“हिंसा सिर्फ मनुष्य में है: जाने अतृप्त जीवन-ऊर्जा कैसे समाज को युद्ध की ओर धकेलती है — ओशो”

ओशो- अभी मैं एक मित्र के घर था, वे बड़े शिकारी हैं। बहुत डरते-डरते उन्होंने मुझसे कहा कि कुछ मैंने शिकार की फिल्में बनाई हैं, वह आपको दिखाऊं? लेकिन मैं डरता हूं, आप शायद पसंद न करेंगे, क्योंकि उनमें हिंसा होगी। मैंने कहाः आदमी को छोड़ कर और कहीं हिंसा हो नहीं सकती। मैंने कहा, तुम्हारा अगर गोली मारने का कोई चित्र हो शेर को तो कुरूप होगा, लेकिन शेर ने किसी पशु को या पक्षी को मारा हो, तो सुंदर होगा। जब मैंने देखा–मैंने तो कभी देखा नहीं था, जब मैंने देखा उनकी फिल्म को तो मैं सच में हैरान हुआ। जब शेर एक पशु पर हमला करता है तो कहीं भी हमलावर नहीं मालूम होता–जस्ट प्ले, जैसे खेल रहा है। किसी को मारने नहीं जा रहा, अपने को जिला रहा है। जो गहरे में है–वह अपने जीने के लिए रास्ता खोज रहा है। किसी को मारने नहीं जा रहा है, और उसके जीने में कोई मर रहा है। वह बिलकुल और बात है, मारने नहीं जा रहा है किसी को, तो उसके ढंग में न तो अग्रेशन है, न हमलावर की वृत्ति है और बिलकुल ऐसा लगता है, जैसे वह खेल खेल रहा है। और वह खेल वैसे ही है जैसे फूल खिलता है, वैसे शेर हमला भी करता है।हिंसा मनुष्य की ईजाद है। हिंसा मनुष्य को छोड़ कर कहीं भी नहीं है, क्योंकि मनुष्य ही अकेला ऐसा है जो कि जीवन के लिए नहीं मारे किसी को, मारने के लिए जीने लगे। मार सके, तो ही जी सके। मारना कोई साधन न रह जाए, साध्य बन जाए। मेरी अपनी दृष्टि यह है कि फ्रस्ट्रेटेड लाइफ इंस्टिंक्ट है तो वह विक्षिप्त हो जाएगी–विक्षिप्त हो जाएगी तो उपद्रव करेगी।

तो बूढ़ा चित्त पहली सीमा खींचता है जीवन में कि कैसा जीवन ठीक और कैसा जीवन गलत। वह जीवनमात्र को ठीक कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह कैसे जुटाए? बहुत सा जीवन उसके लिए असंभव हो गया है। जो उसके लिए असंभव हो गया है, वह सबके लिए गलत हो गया है। और उसके हाथ में शक्ति थी। बूढ़ा आदमी सदा शक्तिशाली था। इधर इन बीस-पच्चीस वर्षों में उसकी शक्ति का शिखर टूटना शुरू हुआ। जो कि बड़ा शुभ लक्षण है, जिससे कि मनुष्य की बड़ी संभावनाएं खुली थीं। वह सदा शक्तिशाली था और उसकी शक्ति बिलकुल ही चुनौती के बाहर थी–चुनौती भी नहीं दी जा सकती। कोई उपाय भी नहीं था चुनौती का। तो उसने जो व्यवस्था दी है, उस व्यवस्था ने हमारी जीवन की धारा को सब तरफ से पंगु किया है। पंगु जीवन क्रोध से भर जाए, यह बिलकुल स्वाभाविक है; हिंसा से भर जाए, यह बिलकुल स्वाभाविक है।

इधर मेरी अपनी समझ है–इसलिए जिन मुल्कों में, जिन सदियों, जिन क्षणों में और जिन कालों में जीवन को भोगने की कामना प्रकट हुई वह देश दूसरे देशों से फौरन हार गया–चाहे वह यूनान हो, चाहे भारत हो, चाहे कहीं भी। जब भी किसी देश में जीवन को भोगने की जरा सी क्षमता प्रकट हुई, वह दूसरे देशों से फौरन हार गया। क्योंकि उसमें लड़ने की वृत्ति एकदम क्षीण हो गई। लड़ने की वृत्ति पैदा करनी हो तो सेक्स फ्रस्ट्रेशन जरूरी है। इसलिए अगर कुश्ती लड़ने वाला या घूंसेबाजी करने वाला महीने भर ब्रह्मचर्य साधता हो तो अर्थपूर्ण है। अर्थपूर्ण इसीलिए है कि वह जितना जीवन की धारा को रोकता है, जीवन की धारा उतनी तीव्रता से आक्रामक होना शुरू हो जाती है। इसलिए सैनिक को अविवाहित रखना, स्त्रियों से दूर रखना पड़ता है। वियतनाम में अमरीकी सैनिक के पास ताकत बहुत है, लेकिन वह जीत नहीं सकता है। उसका कुल कारण यह है कि वह वियतनामी सैनिक के मुकाबले सेक्स फुलफिल्ड है, और कोई कारण नहीं है। हिंदुस्तान में जो हमलावर लोग आए वे हमसे हर हालत में कमजोर थे, असंस्कृत थे, शक्ति संपन्न भी नहीं थे, समृद्ध भी नहीं थे, बिलकुल जीने-मरने की हालत में थे, लेकिन वे हमसे जीत सके। और उसका कुल कारण इतना था कि हम एक तरह से तृप्त थे और वे एक तरह से बहुत अतृप्त थे और अतृप्ति उनको बड़ी दिक्कत दे गई।

तो अतृप्त चित्त करना जरूरी है लड़ाने के लिए। इसलिए दुनिया में जब भी कोई कौम समृद्ध हो जाती है तो लड़ने में कमजोर हो जाती है। यह बड़े मजे की बात है, समृद्ध कौम लड़ने में कमजोर हो जाती है, गरीब कौम लड़ने में शक्तिशाली हो जाती है। असल में अमीर को आप लड़ा नहीं सकते, सिर्फ गरीब को ही लड़ा सकते हैं। इसलिए दुनिया की सारी राजनीतिक पार्टियां गरीब पर विश्वास, भरोसा रखती हैं। अमीर को आप लड़ा नहीं सकते। वह ऐसा तृप्त है जो कहां लड़ने जाए? कैसी बात करते हैं? एयर कंडीशंड में बैठा हुआ है, आराम से जी रहा है। क्रमशः….

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

हिंसा मनुष्य की ईजाद है — ओशो का गहन दृष्टिकोण

ओशो ने अपने एक प्रवचन में हिंसा, जीवन-ऊर्जा, आक्रमण और समाज की संरचना पर गहरी चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रकृति में हिंसा नहीं है, हिंसा केवल मनुष्य ने बनाई है। इस विषय को समझाने के लिए उन्होंने एक अनोखे अनुभव का उल्लेख किया।

शेर का हमला खेल जैसा, मनुष्य की हिंसा बीमारी

ओशो बताते हैं— “अभी मैं एक मित्र के घर था, वे बड़े शिकारी हैं। बहुत डरते-डरते उन्होंने मुझसे कहा कि उनके पास शिकार की बनाई कुछ फिल्में हैं, शायद उनमें क्रूरता हो, इसलिए आप नापसंद करें। मैंने उनसे कहा: आदमी को छोड़कर और कहीं हिंसा हो ही नहीं सकती।”

उन्होंने बताया कि जब शेर किसी पशु पर हमला करता है, तो वह कहीं भी हमलावर नहीं लगता—वह खेल की तरह दिखाई देता है, न कि हत्या की मंशा से।
“वह मारने नहीं जाता, सिर्फ जीने के लिए रास्ता खोजता है। उसके जीने में कोई मर जाता है, यह अलग बात है।”

मनुष्य ही मारने के लिए जीता है

ओशो के अनुसार— “हिंसा मनुष्य की ईजाद है, क्योंकि मनुष्य अकेला ऐसा प्राणी है जो जीवन के लिए नहीं मारता, बल्कि मारने के लिए जीने लगता है। मारना उसका साध्य बन जाता है।”

वह मानते हैं कि जब जीवन-ऊर्जा दबी रह जाती है, अधूरी रह जाती है, तब वह विक्षिप्त होकर हिंसा का रूप ले लेती है।

बूढ़ा चित्त और जीवन पर नियंत्रण

ओशो कहते हैं कि समाज में सदियों से बूढ़े मन, बूढ़े निर्णय शक्ति-संपन्न रहे हैं, जिन्होंने जीवन पर सीमाएं थोप दीं।

“बूढ़ा चित्त यह तय करता है कि जीवन का कौन सा रूप ठीक है और कौन गलत। जो उसके लिए असंभव है, वह दूसरों के लिए भी गलत कर दिया जाता है। और उसके हाथ में शक्ति थी, इसलिए उसने व्यवस्था बनाकर जीवन को पंगु बनाया।”

वे मानते हैं कि जब जीवन का प्रवाह रोका जाता है, तो वह क्रोध और हिंसा से भर जाता है।

जब राष्ट्र तृप्त होते हैं, वे युद्ध हार जाते हैं

ओशो बताते हैं कि इतिहास में जब भी कोई राष्ट्र समृद्ध और तृप्त हुआ, वह लड़ने-लायक नहीं रहा।
“यूनान हो, भारत हो या कोई और देश—जहां जीवन को भोगने की स्वतंत्रता आई, वह देश युद्ध में हार गया। क्योंकि लड़ाई के लिए अतृप्ति चाहिए।”

उन्होंने कहा कि सैनिकों को अविवाहित रखना, स्त्रियों से दूर रखना, ब्रह्मचर्य साधना—सभी का उद्देश्य एक ही है:
“फ्रस्ट्रेशन बढ़े, ताकि लड़ने की शक्ति पैदा हो।”

गरीब लड़ते हैं, अमीर हार जाते हैं

ओशो ने कहा— “अमीर को आप लड़ा नहीं सकते, क्योंकि वह तृप्त है। गरीब लड़ सकता है क्योंकि उसके भीतर अतृप्ति की आग होती है। इसलिए दुनिया की सारी राजनीतिक पार्टियां गरीबों पर भरोसा करती हैं।”

उन्होंने उदाहरण दिया कि भारत पर हमलावर आने वाले लोग शक्ति-संपन्न या सभ्य नहीं थे, पर जीत गए क्योंकि वे अतृप्त थे और भारतीय तृप्त।

ओशो का संदेश स्पष्ट है—

“जीवन-ऊर्जा को दबाना हिंसा और युद्ध को जन्म देता है। प्रकृति में हिंसा नहीं, मनुष्य में हिंसा है।”