ध्यान रखने की जरूरत है कि नियंत्रण बच्चे की आत्मा की हत्या करता है या इस बात के लिए बच्चे को योग्य बनाता है कि कल वह नियंत्रण के बाहर हो सके _ओशो
ओशो- दी गई स्वतंत्रता का बहुत मूल्य नहीं है। दी गई स्वतंत्रता भी परतंत्रता का एक ढंग है। देने वाले आप ही हैं। नहीं, मैं स्वतंत्रता देने की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि देने वाले आप ही हैं। अगर पुरुष कहे कि हम स्त्रियों को स्वतंत्रता देने का इंतजाम कर दिए हैं, उस स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है। वह सिर्फ परतंत्रता को स्वतंत्रता का नाम देना होगा जो कि और खतरनाक है। क्योंकि परतंत्रता परतंत्रता ही रहे, साफ परतंत्रता समझी जाए तो कम से कम आनेस्ट होती है। और जब हम स्वतंत्रता देने की बात करने लगते हैं, लेकिन जब दी जाती है स्वतंत्रता तो स्वतंत्रता नहीं रह जाती।
कहीं दुनिया में मां-बाप ने अभी कोई स्वतंत्रता नहीं दी है और न शिक्षक कहीं ने कोई स्वतंत्रता दी है। स्वतंत्रता दे रहा है वह, यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह निगेटिव बात हुई कि हम स्वतंत्रता दें। न, मैं बहुत पाजिटिव बात कह रहा हूं कि बच्चे को आदर, सम्मान, बच्चे से सीखने की संभावना। यह बहुत दूसरी बात कह रहा हूं मैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि परतंत्रता हटा लें। हटाएगा जो, वह मालिक है हटाने में भी। मैं बहुत पाजिटिव बात–मैं यह कह रहा हूं कि बच्चों को स्वतंत्रता नहीं दे देनी है क्योंकि आप हैं कौन देने वाले? और अगर आप स्वतंत्रता देने वाले हैं तो कल आप फिर कंट्रोल कर सकते हैं, परतंत्रता फिर ला सकते हैं। लेना-देना आपके हाथ में है। यह मैं नहीं कह रहा हूं, मैं एक पाजिटिव वैल्यू की बात कर रहा हूं।
वह मैं यह कह रहा हूं कि बच्चे को आदर, सम्मान, रिवरेंस…। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि बच्चे मां-बाप को आदर न दें, अनादर की उनकी इच्छा नहीं है, मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं मां-बाप से यह कह रहा हूं कि वे बच्चों को आदर दें। मां-बाप बरदाश्त करने को राजी हो जाएंगे कि हमें आदर न दिया जाए, इससे कोई बड़ी क्रांति नहीं होती। नहीं, बड़ी क्रांति का मतलब यह है कि मैं यह कह रहा हूं कि बच्चा बहुत आदर योग्य है। मां-बाप टालरेट कर सकते हैं इस बात को कि बच्चे आदर न दें, यह टालरेंस होगी उनकी, यह उनकी सहिष्णुता होगी, सुशिक्षण होगा, संस्कृति होगी, लेकिन जिस, जिस क्रांति की मैं बात कर रहा हूं वह बहुत दूसरी है।
वह मैं यह कह रहा हूं कि मां-बाप की आदर मांगने की आकांक्षा ही गलत थी। बच्चे को आदर दिया जा सके, इसकी संभावना खुलनी चाहिए। तब हम स्वतंत्रता देंगे, ऐसा नहीं, जिसको हम आदर करते हैं वह स्वतंत्र हो जाता है। स्वतंत्रता आदर के पीछे छाया की तरह चलती है। जिसे हम आदर करते हैं उसे हम परतंत्र नहीं कर सकते हैं। तब स्वतंत्रता सहज आएगी। और जो यह, यह जो खयाल है कि कंट्रोल न किया जाए, यह जो खयाल है कि बच्चे जैसे बढ़ना चाहें बढ़ें, मैं इसके पक्ष में नहीं हूं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बच्चे जैसे बढ़ना चाहें बढ़ें, क्योंकि मैं मानता हूं कि जरूरी है कि बच्चे को किसी दिन कोई हाथ का सहारा देकर पैर पर चलाए, नहीं तो अपने आप बच्चा पैर पर चलेगा नहीं।
पीछे अभी एक कोई दस साल पहले कानपुर के पास एक भेड़ियों के द्वारा पाला हुआ बच्चा पकड़ा गया। वह चार हाथ-पैर से ही चलता था। और छह महीने लग गए उसको दो पैर पर खड़े होने की तैयारी करवाने में, और उसी तैयारी में वह मरा। क्योंकि बाहरी उसकी सारी मसल्स, सारी व्यवस्था चार हाथ-पैर से चलने वाली हो गई, वह सब अकड़ गई। उसके पहले भी कलकत्ते के जंगलों में पास में दो लड़कियां मिलीं, वे भी भेड़िए उठा कर ले गए थे, उन्होंने पालीं। वे भी चार हाथ-पैर से चलती थीं, दो से नहीं चलती थीं।
नहीं, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बच्चे को कोई सहयोग न दे पुरानी पीढ़ी, कि उसको जैसा होना चाहे, हो जाए। यह भी बच्चे के प्रति अनादर का नया रूप है। यह भी बच्चे के असम्मान की नई प्रक्रिया है। अब, अब तक बच्चे के लिए हम सब तरफ से ऐसा बनाना चाहिए, इसकी फिकर में थे। वह अगर आप नहीं करने देते तब हम निगलेक्ट करते हैं कि बच्चे को जैसा होना हो, हो जाए। इसे हम स्वतंत्रता का नाम देंगे, सब देंगे, लेकिन बेईमानी की बात है। मैं नहीं मानता हूं कि बिना पुरानी पीढ़ी के सहारे के बच्चा कुछ हो सकेगा, आदमी भी हो सकेगा, यह भी शक है। और कुछ होना तो बहुत दूर की बात है। नहीं, सहारा तो देना होगा, लेकिन सहारा उसे बांधने वाला न हो। कंट्रोल भी रखना होगा, लेकिन कंट्रोल उसे बांधने वाला न हो, बल्कि अनकंट्रोल में उसे पहुंचाने वाला हो।
इसलिए डेलिकेट है ज्यादा बात। सारी कठिनाई हमारी यह है कि सीधे पोलेरिटी में सोचना तो सदा आसान पड़ जाता है। या तो हम सोचते हैं कि पूरी तरह कंट्रोल्ड हो कि खाए तो वही जो हम कहें, उठे तो तब जब हम कहें, सोए तो तब जब हम कहें, श्वास ले तो तब जब हम कहें, यह तो कंट्रोल है! या आप कहते हैं कंट्रोल नहीं, बस ठीक है फिर। गड्ढे में गिरें तो हम खड़े होकर देखते रहें, क्योंकि स्वतंत्रता है उसे कि उसे जो होना है वह हो जाए।
अमरीका में वही हुआ। पहली पोलेरिटी से वह दूसरी पोलेरिटी पर गए। वह भी मां-बाप का क्रोध है। वह भी कहते हैं कि अगर सारे शिक्षा शास्त्री और सारे मनोवैज्ञानिक यह कहते हैं कि हमने बिगाड़ दिया है बच्चों को, तो ठीक है। तब हम छोड़ते हैं, अब जो होना है हो जाए। मैं दोनों में से दोनों के लिए राजी नहीं हूं। दोनों ही गलत दृष्टिकोण हैं क्योंकि जिंदगी पोलेरिटी में नहीं बांटी जा सकती। जिंदगी सदा ही विरोधी पोल्स को एक साथ लेकर चलती है और इसलिए जिंदगी का मामला बहुत ही नाजुक है। वह ऐसा नहीं है जैसा हम उसे पकड़ लेते हैं। वह ऐसा ईदर-आर वाला नहीं है, या तो यह या इससे उलटा। यह भी और वह भी और दोनों के बीच से मार्ग जाता है। न, बच्चे को तो मां-बाप को नियंत्रण देना ही होगा! इसलिए नहीं कि मां-बाप जानकार हैं, ताकतवर हैं, बल्कि इसलिए कि बच्चा कोमल है, अपरिचित है, अज्ञात रास्तों पर है। इसलिए सहारा तो उनका पूरा चाहिए, नियंत्रण उनका पूरा चाहिए। बस इतना ही ध्यान रखने की जरूरत है कि नियंत्रण बच्चे की आत्मा की हत्या करता है या इस बात के लिए बच्चे को योग्य बनाता है कि कल वह नियंत्रण के बाहर हो सके। नियंत्रण इसलिए कि कल नियंत्रण न रह जाए। नियंत्रण दो तरह का हो सकता है। इसलिए कि नियंत्रण रोज बढ़ता चला जाए और अंत में फांसी बन जाए, या नियंत्रण इसलिए कि नियंत्रण रोज कम होता चला जाए और अंत में स्वतंत्रता बन जाए। क्रमशः…..



