“भारत कभी चरित्रवान था ही नहीं” और “चरित्रहीनता गुलामी की वजह नहीं, गुलामी का कारण है” – ओशो
ओशो- पहली बात तो, साधारणतः हम ऐसा ही सोचते हैं कि गुलामियों के कारण हमारे चरित्र का पतन हुआ, गुलामी के कारण हमारा व्यक्तित्व नष्ट हुआ!
गुलामी आई, तभी हम चरित्रहीन हुए! गुलामी आई तभी, जब कि हम चरित्रहीन हुए?
उसको ही मैं कहना चाहता हूं कि चरित्रहीनता जो है वह गुलामी के कारण नहीं आई, बल्कि चरित्रहीनता के कारण ही गुलामी आई। और चरित्रहीन हम बने, ऐसा कहना मुश्किल है, चरित्रहीन हम थे। बनने का तो मतलब यह होता है कि हम चरित्रवान थे, फिर हम चरित्रहीन बने। तो हमें कारण खोजने पड़ें कि हम चरित्रवान कैसे थे, कब थे। और कैसे हम चरित्रहीन बने! मुझे नहीं दिखाई पड़ता कि हम कभी चरित्रवान थे। हमारी चरित्रहीनता बड़ी पुरानी है और चरित्रहीन का काफी जो बुनियादी कारण है, वह हमारी संस्कृति में सदा से मौजूद है।
उसकी वजह से है। गुलामी का आना बिलकुल स्वाभाविक था, और आज भी आ जाना बिलकुल स्वाभाविक है। और अगर हम जो भी काम करेंगे चरित्रवान बनने के, वे सफल होने वाले नहीं हैं। वे सफल इसलिए नहीं होंगे कि हम फिर वही काम करेंगे जो हमने सदा से किया है।
जैसे, एक तो चरित्र से हम जो मतलब लेते रहे हैं, इस देश में वह मतलब भी बड़ा भ्रांत है। हमने चरित्र से एक ऐसा मतलब लिया सदा से, हम उस व्यक्ति को पूरा चरित्रवान कहते रहे, जो जीवन में दर्शक की भांति खड़ा हो जाए। हमारी जो चरित्र की व्याख्या थी सदा से, वह यह थी कि श्रेष्ठतम तो आदमी वह है, जो जीवन में दर्शक की भांति खड़ा हो जाए। जो जीवन में, जीवन के कर्म में कमीटेड न हो, जो बाहर खड़ा हो जाए जीवन की सारी व्यवस्था के। तो हमने अपने देश में जिन लोगों को सर्वाधिक आदर दिया वे, वे लोग थे जो एक अर्थों में जीवन को छोड़ कर जीवन के बाहर खड़े हो गए थे। तो जो कौम जीवन के बाहर हो जाने को चरित्र की श्रेष्ठतम ऊंचाई समझेगी, उस कौम में जीवन के भीतर जो लोग हों, उनका चरित्र गिरना शुरू हो जाएगा।
जो कौम धर्म को, शील को, ज्ञान को जीवन का छोड़ना बना देगी, त्यागवादी बना देगी, उस कौम के बहुजन जीवन में चरित्र विलीन हो जाएगा, क्योंकि हमारे मन में कहीं एक बात साफ हो गई कि जीवित होना ही चरित्रहीनता है और किसी गहरे पापों का फल है। अगर एक आदमी जन्मा है, तो वह अपने पापों का फल भोग रहा है और जो आदमी पापों के बाहर हो जाएगा, वह साथ ही जीवन के भी बाहर हो जाता है। उसका आवागमन बंद हो जाता है।
तो जीवन का पाप पर्यायवाची है हमारे लिए। और जिसके मन में जीवन…और पाप की याद आती है तो जीवंत, चरित्रवान और पुण्यवान होने का उपाय न रहा। जीवन से भाग कर और पलायन ही उपाय है। तो भारत का मन हजारों साल से पलायनवादी, एस्केपिस्ट है। और इस वजह से हम जीवन के भीतर जहां चरित्र की जरूरत है वहां चरित्र पैदा नहीं कर पाए। हमने एक भगोड़ चरित्र पैदा किया था। यह चरित्र काम का नहीं था। ज्यादा से ज्यादा पूजा के योग्य हो सकता था। यह चरित्र मंदिरों में बिठलाने योग्य हो सकता था। न यह युद्ध के मैदान में किसी काम का था, न यह बाजार के मैदान में किसी काम का था, न जीवन के संबंध में किसी काम का था। तो हम एक जीवंत चरित्र पैदा ही नहीं कर पाते हैं।
इसलिए ऐसा कहना उचित नहीं है कि चरित्र हमने कभी भी खोया, ऐसा ही कहना ज्यादा उचित है कि वह जो संस्कृति विकसित थी उसमें चरित्र आ ही नहीं सका। और अगर हम इसे ऐसा देख सकें तो हमें फिर पूरा का पूरा पुनर्विचार करना पड़ेगा। और पुनर्विचार करें तो ही हम मूल-स्रोत को पा सकेंगे। पृथ्वी के जीवन को हम स्वीकार नहीं किए इसलिए पृथ्वी के जीवन में भी हम स्वीकृत न हो सके और हमने पृथ्वी को धन्यभाग से अंगीकार नहीं किया। इसलिए पृथ्वी भी हमें धन्यभाग से अंगीकार नहीं कर सकी। हम उखड़े हुए लोग हैं जिनकी जड़ें नहीं हैं।
तो एक तो यह खयाल में लेना जरूरी है कि भारत में हम कभी भी अगर चरित्र पैदा करना चाहें तो हमें एक तरह का पुनर्विचार करना पड़े। हमें फिर से यह पृथ्वी जीने योग्य और यह जीवन आनंद योग्य और इस जीवन को भोगना; रस; और इस जीवन के भीतर पुण्य और चरित्र की संभावना को ही स्वीकार करना पड़ेगा। और हमें तब इसके आस-पास की पूरी माइथोलाॅजी, इसके आस-पास का पूरा दर्शन, इसके आस-पास की पूरी दृष्टि को नया करना पड़ेगा। जो कौमें भी परलोकवादी होंगी, उनका चरित्र कूड़ा होगा, रक्तहीन हो जाएगा। असल में रक्तहीनता ही चरित्रबद्ध है। और जहां भी रक्त दिखाई पड़ेगा, वहां खतरा दिखाई पड़ेगा। क्योंकि जहां भी रक्त और स्नायु होगा, वहां जीवन के हजार स्पंदन शुरू हो जाएंगे। हम सबसे घबड़ाएंगे।
अब हमारी कठिनाई क्या है? हमारी कठिनाई यह है कि हमने रक्तहीन चरित्र! रक्तहीन चरित्र कैसा होगा? सेक्स के भीतर तो चरित्र का उपाय नहीं है, क्योंकि सेक्स तो चरित्रहीनता है, तो सेक्स से भागा हुआ ब्रह्मचारी भर चरित्रवान होगा। वह रक्तहीन होने वाला है जब कि जीवन है चरित्र के भीतर। और सेक्स के भीतर का चरित्र का एक कोड चाहिए, वह विकसित नहीं हो पाएगा, उसके विकसित होने का उपाय नहीं रह जाएगा। उसे तो विकसित हम तब करते हैं जब हम स्वीकार कर लेते हैं कि यह रहा जीवन। इस घर के भीतर जहां मुझे जीना है, यहां की नैतिकता मैं विकसित नहीं करूंगा क्योंकि मैं मानता हूं कि इस घर के भीतर होना ही अनैतिक है। इस घर के भीतर अनैतिकता आ नहीं सकती, मैं इसके बाहर हो जाऊं तो नैतिक हो जाऊंगा।
तो एक जो जल्दी में ऐसा खयाल लेना कि चरित्र में कमी गुलामी के कारण आई तो बड़ी कठिनाई हो जाती है। मेरे सामने यह सवाल उठता है कि वह कब था? वह मुझे कभी नहीं दिखाई पड़ता, पूरे ज्ञात इतिहास में कभी नहीं दिखाई पड़ता है। दिखाई पड़ने की हम कुछ भ्रांति में पड़ जाते हैं और इसलिए पड़ जाते हैं कि कुछ चरित्रवान लोग हमें दिखाई पड़ते हैं। वे कुछ चरित्रवान लोग सदा थे, वे आज भी हैं। लेकिन कुछ चरित्रवान लोगों से समाज नहीं बनता। समाज का चरित्र चाहिए।
तो दूसरी बात जो मेरे खयाल में आती है वह यह है कि हमने एक चरित्र की और भी विकसित व्यवस्था की है जो व्यक्तिवाची है। समुदाय का कोई चरित्र नहीं है। और एक-एक व्यक्ति के चरित्रवान होने में हमारा आग्रह है। अगर वह चरित्रवान होता है, तो उसको स्वर्ग मिलता है, और चरित्रहीन होता है, तो नरक मिलता है। लेकिन सामूहिक चरित्र भी कोई चीज है। उसकी हमें कोई धारणा नहीं है। मेरी समझ ऐसी है कि चरित्र होता ही सामूहिक है। व्यक्तिगत चरित्र बेमानी बात है। अगर जंगल में अकेला हूं, तो झूठ और सच बोलने का कोई भी मतलब नहीं है। ब्रह्मचारी, गैर-ब्रह्मचारी होने का भी कोई मतलब नहीं है। नैतिकता, अनैतिकता का भी कोई मतलब नहीं है। सारा चरित्र वहीं से शुरू होता है, जहां से दूसरा मुझे छूता है। क्रमशः….
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3



