“चरित्र का भ्रम और संबंधों की सच्चाई: भारतीय नैतिकता की विडंबना” “ओशो”

ओशो- जिस देश का चरित्र व्यक्तिवाची रहा हो, उस देश में सच्चे अर्थों में चरित्र पैदा नहीं होगा, क्योंकि चरित्र है ही वहां, जहां से दूसरा आता है मेरे जीवन में। वहीं से पता चलता है कि मैं क्या हूं? मेरे अंर्तसबंधों में ही है, मेरी इंटर रिलेशनशिप में ही है, मैं सर्वस्व होता हूं, हमारी कसौटियां वही हैं। हमने असंगता को चरित्र कहा, दूसरों से छूट जाने को, हट जाने को, अलग हो जाने को, संबंध तोड़ जाने को। एक बेटा मां के अलावा बेटे का चरित्र पूरा कर ही नहीं सकता और एक पति पत्नी के बिना पति के चरित्र को पूरा कर ही नहीं सकता। हमारी सारी चरित्रवानता हमारे संबंधों की बात है और हमने जो चरित्र की भावना विकसित की है, वह व्यक्तिवाची है।

तो हमने तो कुछ व्यक्ति पैदा कर लिए, वे व्यक्ति ऐसे हुए जैसे कि नट रस्सी पर चलता है। जिंदगी तो रास्ते पर चलेगी, एक नट चल सकता है कि बंबई के दो बिल्डिंगों के बीच एक रस्सी बांध कर चल ले तो वह तीर्थंकर हो जाएगा या अवतार हो जाएगा। पर सारी दुनिया तो रस्सियों पर नहीं चल सकेगी। रस्सियां चलने के लिए नहीं हैं, नाटक के लिए हो सकती हैं। एक आदमी चल लेगा, करोड़ों आदमी तो उस मोटे रास्ते पर चलेंगे। उस रास्ते पर चलने का हमने कोई नियम नहीं बनाया है। हमने नियम बनाया है, रस्सी पर चलने वालों के और इस रास्ते पर चलने वाले तो कंडेम्ड हैं ही, तो उन्हें नियम बनाने की कोई जरूरत नहीं है, जरूरत तो रस्सी पर चलने वाले नट के लिए है। तो कभी करोड़ दो करोड़ आदमी में एक आदमी नट हो जाता है और, और महात्मा बन जाता है, ज्ञानी बन जाता है और वह चल जाता है रस्सी पर। हम सब जय-जयकार करके, ताली बजा कर अपने सीमित रूप से चलने लगते हैं। उस राह का कोई नियम नहीं है, उस रूप की कोई व्यवस्था नहीं है। व्यवस्था और नियम रस्सी वाले के लिए है।

तो दूसरी मेरी समझ है, हमें समूहवाची चरित्र का, और एक ऐसे चरित्र का जो भागता न हो, रुकता हो, ठहरता हो, संबंधित होता हो…बल्कि संबंधित होना भी चरित्रवान होने का एक लक्षण है। हम कितने बड़े पैमाने पर संबंधित होते हैं। यानी मेरी तो समझ है कि जितना चरित्रवान व्यक्ति है उतना उसके संबंधों का अंतर्जाल व्यापक होगा। जितना चरित्रहीन व्यक्ति होगा, उसके संबंधों का जाल…उतना क्षुद्र और छोटा होगा। असल में जिनसे वह संबंधित भी होगा, चरित्रवान होने के कारण उसके और उसके संबंधों के बीच दीवाल होगी, संबंध नहीं हो सकता। एक चोर का क्या संबंध हो सकता है, एक झूठ बोलने वाले का क्या संबंध हो सकता है, एक दगाबाज का क्या संबंध हो सकता है, एक जेबकट का क्या संबंध हो सकता है! असल में अनैतिकता जो है वह असंबंध है और हमारी जो नैतिकता है, वह भी असंबंध है। इन दोनों के बीच बड़ा एक समान तत्त्व है।

तो दूसरी बात जो मुझे दिखाई पड़ती है कि हम चरित्र की समूहवाची दृष्टि का विचार करें कि समूह में चरित्र का क्या अर्थ होता है। चूंकि व्यक्तिवाची चरित्र था इसलिए घूम-फिर कर हमारी सारी चरित्र की धारणा सेक्स के आस-पास रुक गई। आज अगर हम कहते हैं कि फलां आदमी चरित्रहीन है, तो ऐसा पता नहीं चलता है कि वह समय पर न आता होगा, ऐसा पता नहीं चलता होगा कि वह किसी को पैसे में धोखा देता होगा, कि दूध में पानी मिलाता होगा। ऐसा पता चलता है–कि उसके और किसी स्त्री के बीच गलत संबंध हैं। इसलिए एक आदमी झूठ बोले, कालाबाजारी करे, बस जिंदगी भर आंखें नीचे करके गुजर जाए, किसी स्त्री की तरफ न देखे, तो हमारे लिए चरित्र की वह आखिरी सीमा है, वह आखिरी मापदंड बन जाता है कि यह आदमी महान चरित्रवान है क्योंकि स्त्री को नहीं देखता है।

अगर हम बहुत गौर से देखें तो हमारी सारी चरित्र की धारणा यौन केंद्रित है और मजा यह है कि यौन जो है वह अत्यंत व्यक्तिगत बात है, बहुत सामूहिक बात नहीं है। ज्यादा से ज्यादा दो व्यक्तियों के बीच का संबंध है। लेकिन जब मैं झूठ बोलता हूं तो यह संबंध अनंत है। मेरे सेक्स का मामला मेरे और किसी और व्यक्ति के बीच की बात है, लेकिन बहुत गहरे में इसका कोई जातिक अर्थ नहीं है। यह बहुत प्राइवेट और निजी बात है। इस निजी बात को हमने इतना गौरव दिया है और जिसका अनंत व्यापी विस्तार होने वाला है, इसका हमने कोई मूल्य नहीं दिया है। तो इधर मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में हम चरित्र को ऊपर न उठा पाएंगे, जब तक हम उसे यौन से मुक्त नहीं कर लेते। और मेरा मानना है कि यौन की धारणा चरित्र के किसी कोने की एक धारणा है। उसको पूरा चरित्र बना लेना हिंदुस्तान में यह तकलीफ हो गई है। हिंदुस्तान में एक आदमी और कुछ भी कर रहा हो, उतना कोई विचार का कारण नहीं पैदा होता है। तो यह जो चरित्र की धारणा है यह साधु और संन्यासी के लिए शायद सार्थक होगी। साधारण जन के लिए किसी अर्थ की नहीं है। साधारण जन के लिए हमें चरित्र की व्यापक धारणा खोज लेनी आवश्यक है।

दूसरी बातः जीवन में एक बार अगर हमने पलायनवादी रुख ले लिया, तब हमारी समस्त नीति और समस्त चरित्र किसी गहरे अर्थ में उतार का और भागने का होता है। और जीवन उनका है, जो आक्रामक है, जो आक्रामक हैं। आक्रामक सामान्य अर्थ में, समस्त अर्थों में–जीवन उनका है जो आक्रामक हैं। और एक बार उन्होंने तय कर दिया हो कि आक्रमण नहीं, तो उससे कोई अर्थ नहीं होता। और जीवन की बड़ी तकलीफ यह है कि यहां विकल्प हमें चुनने पड़ते हैं। या तो आप आगे बढ़िए, या आप पीछे हटा दिए जाएंगे। बीच में खड़े होने की कोई जगह ही नहीं है। यानी कोई यह सोचता हो कि हम आगे न बढ़ेंगे तो हम वहां तो खड़े ही रहेंगे जहां हम खड़े हैं, तो गलती में हैं। जिंदगी ऐसे आदमी को वहां खड़ा नहीं रखती है पीछे हटा देती है। क्रमशः…..

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3