“ठहरना नहीं, फैलना जीवन है: संकोच ने भारत को कमजोर किया” – ओशो
ओशो- एडिंग्टन ने एक बात लिखी है कि मनुष्य की भाषा में ‘रेस्ट’…जो सत्य है वह जीवन में उसका पर्याय कहीं भी नहीं है। रेस्ट शब्द बिलकुल झूठा है। विश्राम में कोई भी चीज नहीं है। या तो आगे जा रही है, या पीछे जा रही है। ठहरी हुई कोई भी चीज नहीं है, खड़ी हुई कोई भी चीज नहीं है। या तो वृक्ष जवान हो रहा है या बूढ़ा हो रहा है। या तो आप ठहर गए हैं या सिकुड़ने लगे हैं। या तो आप जी रहे हैं या मरने लगे हैं। इन दोनों के बीच में ऐसी कोई जगह नहीं है कि एक आदमी कहे कि मैं जी तो रहा हूं, लेकिन आगे जीवन में नहीं बढ़ रहा हूं, मैं ठहर गया हूं। तो उसे पता नहीं, उसने मरना शुरू कर दिया। या तो आप पहाड़ पर चढ़ गए हैं, या नीचे उतर गए हैं।
इस देश के साथ क्या कठिनाई हो गई कि जीवन की जो सारी सहज बातें हैं वे सब हमें निंदित करते हैं। जैसे विस्तार है, वह हमारे लिए निंदित हो गया है। हमने अनेक नामों से उसकी निंदा की और संकोच को अनेक नामों से प्रशंसित किया। अब एक आदमी धन बढ़ा रहा है, तो हमने उसकी निंदा की। हमने कहा कि वह परिग्रही है। एक आदमी अगर शक्ति बढ़ा रहा है; एक आदमी अगर सौंदर्य बढ़ा रहा है, एक आदमी अगर योजनाएं बना रहा है विस्तार की तो हम सबकी निंदा करते हैं। हमने उन आदमियों की प्रशंसा की, जो सब तरफ से संकोच करता है, सिकोड़ रहा है अपने को।
तो हमारा चरित्र जो है, वह संकोचवान है, विस्तारवान नहीं है। और जीवन जो है, विस्तार को मानता है, वह संकोच को नहीं मानता है। और जिस दिन हमने यह तय कर लिया है कि हमें सिकुड़ना है उस दिन हमारे पांव ने स्वभावतः तय किया है, हमको फैलना नहीं है, हमको ठहरना है। कोई कठिनाई नहीं है कि मैंने अपने घर को छोटा करना चाहा, पड़ोसी के घर ने अपने घर को बड़ा करना चाहा। फिर हम गुलाम हुए। इस गुलामी का सारा जिम्मा पड़ोसी पर नहीं है, हमारे संकोच की धारणा पर है। और हमारे सारे महात्मा आज भी और अनंत काल से हमको संतोष सिखा रहे हैं। वे कहते हैं सिकुड़ जाओ। उस दिन तक सिकुड़ते जाओ, जिसके आगे सिकुड़ने की जगह न रह जाए। तो हम जगह नहीं देते हैं, उस जगह में सब भर जाता है।
हिंदुस्तान में बुद्ध और महावीर के बाद भयंकर संकोच पैदा हुआ। हिंदुस्तान के मानस में बुद्ध और महावीर के बाद उतना संकोच पैदा हुआ कि उस संकोच की वजह से हिंदुस्तान में सब तरह के आक्रमण आमंत्रित हुए। मेरा मानना यह है कि हमारे सब आक्रमण आमंत्रित हैं। यानी मैं ऐसा कहता हूं कि हम आक्रमण करने ही नहीं जाते, अगर हम न करें तो हम बुलाते हैं। इन दोनों के बीच जगह नहीं है। या तो हम आक्रमण करने जाएंगे, या हम किसी आक्रामक को बुलाएंगे। और बड़े मजे की बात यह है कि जिसकी आप बात करते हैं, अनुशासन और डिसिप्लिन की, वह संकोच की कौम में कभी नहीं होता। उसकी जरूरत नहीं होती। वह विस्तारशील जाति का लक्षण है अनुशासन का, क्योंकि विस्तार के लिए अनुशासन जरूरी है। बिना अनुशासन के विस्तार नहीं किया जा सकता।
इसलिए बहुत बार ऐसा हो जाता है कि ज्यादा श्रेष्ठ संस्कृति कभी अपने से निकृष्ट संस्कृति के सामने झुक जाती है, अगर वह विस्तारवादी नहीं है। और सदा ऐसा हुआ है–चंगीज या तैमूर या हिंदुस्तान में आए हुए सब आक्रामक चाहे वे हूण हों, चाहे वे मुगल हों, चाहे तुर्क हों, कोई भी हों जो भी हिंदुस्तान आए, हिंदुस्तान की संस्कृति के मुकाबले वे सब पिछड़ी हुई कौमें थीं। लेकिन एक मामले में हम मुश्किल में पड़ गए। वे आक्रामक थे और डिसिप्लिनड थे। हम अनाक्रामक थे, अनाक्रामक को डिसिप्लिन की कोई जरूरत न थी। अब हमें आक्रमण करने नहीं जाना है, तो हम दंड-बैठक नहीं लगाते हैं। जब आप मुझ पर आक्रमण करते हैं तब मैं लगाना शुरू करता हूं। या वैसे ही है जैसे कि आग लग जाए, तब हम कुआं खोदने लगते हैं। कुआं जब तक खुदता है तब तक मकान जल जाता है। लेकिन आग लगाने निकलेंगे तो आग से जलने का डर सदा ही है। जैसे कि तैमूर और चंगीज एकदम अशिक्षित, एकदम बर्बर और जंगली। साधन भी उनके पास बहुत नहीं हैं, लेकिन फिर भी एक अदम्य अभीप्सा फैल जाती, तो उन्होंने यूनान तक हिला दिया और इधर चीन के कोने तक हिला दिया। पूरा एशिया और यूरोप–थोड़े से टुकड़ों ने, एक-एक ईंट बजा दी, रोम से लेकर और पेकिंग तक सबको हिला दिया एक दफा। और जो कि बड़े गिने थे, उनको, जिनके जमाने की दो लंबी पुरानी कहानी हैं और जिनको संदेह मिट गया था कि हम कभी हराए जा सकते हैं–उनको बड़ी छोटी कौमों ने, बड़ी खानाबदोश कौमों ने, जिनके पास कोई बहुत सामथ्र्य न थी, लेकिन उनके सामने विस्तार की अभीप्सा थी।
और विस्तार की अभीप्सा के पीछे अनुशासन आता है। सिर्फ रक्षा की अभीप्सा से अनुशासन नहीं आता है। तो मेरी अपनी समझ यह है कि आप सिर्फ अनुशासन का गुणगान करें, तो आप अनुशासन पैदा नहीं करवा सकते हैं। अनुशासन का भी अपना अनुशासन है। अनुशासन का अपना मेथड है जाने का। वह आता ही तब है, जब कोई विस्तारशील भावना काम करती है, जब हम फैल जाना चाहते हैं।
अब जैसे, आज अमरीका में या रूस में समय का एक अनुशासन पैदा होगा, जो उन दो मुल्कों के सिवाय कहीं भी पैदा नहीं होगा। क्योंकि उन्होंने अंतरिक्ष का विस्तार शुरू किया। अभी तक जो समय का अनुशासन था, वह घंटों में चल सकता था, मिनटों में चल सकता था। अब जो समय का अनुशासन है वह सेकेंड के और क्षण के भी हजारवें हिस्से में चलाना होगा। क्योंकि अब अंतरिक्ष की यात्रा जो है उसमें एक सेकेंड भूल-चूक हो जाने से हमारा यात्री सदा को मुक्त हो जाएगा। तब अमरीका एक ऐसी टाइम डिसिप्लिन को उपलब्ध हो जाएगा, जिसकी हमें कल्पना नहीं हो सकती।
असल में बैलगाड़ी में जो चल रहा है, उसके टाइम का अनुशासन अलग होगा। और राकेट में जो चल रहा है, उसके टाइम का अनुशासन अलग होगा। बैलगाड़ी में चलने वाली कौम से हम कहें कि तुम समय से आ जाओ, तो हम बात गलत कहते हैं। हम उससे कहें, तुम ठीक छह बजे आ जाना
तो इसका कोई मतलब नहीं होता। बैलगाड़ी में तीन होता है समय–सुबह, दोपहर, शाम। वह छह-छह घंटे की होती है। इनका जो विस्तार है–एक आदमी कहता है, हम सांझ आ जाएंगे सूरज ढलने पर। सूरज ढलने पर आ सकता है, सूरज ढलने के घंटे भर पहले आ सकता है, सूरज ढलने के चार घंटे बाद आ सकता है। अभी सांझ ही चली है, क्योंकि बैलगाड़ी भरोसा योग्य ही नहीं है। बैलगाड़ी का अपना समय है।
पैदल चलने वाले आदमी के समय में घंटे नहीं होते हैं, दिन होते हैं। लेकिन अब, जब हम अंतरिक्ष की यात्रा पर निकलेंगे, तो सेकेंड के हजारवें हिस्से पर एक्युरेसी चाहिए। अब चांद का विस्तार अमरीका के मन में टाइम का जो बोध देगा, वह हमारे मन में नहीं हो सकता है। अमरीकी सैनिक के मन में, अमरीकी युवक के मन में जिस नई यात्रा के अभियान पर निकला है वह सारी दुनिया को पिछाड़ देगा समय के मामले में। उसके बराबर समय की सचाई किसी में नहीं रह जाएगी। लेकिन, यह आती है एक दूसरी व्यवस्था से। वह फैल रहा है, पृथ्वी को छोड़ कर बाहर जा रहा है। असल बात यह है कि अब पृथ्वी आक्रमण के लिए बहुत छोटी पड़ गई है। अब जो आक्रमणवान है, अब उनके लिए पृथ्वी बहुत छोटी है। वह एक दुर्बल विलेज से ज्यादा नहीं है, एक बड़ा गांव है जो जमीन पर फैला हुआ है। अब जो वृहत आकांक्षा है, वे चांद-तारे और मंगल और दूर के तारों पर बस्तियां बसाएंगे।
तो मेरी अपनी समझ यह है कि भारत को विस्तारवादी, अब यह शब्द बड़ा खराब मालूम पड़ता है और हमारे हजारों साल की निंदा में उसको बड़ा गंदा कर दिया है। इसके मानस में विस्तार चाहिए, वह विस्तार बहुआयामी होगा। धन का भी हो, यश का भी हो, ज्ञान का भी हो, यात्रा का भी हो, अभियान का भी हो, एडवेंचर का भी हो, वह समस्त दिशाओं में विस्तारवादी हो। तो भारत के युवक की जो पीड़ा है, वह पीड़ा यही है कि युवक होता है विस्तारवादी और भारत का मन है संकोचवादी। भारत का मन है बूढ़े का और उसमें भारत के युवक के लिए भारत के मन के साथ बड़ी बेचैनी हो गई है।
यह लड़ाई बाप से नहीं है भारत के लड़के की, यह लड़ाई बुढ़ापे से चल रही है। यह लड़ाई संकोच से चल रही है। वह कोई कांशस नहीं है, कोई बहुत साफ नहीं है, जो हो रहा है, वह क्या हो रहा है! और हम अपने पुराने ही ढांचे में उसको बिठालने की कोशिश में लगे हैं। वह ढांचा उसके काम का नहीं साबित होगा, वह ढांचा तोड़कर बाहर निकलेगा। क्योंकि अगर हमने समझपूर्वक काम लिया, तो वह खुद ही बिना टूटे हुए ढांचे के बाहर हो सकेगा, नहीं तो ढांचा तोड़ने में फिर भी टूट जाएगा। क्रमशः……



