जहां निंदा नहीं होगी वहां नीति से हट जाना पड़ेगा क्योंकि नीति निंदा का सूत्र है _ ओशो
ओशो- जो भी आदमी जवानी में उत्सुक है उसे बुढ़ापे को बहुत ठीक से समझ लेना चाहिए, नहीं तो पता भी नहीं चलता कि कब वह जवान नहीं रह गया–पता भी नहीं चलता है!
…और जवानी पर फिल्म बनाई जाए!
बहुत कारगर हो सकती है। अगर लाइफ अफरमेटिव भाव को लेकर बनाएं तो बहुत अदभुत–जिसमें जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर ले, जीवन को उसके सब रूपों में स्वीकार कर ले। निंदा का भाव ही न हो। जहां निंदा नहीं होगी वहां नीति से हट जाना पड़ेगा क्योंकि नीति निंदा का सूत्र है। जहां निंदा हो ही नहीं। जीवन जैसा है, वैसा स्वीकार है।
एपीकुरस ने जो गार्डन बनाया था यूनान में उसका जो बगीचा था, वह ऐसे ही थोड़े से लोगों की काॅलोनी थी जो जीवन को उसके सब रूपों में स्वीकार है। यूनान का सम्राट उससे मिलने गया है एपीकुरस से कि वहां कर क्या रहे हैं वे लोग! तो वे दिन भर बड़ी मेहनत में सारे लोग लगे थे। कोई लकड़ी चीर रहा था, कोई गड्ढे खोद रहा था। उसने कहाः मैंने तो सुना था, यहां भोगी रहते हैं। यह तुम क्या कर रहे हो! तो एपीकुरस ने कहा कि श्रम भी बड़ा भोग है। हम श्रम भोग रहे हैं अब। जब कोई लकड़ी चीरता है और कुदाली उठाता है और उसके माथे पर पसीना बहता है तो उसका अपना रस और आनंद है। उस क्षण में भी हम जीवन की गहराइयों से संबंधित हैं। फिर वह सांझ तक रुका। सांझ को जब रोटियां बनीं और सब लोग रोटियां खाने लगे और नाच के खाने लगे, और रूखी रोटियां थीं, जिन पर मक्खन भी नहीं था। तो उसने कहाः मैंने तो सुना था कि तुम सब भोगी हो, मक्खन भी नहीं है। तो एपीकुरस ने कहा कि जिन्होंने दिन में श्रम भोगा है वे कैसी भी रोटी पर, बिना मक्खन की रोटी पर भी मक्खन को भोग पाते हैं क्योंकि भूख लगी है।

बिदा होते वक्त एपीकुरस ने उसको कहा, सम्राट को कि साधारण के लिए नाच सको आप तो वह असाधारण हो जाता है। और असाधारण के लिए भी बैठे देखते रह जाओ तो वह भी साधारण हो जाता है। आखिर साधारण असाधारण का फर्क क्या है? तो कभी इस तरह के कुछ एपीकुरस की पूरी जिंदगी पर फिल्म बने और इतनी अदभुत जिसका कोई हिसाब नहीं! लेकिन चूंकि एपीकुरस की कोई फिकर करने वाला नहीं–जीसस पर फिल्म बन जाती है, राम पर बन जाती है, कृष्ण पर बन जाती है। एपीकुरस को कौन जाने? एपीकुरस की पूरी जिंदगी ऐसी है जैसे कि अनूठी है क्योंकि वैसा दूसरा आदमी नहीं हुआ।
हिंदुस्तान में चार्वाक हुए, लेकिन हमने उनका कुछ बचने नहीं दिया तो कुछ पता ही नहीं चलता कि क्या उनकी जिंदगी थी। वे अदभुत लोग रहे होंगे। कभी-कभी कुछ लोगों ने अश्रेष्ठ किया लेकिन वह भी जीवन की धारा नहीं बन पाई। अब कितना ही हिम्मत का आदमी हो चार्वाक, उन्होंने कहा कि अगर ऋण लेकर भी घी पीना पड़े, तो पीओ, क्योंकि ऋण तो चुक सकता है, पीना चूक जाएगा और ऋण न भी चुका तो क्या फर्क पड़ता है? बड़े हिम्मत के लोग रहे होंगे। साधारण हिम्मत के लोग नहीं रहे होंगे। हमने तो कंडेमनेटरी मान लिया फौरन कि अरे! हद्द हो गई, ऋण लेकर! लेकिन जिसने कहा है उसका भाव, उसकी पूरी दृष्टि का, बहुत अदभुत है। एपीकुरस की जिंदगी की पूरी कहानी बहुत अर्थ की है। इस वक्त बहुत संभावना बढ़ गई है कि हम उस तरह की कहानी को सोचें, तो बहुत अदभुत है। उसमें सारा संगीत और ढंग का हो सकता है जो जीवन को जगाता हो, सुलाता न हो। और बिलकुल ही इम्माॅरल होनी चाहिए। उसमें कोई नीति भर, जरा प्रवेश न करे क्योंकि जहां नीति प्रवेश हुई कि उसके पीछे फिर बूढ़ा आया।
आर्डर नहीं किया? उन्होंने कहाः नहीं-नहीं, मैं आपके लिए नहीं–तो मैंने कहाः आप अपने लिए ही कर रहे हैं तो इसमें मैं कहां आता हूं? मेरा इससे वास्ता क्या है? आप मजे से लें। उन्होंने कहाः यह आप कह रहे हैं, शराब के लिए आपका कोई विरोध नहीं है? मैंने कहाः मैं पीऊं या न पीऊं यह मेरी मौज है। आप पीएं या न पीएं यह आपकी मौज है। मैं आपके लिए विरोध करने वाला कौन हूं? और किसने मुझे ठेका दिया है कि मैं आपके लिए विरोध करूं?
बंबई के ही मित्र हैं, यहां के बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट हैं। खंडवा उतरे तो वह मेरा पैर छुए। मैंने कहाः यह क्या कर रहे हैं? उन्होंने कहाः मैंने जिंदगी में किसी के पैर नहीं छुए हैं, क्योंकि महात्मा मुझे कभी अच्छे आदमी मालूम ही नहीं हुए। आप पहले आदमी हैं जो महात्मा जैसे दिखाई पड़ रहे हैं और फिर भी भले आदमी हैं।
महात्मा भला आदमी हो ही नहीं सकता है, क्योंकि महात्मा होता ही वह है जो गर्दन दबा कर बड़ा होता है, नहीं तो बड़ा हो नहीं सकता। और गर्दन दबाने के ढंग अलग-अलग हैं–हिटलर के अपने हैं, गांधी के अपने हैं। मेरे लिए बहुत फर्क नहीं है। हिटलर भी ऐसे बड़ा महात्मा था। शराब न पीए, सिगरेट न पीए, रात दस बजे सो जाए, बड़ा पक्का महात्मा था। और मैं मानता हूं, अगर हिटलर सिगरेट पीता, शराब पीता, दो-चार स्त्रियों से प्रेम कर लेता तो दुनिया दूसरे महायुद्ध से बच सकती थी। इसलिए यह हिसाब में बहुत मंहगा है मामला। अगर हिटलर शराब पी सकता, एक-दो स्त्रियों को प्रेम कर सकता तो दूसरा महायुद्ध भी बच सकता था। क्योंकि तब यह आदमी इतना ज्यादा, इतना दुष्ट नहीं हो सकता था जितना हुआ। क्रमशः….
ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3
साधारण में असाधारण खोजने की कला – जीवन को उसके पूरे रूप में स्वीकारने का संदेश _ ओशो
ओशो कहते हैं जो भी आदमी जवानी में उत्सुक है, उसे बुढ़ापे को गहराई से समझ लेना चाहिए—वरना पता ही नहीं चलता कि कब जवानी हाथ से निकल गई। और जब होश आता है तब तक देर हो चुकी होती है।
…और यदि जवानी पर फिल्म बनाई जाए, जीवन को उत्साहपूर्ण दृष्टि से दिखाते हुए, तो वह फिल्म अत्यंत अद्भुत और प्रभावशाली हो सकती है—बशर्ते उसमें जीवन के सभी रंगों को बिना निंदा, बिना नैतिकता के बंधन के स्वीकार करने का भाव हो।
निंदा से मुक्त जीवन
जहां निंदा नहीं होती, वहां नीति अपने आप गायब हो जाती है, क्योंकि नीति निंदा पर आधारित है। जीवन जैसा है, वैसा स्वीकारना—यही असली कला है।
एपीकुरस का बगीचा—श्रम भी भोग है
यूनान के दार्शनिक एपीकुरस ने ऐसा ही एक बगीचा बनाया था, जहां लोग जीवन को उसी रूप में स्वीकार करते थे।
जब यूनान का सम्राट उनसे मिलने आया, तो उसने देखा—सभी लोग दिन भर मेहनत कर रहे हैं:
कोई लकड़ी चीर रहा था, कोई गड्ढे खोद रहा था।
सम्राट ने कहा, “मैंने तो सुना था यहां भोगी लोग रहते हैं!”
एपीकुरस ने मुस्कुराकर कहा:
“श्रम भी बड़ा भोग है। पसीने की धार भी आनंद है।”
रूखी रोटी भी असाधारण बन जाती है
शाम को जब सभी लोग सादा खाना खाने बैठे—बिना मक्खन की रोटियां,
सम्राट ने आश्चर्य से पूछा:
“यह कौन सा भोग है? मक्खन भी नहीं!”
एपीकुरस ने उत्तर दिया:
“जिन्होंने श्रम भोगा, वे बिना मक्खन की रोटी में भी मक्खन का स्वाद पा लेते हैं।”
जब सम्राट विदा होने लगा, उसने पूछा कि वह क्या भेंट दे सकता है।
एपीकुरस ने केवल कहा—“कभी थोड़ा मक्खन भेज देना।”
कुछ दिन बाद जब मक्खन आया, तो पूरे समुदाय ने नाचकर उत्सव मनाया।
सम्राट अचंभित हो गया—इतनी साधारण बात पर इतनी खुशी!
एपीकुरस ने कहा:
“जो साधारण पर नाच नहीं सकता, वह असाधारण के लिए कभी नाच ही नहीं पाएगा।”
चार्वाक जैसे साहसी लोग
भारत में चार्वाक हुए—बहुत साहसी, जिन्होंने कहा:
“यदि ऋण लेकर भी घी पीना पड़े, तो पीओ। पीने का अवसर चला जाएगा, ऋण फिर चुक जाएगा।”
हमने उन्हें तुरंत निंदा से दबा दिया, लेकिन उनकी दृष्टि जीवन–उत्सव की थी, न कि लोभ की।
नैतिकता और नकली महात्मा
समाज ने “महात्मा” बनाने के नाम पर लोगों की गर्दन दबाई है।
हिटलर का उदाहरण देते हुए कहा गया:
“अगर हिटलर शराब पीता, प्रेम करता, थोड़ा सहज होता—तो शायद दुनिया दूसरे महायुद्ध से बच जाती।”
क्योंकि कृत्रिम संयम कठोरता को जन्म देता है, सहज जीवन करुणा को।
जीवन को उसके पूरे रूप में स्वीकारो
जीवन सोने का अवसर नहीं, जागने का निमंत्रण है।
नीति, निंदा और बनावट से मुक्त होकर जीने की कला ही सच्चा उत्सव है।
साधारण को उत्सव बना दो, वही असाधारण बन जाता है।
जीवन को उसके सभी रूपों में प्रेम से स्वीकारो।
निंदा छोड़ो, उत्सव पकड़ो—यही जीवन का संगीत है।



