढंग के कपड़े पहने है वह हमें पापी मालूम पड़ेगा कि भोगी है, कपड़े ठीक से पहने हुए है, आराम से बैठा है। कष्ट झेले, कांटे बिछा कर सड़क पर बैठ जाए, तो महात्मा हो जाए।
यह जो हमारे चित्त की अवस्था है, तो सारे मुल्क को जब तक कांटे पर लिटा दे, तब तक हमारा मन भर नहीं सकता। जब तक सारा मुल्क नंगा न हो जाए और जब तक सारा मुल्क भीख न मांगे तब तक हम तृप्त न होंगे। वह हमारा अंतिम लक्ष्य मालूम होगा। यह हो नहीं सकता, क्योंकि मनुष्य की सहज व्यवस्था के प्रतिकूल है। और कुछ लोग मैसोचिस्ट थे। कुछ लोगों को खुद को कष्ट देने में भी रस आता है। वे उससे बड़े मजे में आनंद में आ जाएंगे। वे कांटे बिछा कर लेटे हैं। वे सिर के बल खड़े होकर शीर्षासन कर रहे हैं। हम भी बड़े प्रसन्न होंगे। और हम कहेंगे कोई बात में आगे हमसे नहीं हो सकता, लेकिन तुम कर रहे हो, तो कम से कम तुम एक आदर्श तो हो।
हमें ये सब आदतें गिरानी पड़ें और जिंदगी की जो सहजता है…इधर मैं इतना हैरान होता हूं कि कई बार ऐसी कठिनाई हो जाती है कि अगर हजारों साल तक हमने अगर कोई सहज बात को इनकार किया हो, तो हम भूल ही जाते हैं कि वह सहज है। जिंदगी की जो सहजता है वह हमें अंगीकार कर लेनी पड़ेगी। और हमारा युवक तत्काल अनुशासन में आ जाए, अगर हम सहज जीवन को स्वीकार कर लें। अगर मुल्क सपने पैदा कर सके, तो युवक अभी प्रतिबद्ध हो जाए। हम सपने के लिए कमिट कर सकें, कि हम अपने को लगा सकें। लेकिन कोई सपना नहीं है। और हम जो बातें करते हैं वे सीधी और बचकानी हैं, और हम जो आदर्श रखते हैं वह ऐसे ही कि वह बेमानी है।
हम कभी कहते हैं कि पंचवर्षीय योजना पूरी करो, जो कि कोई बड़ा सपना नहीं है। युवक के पास बड़े सपने देखने की आकांक्षा है। हम कहते हैं कि पंचवर्षीय योजना पूरी करो। उसके पास बड़ी कामनाएं हैं कि उसका मन भरे, हम उसको ऐसी क्षुद्र कामनाएं बताते हैं कि वह उसको छोड़ ही देता है कि कुछ मतलब की नहीं हैं। क्रमशः….



