“शिक्षा नहीं, व्यक्ति की खोज जरूरी—“क्या हम सही व्यक्ति को सही दिशा दे पा रहे हैं?—ओशो 

ओशो- देश में सारे मनोवैज्ञानिकों को हमें प्राथमिक स्कूल में उलझा देना चाहिए कि वहां खोज कर लें कि व्यक्ति हो क्या सकता है। वे चार वर्ष दो काम के लिए होने चाहिए, एक तो हम जिसको बहुत प्राथमिक ज्ञान कहें, जो जिंदगी के लिए, सब के लिए जरूरी होगा, वह दे दें। और दूसरी, उससे भी कीमती बात कि हम चार वर्ष में यह खोज लें कि यह व्यक्ति हो क्या सकता है, इसकी संभावना क्या है! ताकि हम उसे मार्ग दे सकें।

तो ऐसा न हो कि जो चमार बन सकता था वह मिनिस्टर बन जाए, जो मिनिस्टर बन सकता था वह चमार बन जाए। ऐसा हो रहा है और सब अस्त-व्यस्त हो गए हैं। जिसको जहां होना चाहिए, वह वहां नहीं है। कोई कहीं है, कोई कहीं है। सब अस्त-व्यस्त है। उसका कारण है कि वह प्राथमिक शिक्षा फिर शिक्षा का ही केंद्र नहीं होना चाहिए, वहां हमारी जांच-पड़ताल भी होनी चाहिए कि यह व्यक्ति चार साल में हम परख लें कि यह हो क्या सकेगा। इसकी पहचान कर लें, इसको पकड़ लें, इसको जान लें, इसकी दिशा को खोज लें।

लेकिन अभी कोई दिशा का सवाल नहीं है। चैथी कक्षा के बाद, पांचवीं कक्षा के बाद उसे कहां भर्ती होना है, क्या पढ़ना है, ये सब संयोग तय कर रहे हैं, इसमें कोई वैज्ञानिकता नहीं है। पिता तय कर देता है कि लड़के को डाक्टर बनाना है और लड़का पता नहीं क्या बनने को पैदा हुआ है। लड़का पता ही नहीं क्या बनने को पैदा हुआ है और पिता तय कर रहा है। और पिता बेचारा इसलिए तय कर रहा है कि डाक्टर की मार्केट वैल्यू है। बाजार में कीमत है, लड़के को बाजार में बेचना है, तो वहां डाक्टर के पैसे मिलेंगे वहां और किसी के पैसे मिल सकते नहीं। इंजीनियर बनाना है, वहां पैसे मिल जाएंगे और तो पैसे मिल सकते नहीं हैं और पैसा महत्वपूर्ण है, यह व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है, जो यह पैदा हुआ है। उसके हिसाब से सब चल रहा है। वह तय कर देगा, वह उसे पढ़ना है, उसमें उसे जी जान लगा देनी है।

मेरी अपनी समझ यह है कि प्राथमिक शिक्षा पर सबसे पहले ध्यान दिया जाना जरूरी है, क्योंकि प्राथमिक शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण शिक्षक है। और वहां हमें श्रेष्ठतम लोगों को खड़ा कर देना चाहिए। इधर मैं ऐसा सोचता हूं, यह तभी संभव हो सकेगा जब कि हम प्राथमिक स्कूल में कोई पढ़ाता है उस हिसाब से उसकी तनख्वाह तय न करें। तनख्वाह हम उसकी इस हिसाब से तय करें कि वह आदमी क्या है। वह चाहे युनिवर्सिटी में पढ़ाए और चाहे पहली कक्षा में पढ़ाए। और श्रेष्ठतम को हम नीचे ले आएं। असल में बुनियाद के पास श्रेष्ठतम होने चाहिए, शिखर तो सम्हल सकता है।

लेकिन आदमी तो डगमगा गया है, उनकी बुनियाद तो बिलकुल कमजोर है। शिखर बहुत मजबूत बनाते हैं। शिखर भारी होता चला जाता है। उलटा पिरामिड बना रहे हैं, आदमी का। नीचे बहुत छोटा सा आधार रख देते हैं, ऊपर बड़ा भवन बनाते हैं। उससे बड़ी आशाएं करते हैं, वे सब आशाएं गिर जाती हैं। क्योंकि वह आदमी खड़ा नहीं हो पाता। नीचे बड़ा भवन बनाना पड़े।

और यह समझ लेना जरूरी है कि इसके पहले कि हम शिक्षा के जगत में किसी व्यक्ति को प्रवेश कराएं, वह क्या हो सकता है, इसकी खोज-बीन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसकी खोज-बीन न हो सके तो कोई हर्जा नहीं है, एक आदमी अशिक्षित रह जाए। लेकिन इस खोज-बीन के पहले उसको शिक्षित करना बहुत खतरनाक है। कहीं ऐसा न हो कि वह जो हो सकता था उससे उलटे ढांचे में उसको फंसा दें, तो वह जिंदगी भर अपने ढांचे से लड़ता रहे और मरता रहे, और परेशान हो जाए।

रोज मुझे लोग मिलते हैं जो अपने ढांचों से लड़ रहे हैं। वे परेशान हैं, घबड़ा गए हैं, हैरान हो गए हैं, मुश्किल में पड़ गए हैं। बचने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि जो ढांचा है, जिसमें वे शिक्षित हुए हैं, अगर उसको छोड़ दें तो वे उनके पास कुछ अर्थ नहीं रह जाता, काम नहीं रह जाता, उपयोग नहीं रह जाता। और अगर उसमें ही लगे रहते हैं, तो उनकी आत्मा तड़फती है और आत्मा के लिए मार्ग नहीं मिल पाता। आदमी इतना मुर्झाया हुआ हो गया है, उसका और कोई कारण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति जो हो सकता है, वह नहीं हो पा रहा है।

शिक्षक के लिए बड़े काम हैं, भविष्य में। शायद उसी के लिए बड़े काम हैं। और सब क्रांतियां असफल हो गई हैं। राजनीतिक क्रांतियां असफल हो गई हैं, आर्थिक क्रांतियां हुईं, वे भी असफल हो गई हैं, आदमी नहीं बदला। न फ्रांस में कुछ हुआ, न रूस-चीन में कुछ हुआ। आदमी वैसा का वैसा है। अब एक ही आशा है भविष्य में कि एक शिक्षा की क्रांति हो जाए–एक रिवोल्यूशन इन एजुकेशन हो जाए तो शायद एक आशा बची है, और मुझे लगता है कि वही सबसे बड़ी संभावना है क्रांति की। अगर शिक्षा पूरी वैज्ञानिक हो सके और आदमी की आत्मा की तलाश बन सके, तो शिक्षक के सामने बड़ा काम है जो पुराने शिक्षक के पास कभी भी नहीं था। शिक्षक के सामने बड़ा भविष्य है जो पुराने शिक्षक के पास कभी भी नहीं था। लेकिन आज बड़ी मुश्किल है। पुराना शिक्षक खो गया है, नया पैदा नहीं हुआ है और बीच की बेचैनी है। उस बीच की बेचैनी में शिक्षक अटका हुआ है।

ये थोड़ी सी बातें मैंने कहीं, हजार बातें हैं कहने की; लेकिन एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात पूरी करूंगा।

मैंने सुना है, एक गांव में एक छोटा सा चर्च था। और उस राष्ट्र का जो सबसे बड़ा पुरोहित था वह उस चर्च को विजिट दे रहा था, आ रहा था मिलने चर्च को। देश भर में घूम रहा था। दस-पांच वर्ष में एक दफा वह चक्कर लगाता था, बड़ा पुरोहित। जब उस चर्च के दरवाजे में प्रविष्ट हुआ और गांव का छोटा सा पुरोहित उसको अंदर ले जाने लगा तो उस बड़े पादरी ने एक सवाल उठाया, क्योंकि परंपरागत नियम था कि जब भी बड़ा पादरी, बड़ा पुरोहित किसी चर्च में जाता तो उसके स्वागत में घंटियां बजाई जातीं। उस रोज पादरी से पूछा कि क्या बात है, तुम्हारे चर्च में घंटियां नहीं बजाई जा रही हैं। उसने कहा, हजार कारण हैं। उस बड़े पुरोहित ने कहाः हजार कारण? मसलन, पहला? तो उसने कहाः पहला तो एक है कि चर्च में घंटी ही नहीं है। उस बड़े पुरोहित ने कहा बाकी हजार अब रहने दो। एक ही काफी है।

तो ऐसे तो हजार बातें मेरे मन में कहने को हैं, लेकिन एक ही बात काफी है कि शिक्षक अभी है नहीं और इसके लिए थोड़ी सी बातें मैंने कही हैं। मेरी बातों को सोचना, मानने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कोई गुरु नहीं हूं कि आपको उत्तर दे दूं। मैं तो कुछ प्रश्न देना चाहता हूं। मैं कोई निश्चित बात आपको नहीं दे रहा। आपको अनिश्चय में छोड़ना चाहता हूं, ताकि आप सोचें, खोजें और शायद कुछ हो सके। क्रमशः……

ओशो आश्रम उम्दा रोड भिलाई-3 

शिक्षा में क्रांति की जरूरत: ओशो का गहन संदेश

व्यक्ति की खोज ही शिक्षा का पहला कदम

ओशो कहते हैं कि देश में सभी मनोवैज्ञानिकों को प्राथमिक स्कूलों में लगाया जाना चाहिए, ताकि बच्चे के जीवन की संभावनाओं को पहचाना जा सके। प्रारंभिक चार वर्ष केवल बुनियादी ज्ञान ही न दें, बल्कि यह भी समझें कि बच्चा भविष्य में क्या बन सकता है।

ओशो के अनुसार, यह खोज न हो पाने का ही परिणाम है कि जो व्यक्ति चमार बन सकता था वह मंत्री बन जाता है, और जो मंत्री बन सकता था वह चमार बन जाता है—सब उलट-पलट और अस्त-व्यस्त।

दिशाहीन शिक्षा पर ओशो की चिंता

वे कहते हैं कि आज शिक्षा में कोई वैज्ञानिक दिशा नहीं है। पिता तय करता है कि बेटा डॉक्टर बने या इंजीनियर, केवल बाजार मूल्य देखकर।
लेकिन बच्चा किस काम के लिए पैदा हुआ है—यह जानना किसी की प्राथमिकता नहीं है।

ओशो का मानना है कि पैसा महत्वपूर्ण हो गया है, व्यक्ति नहीं। बच्चे को कमाई के हिसाब से पढ़ाया जा रहा है, न कि उसकी वास्तविक क्षमता को पहचानकर।

सबसे महत्वपूर्ण है प्राथमिक शिक्षक

ओशो कहते हैं कि शिक्षा में सबसे अहम भूमिका प्राथमिक शिक्षक की है।
लेकिन आज स्थिति उलट है—पहली कक्षा पढ़ाने वाले को कम तनख्वाह और विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को ज्यादा।
ओशो का सुझाव है कि तनख्वाह काम के आधार पर नहीं, व्यक्ति की गुणवत्ता के आधार पर तय होनी चाहिए।

उनके अनुसार, समाज को अपनी बुनियाद मजबूत करनी चाहिए। अभी तो उलटा पिरामिड बना दिया गया है—नीचे कमजोर आधार और ऊपर बड़ा ढांचा।

गलत ढाँचे में फँसा व्यक्ति जिंदगीभर संघर्ष करता है

ओशो चेतावनी देते हैं कि क्षमता का परीक्षण किए बिना किसी को शिक्षित करना खतरनाक है।
अगर बच्चा गलत जगह फिट कर दिया जाए तो वह जीवनभर अपने ढांचे से लड़ता रहता है, और मानसिक रूप से टूट जाता है।

वे कहते हैं कि ऐसे हजारों लोग उनसे मिलते हैं जो अपने चयनित पेशों से परेशान हैं—क्योंकि वे वहाँ फिट ही नहीं होते।

राजनीतिक और आर्थिक क्रांतियाँ असफल—अब उम्मीद केवल शिक्षा से

ओशो मानते हैं कि दुनिया की सारी राजनीतिक और आर्थिक क्रांतियाँ असफल हो गईं।
फ्रांस, रूस या चीन—कहीं मनुष्य नहीं बदला।

उनके अनुसार अब केवल एक ही सच्ची क्रांति की संभावना बची है—शिक्षा की क्रांति।
ऐसी शिक्षा जो वैज्ञानिक हो और आत्मा की खोज करवाए।

शिक्षक की भूमिका पहले कभी इतनी बड़ी नहीं थी

ओशो कहते हैं कि भविष्य में सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिक्षक की है।
लेकिन समस्या यह है कि पुराना शिक्षक खत्म हो चुका है और नया शिक्षक पैदा नहीं हुआ है।
बीच में बेचैनी है—और यही बेचैनी शिक्षा व्यवस्था को उलझा रही है।

ओशो की कहानी—एक ही कमी काफी है

ओशो अंत में एक कहानी बताते हैं—
एक बड़े पादरी ने छोटे चर्च में घंटियाँ न बजने की वजह पूछी।
छोटे पादरी ने कहा, “हजार कारण हैं, पहला—हमारे पास घंटी ही नहीं है।”
बड़े पादरी ने कहा, “बाकी 999 कारण रहने दो। एक ही काफी है।”

ओशो कहते हैं—
इसी प्रकार शिक्षा की हजार समस्याएँ हैं, पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे पास ‘सच्चा शिक्षक’ ही नहीं है।

ओशो की अंतिम बात

वे कहते हैं, “मैं उत्तर नहीं देता, मैं प्रश्न देता हूँ। आपको अनिश्चय में छोड़ता हूँ, ताकि आप खोजें—और शायद कुछ हो सके।”